द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स-द रिंग्स ऑफ पॉवर रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला
28 करोड़ डॉलर की लागत से बनी ‘लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ सीरीज की तीन फिल्मों ने जब दुनिया भर में अपनी लागत से 10 गुना से भी ज्यादा करीब 299 करोड़ डॉलर की कमाई की तो विश्व सिनेमा में एक नया मील का पत्थर बना। ‘द फेलोशिप ऑफ द रिंग्स’, ‘द टू टॉवर्स’ और ‘द रिटर्न ऑफ द किंग’ नाम की ये तीन फिल्में साल 2001, 2002 और 2003 में रिलीज हुईं। अब इन फिल्मों की रिलीज के 19 साल बाद मनोरंजन जगत में इन कहानियों के किरदारों की चमत्कारिक दुनिया फिर से आबाद करने की कोशिश की जा रही है। जानकर आपको हैरानी होगी कि अमेजन ने सिर्फ इन कहानियों पर टीवी सीरीज बनाने के अधिकार ही 25 करोड़ डॉलर में खरीदे हैं, इसके कुछ ही ज्यादा रकम खर्च कर तब तीनों फिल्में बन गई थीं। वादा इस सीरीज के पांच सीजन बनाने का है और इतिहास में रिकॉर्ड इसके नाम ये दर्ज हो रहा है कि ये मनोरंजन जगत की अब तक की सबसे महंगी सीरीज बनने जा रही है।
‘द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स: द रिंग्स ऑफ पॉवर’
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
महागाथा को सिरे से पकड़ने की कोशिश
चर्चित महागाथाओं के पहले की कहानियां कहना, सुनाना कभी आसान नहीं रहा। यहां भारत में ही नेटफ्लिक्स ने ‘बाहुबली’ सीरीज की दोनों फिल्मों के पहले की कहानियां बनाने की दो बार कोशिश की। दोनों बार पूरी की पूरी सीरीज बनकर खारिज हो चुकी है। तीसरी कोशिश अब सिरे चढ़ती दिखती भी नहीं। यहां जे आर आर टोल्किन के लिखे उपन्यास ‘द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ पर बनी फिल्मों से कोई हजार साल पहले की कहानी ‘रिंग्स ऑफ द पॉवर’ में कहने की कोशिश की जा रही है। सीरीज के पहले दो एपीसोड रिलीज हो चुके हैं। मामला अभी चौसर जमाने जैसा लग रहा है और आगे जाकर भले इसका असर नजर आए लेकिन सीरीज के पहले दो एपीसोड अपने विस्तार और विशालता के अभिशाप में जकड़े नजर आते हैं।
‘द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स: द रिंग्स ऑफ पॉवर’
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अंतर्कथा समझाने के चक्कर में उलझी कहानी
चार साल पहले ‘द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स: द रिंग्स ऑफ पॉवर’ बनाने की पहली हलचल सुनाई थी। यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि ये सीरीज ‘लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ और ‘हॉबिट’ के किरदारों की कहानी तो कहती है लेकिन इसका इन पर बन चुकी पहले की फिल्मों से वास्ता न के बराबर है। ये जे आर आर टॉल्कीन की महागाथा की क्षेपक कथाओं पर बन रही सीरीज है। फिल्म सीरीज के किरदारों को ये उन कहानियों से हजारों साल पहले की दुनिया में ले जाती है। ये दुनिया धरती की अलग अलग परतों में बसी हैं, ये तो इन्हें देख चुके दर्शक जानते ही हैं, इस बार जानने के लिए इतना कुछ है कि पहले दो एपीसोड में दर्शकों का सिर चकरा सकता है। नेपथ्य में देर तक चलती रहने वाली एक आवाज के जरिये दर्शकों को उस मन: स्थिति के लिए तैयार किया जाता है, जिसमें उन्हें न सिर्फ फिल्म सीरीज की कहानियों से इस कहानी का रिश्ता समझ आए, बल्कि इस बरसों पुरानी दुनिया की अंतर्कथा भी वह समझ सकें।
‘द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स: द रिंग्स ऑफ पॉवर’
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ढेर सारे किरदारों में उलझी कलाकारी
अगर आपने ‘द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ सीरीज की फिल्में नहीं देखी हैं, तो सीरीज के पहले दोनों एपीसोड देखना आसान भी हो सकता है और मुश्किल भी। आसान इसलिए कि आप इसे एक नई कहानी की शुरुआत के रूप में देख सकते हैं और भारी इसलिए क्योंकि तीनों फिल्मों को देखे जमाना हो चुका है। ये दुनिया मिडिल अर्थ के समय की है। अभी यहां उम्मीद कायम है। लेकिन, शैतान कब सोया है भला। मामला जमाने की पहले दो एपीसोड की ‘लॉर्ड ऑफ द रिंग्स: द रिंग ऑफ पॉवर’ की इन कोशिशों में लोचे बहुत हैं। इतने ज्यादा किरदार इन दो एपीसोड में आ गए हैं कि इनका ताना बाना दिमाग में एक साथ बिठाना आसान नहीं है। और, जिस गति से कहानी आगे बढ़ रही है, उसमें तय है कि अभी और तमाम किरदारों का इसमें आ जुड़ना बाकी है।
‘द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स: द रिंग्स ऑफ पॉवर’
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पहले दो एपीसोड काफी बोझिल
इंसान मनोरंजन के लिए ओटीटी या सिनेमा क्यों देखता है? अपने काम के बोझ से मुक्ति पाने के लिए और अपने मस्तिष्क को थोड़ा आराम देने के लिए। इस कसौटी पर वेब सीरीज ‘द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स: द रिंग्स ऑफ पॉवर’ कमजोर है। कथा गढ़ने वालों ने इसे आम दर्शक के लिए इतना कठिन बना दिया है कि इसे समझने के लिए एक नए सिलेबस को समझने जैसी मेहनत करनी पड़ सकती है। कलाकार भी करीब करीब अनजाने से हैं तो स्क्रीन पर निगाहें जमाए रखने के लिए मेहनत भी ज्यादा करनी होती है और किरदारों की गणित अपने अलग ही समीकरण में यहां दिखती है।
‘द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स: द रिंग्स ऑफ पॉवर’
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देखें कि न देखें
इस सीरीज के पुराने दर्शकों को ‘द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स: द रिंग्स ऑफ पॉवर’ से पहली उम्मीद यही होती है कि तकनीक के बदले दौर में ये पिछली फिल्मों से बेहतर सीरीज के रूप में सामने आएगी। न्यूजीलैंड दर्शन सरीखे दृश्यों में ये प्रभावित भी करती दिखती है लेकिन जैसे ही मामला स्टूडियो में शूट किए गए दृश्यों पर आता है, साफ समझ में आता है कि किरदारों के पीछे का सारा वातावरण नकली है। सीरीज को सजाने संवारने पर इतना ज्यादा फोकस रखना भी नुकसानदेह होता है क्योंकि तब कहानी का बनावटीपन जाहिर होने लगता है। सीरीज को देखना शुरू करने से पहले इस महागाथा की पिछली फिल्में देखने से आसानी हो सकती है लेकिन इस रंग बदलती दुनिया में इतना समय ही किसके पास है। तो समझ तो गए होंगे कि करना क्या है!