निर्मल पाठक की घर वापसी
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
यशोदा से देवकी तक की कहानी
वेब सीरीज ‘निर्मल पाठक की घर वापसी’ की कहानी एक लेखक की कहानी है। पिता भी लेखक और मां भी लेखक। लेकिन ये मां, ‘यशोदा’ है। बेटा ‘देवकी’ के पास लौट रहा है। रास्ते का संघर्ष पारकर बेटा घर आता है। अपने छोटे भाई से पटरी न बैठ पाने के चलते 24 साल पहले शहर चले गए बड़े भाई का बेटा। चचेरा भाई उसे राम कहता है और खुद को लक्ष्मण। इलाके के विधायक अब सांसद बनने जा रहे हैं और इस छोटे को अपने घर का दामाद। छोटे की नजर उनसे खाली हो रही कुर्सी पर है। विधायक बनने के सपने देखने वाले युवा गांवों में अपना रुआब बनाने के लिए क्या कुछ करते हैं, उसकी असल झलक दिखाते दिखाते सीरीज संयुक्त परिवारों के अंतर्जाल के ताने बाने खोलने लगती है। भाइयों के यहां रह रही एक बुआ है। बाबा हैं जिन्हें अपने बड़े बेटे के जाने का गम अब भी खाए जा रहा है। छोटे भाई के तीन चार दोस्त हैं और है वह मां, जो अब भी अपने सिंदूर और मंगलसूत्र की दमक लौटने के इंतजार में है।
निर्मल पाठक की घर वापसी
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हाशिये पर सधी दमदार वेब सीरीज
‘निर्मल पाठक की घर वापसी’ जैसी वेब सीरीज दूसरों के बताए जाने पर ही देखी जाएगी। और, दिक्कत ये है कि बड़े निर्माताओं की वेब सीरीज के लिए आसमान सिर पर उठाए रखने वाले ओटीटी के लोग ऐसी वेब सीरीज के प्रचार प्रसार को खास तवज्जो देते नहीं हैं। पर, सोनी लिव की वेब सीरीज ‘निर्मल पाठक की घर वापसी’ प्राइम वीडियो की सीरीज ‘पंचायत’ के दूसरे सीजन से बेहतर बन पड़ी है। 24 साल बाद घर लौटा बेटा जब परिवार वालों से तंग आकर वापस शहर जाने को होता है तो मां कहती है, ‘छोड़ के गईल आसान होला, रुक के बदले मुस्किल’। लगता है जैसे देश के सारे गांवों की माएं अपने बेटों से गांवों में रहने की विनती कर रही हैं कि बेटो रुको, तुम्हारी जरूरत शहर में नहीं यहां गांव में है।
निर्मल पाठक की घर वापसी
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अलका अमीन ने जीता दिल
शूटिंग इस वेब सीरीज की भी मध्य प्रदेश में ही हुई है लेकिन कहानी ये बिहार की है। कहानी में मां और बुआ ठेठ भोजपुरी बोलती हैं तो कहानी का धरातल और मजबूत होता है। 24 साल से अपने पति और बेटे का इंतजार करती संतोषी मां के किरदार में अलका अमीन ने इस सीरीज में दिल जीते हैं। समंदर की लहरों जैसी इधऱ उधऱ भटकती कहानी के बहाव में उनका किरदार सीरीज को लंगर सरीखा साधे रहता है। वह परदे पर जितनी देर नहीं दिखती हैं, दर्शक बेचैन रहता है। बुआ बनी गरिमा सिंह की सहजता इस कहानी का मस्तूल है। निभा बनीं तनिष्क और रीना बनीं स्तुति और गीतांजलि के किरदार में इशिता, कहानी का हर महिला किरदार अपने अपने मन की पीड़ा दबाए बैठा है। हर एक को एक कंधे की तलाश सी दिखती है।
निर्मल पाठक की घर वापसी
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सामाजिक अंतर्धारा पर सीधी चोट
और, इस सीरीज का कम्पास है निर्मल पाठक और आतिश पाठक का रिश्ता। बाहर से आने वाले बड़े भाई के लिए जान निछावर करने को तैयार रहने वाला है ये छोटा भाई। बड़े के पैर जमीन पर पड़ने से पहले ही चप्पल पहना देने वाले छोटे भाई के अपने सपने हैं। उसे विधायक बनना है। पिता का साथ मिला हुआ है। और, इलाके के सांसद का भी। वैभव तत्ववादी बड़े भाई की गरिमा लिए हुए दिखते हैं और आकाश मखीजा छोटे भाई से उतावलापन। दोनों की जुगलबंदी सीरीज की जान है। चाचा बने पंकज झा और सांसद बने विनीत कुमार कहानी में तनाव लाकर इसे ताने रखने का बढ़िया काम करते हैं। और, इन सबके बीच कुमार सौरभ, तरुण कुमार भी अपनी कला दिखा ही जाते हैं। एक जगह लबलभिया कहता है, ‘बड़का लोगन के घर में हमको पहली बार चाय मिला तो हम उसी में खुस हो गए। कप चीनी मिट्टी का है इस पर कभी ध्यान ही नहीं गया।’ ये इस सीरीज की अंतर्धारा है।
निर्मल पाठक की घर वापसी
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बेहतरीन साउंड डिजाइन का कमाल
वेब सीरीज ‘निर्मल पाठक की घर वापसी’ का लेखन और निर्देशन सब बढ़िया है, लेकिन अरसे बाद किसी वेब सीरीज में कमाल का साउंड डिजाइन करने वाले अनिल कुमार कोनकांडला विशेष उल्लेख के हकदार हैं। आग में जलती लकड़ियों के चटकने से लेकर गांव की एक एक प्राकृतिक आवाज उन्होंने खूबसूरती से संजोई है। सिनेमैटोग्राफी में ड्रोन का इस्तेमाल इधर खूब बढ़ रहा है, इससे धरातल का विस्तार भी अच्छा दिखता है लेकिन इसका ज्यादा इस्तेमाल दर्शक को भटकाता भी है। बक्सर के किसी गांव में 24 साल पहले के दंपती का पसंदीदा गाना कोई हिंदी खड़ी बोली का गाना होगा, ये खटकता है। हर संवाद भोजपुरी में बोलने वाली मां का उसे साथ साथ गाते दिखना भी सही नहीं लगता। लेकिन, ऐसी छोटी मोटी दिक्कतों के बावजूद वेब सीरीज ‘निर्मल पाठक की घर वापसी’ का अपना एक प्रवाह है और ये प्रवाह आखिर तक बांधे रखने में कामयाब है। इसे बनाने वाले इस कहानी में बहुत कुछ कहना चाहते हैं, उसके चलते कहीं कहीं संतुलन गड़बड़ाता है लेकिन सीरीज के दूसरे सीजन में इसकी साज संभाल की उम्मीद भी आखिर तक बनी रहती है।
देखें कि न देखें
हिंदी हृदय प्रदेश की कहानियों को वहां की मिट्टी की खुशबू और किरदारों के तेवर के साथ पेश करना बिल्कुल श्रीलाल शुक्ल की ‘राग दरबारी’ को पढ़ने जैसा होना चाहिए। इस पैमाने पर वेब सीरीज ‘निर्मल पाठक की घर वापसी’ बिल्कुल खरी उतरती है। पहला मौका मिलते ही इसे बिंज वॉच कर डालिए।