फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Aarya 2 Review: न्यू मिलेनियल्स की ‘मदर इंडिया’ बनी ‘आर्या’, अपनों के ही चक्रव्यूह की चौकस कहानी

विज्ञापन
आर्या सीजन 2 - फोटो : अमर उजाला मुंबई
विज्ञापन
Movie Review
आर्या सीजन 2
कलाकार
सुष्मिता सेन , विकास कुमार , सिकंदर खेर , वृति वघानी , विरेन वजीरानी , प्रत्यक्ष पंवार और जयंत कृपलानी
लेखक
संयुक्ता चावला और अनु सिंह चौधरी
निर्देशक
राम माधवानी , विनोद रावत और कपिल शर्मा
निर्माता
अमिता माधवानी और एंडेमॉल शाइन इंडिया
ओटीटी
डिज्नी प्लस हॉटस्टार
रेटिंग
3/5

हिंदी सिनेमा में हाशिये पर पहुंच चुकी हर हीरोइन या कहें कि 40 पार कर चुकी हीरोइनें इन दिनों ओटीटी पर ‘मेर ऑफ ईस्टटाउन’ होना चाहती हैं। सुष्मिता इस मामले में केट विस्लेंट से आगे हैं कि उन्होंने डच सीरीज ‘पेनोजा’ पर आधारित हिंदी वेब सीरीज ‘आर्या’ उससे पहले की। ओटीटी की बलिहारी है कि हिंदी दर्शकों को भी महिलाओं की समाज में प्रेम और विवाह से इतर भूमिका भी नजर आने लगी है। कामकाजी मांएं भी कहानियों की नायिकाएं बन रही हैं, ये एक स्वागत योग्य कदम है। दर्शकों ने सुष्मिता सेन की अदाकारी के पुनर्जन्म को ‘आर्या’ के पहले सीजन में हाथों हाथ लिया था, सीरीज हालांकि अपना रंग अब जाकर दूसरे सीजन में जमाने में कामयाब हो रही है। एक बिल्कुल निपट अनजान माहौल में आ फंसी तीन बच्चों की एक मां की अपनों के ही रचे चक्रव्यूह में घिरे होने की ये कहानी सिर्फ एक मां का संघर्ष नहीं है। ये मानवता, रिश्तों और रकीबों सब का संघर्ष है। यहां सब कुछ स्याह या सफेद नहीं है। हर किरदार कहीं बीच में अटका हुआ है। सही और गलत के बीच लटका हुआ है और इन धूसर रास्तों पर चलकर ही ‘आर्या’ का सीजन 2 एक ऐसे मोड़ पर आ टिका है जहां आगे की जानने की इच्छा फिर बलवती हो जाती है।

विज्ञापन

सुष्मिता सेन - फोटो : अमर उजाला मुंबई
‘आर्या’ सिर्फ एक नाम नहीं है। आर्या सरीन एक बिम्ब है समाज की उन महिलाओं का जिन्होंने एक बड़े खानदान की बहू बनने के बाद भी अपनी पहचान को संजोने का जतन किया। कारोबारी घरानों के ग्लैमरस चेहरों के पीछे कितनी बदसूरतें छिपी होती हैं, ये इस कहानी का असली मर्म है। हर रिश्ते का एक क्षेपक है और हर क्षेपक आगे चलकर अपने अलग ही दोहे, सोरठे, छंद और चौपाइयां गढ़ता जाता है। आर्या को उसका भरोसेमंद पुलिस अफसर विदेश से वापस तो ले आया है लेकिन उसकी सारी कोशिशों पर पानी तब फिरता दिखता है जब आर्या अपना अलग ही रास्ता पकड़ने निकल पड़ती है। अपनों के खिलाफ पुलिस उसे इस्तेमाल करना चाह रही थी। और पहले से ही अपने खिलाफ हो चुके अपनों को बचाने के चक्कर में आर्या ने अब पुलिस को भी अपने खिलाफ कर लिया है। जान देने की कोशिश करने में किसी तरह बची अवसाद की शिकार बेटी और दोनों बेटों की ढाल बनने की कोशिश करती आर्या ‘खून भरी मांग’ की नायिका नहीं है। वह सीढ़ी दर सीढ़ी अपराध की दुनिया के इस तहखाने में उतरती है और आखिर में पता ये चलता है, ‘कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।’ ‘कहानी तो अब शुरू हुई है।’

सुष्मिता सेन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
कोई पांच साल तक कैमरे से दूर रहने के बाद सुष्मिता सेन ने ‘आर्या’ के पहले सीजन में दमदार वापसी की। इस किरदार को लेकर सर्वश्रेष्ठ अभिनय के सात पुरस्कार जीतने की बात वह अपनी हर बातचीत में दोहराती हैं। अदाकारी सुष्मिता की रग रग में हैं। कटरीना कैफ की शादी की बात छिड़ते ही जिस अदा से वह सिर नीचे झुकाकर सवाल पूछने वाले को अपने आंखों की सच्चाई पढ़ने से रोकती हैं, वह उनकी निराली अदा है। असली कलाकार ऐसा ही होता है। वह हर वक्त अभिनय ही करता रहता है। कैमरा ऑन हो ना हो। सुष्मिता से इस तरह की अदाकारी कराने के लिए पूरा क्रेडिट राम माधवानी की उस कैमरा प्लेसिंग को जाता है जिसमें किसी कलाकार को अपने किसी खास देह भाग को अभिनय के लिए अलग से उत्साहित नहीं रखना होता। यहां कैमरा कहां है, अक्सर कलाकार को पता भी नहीं होता। वेब सीरीज ‘आर्या’ के दूसरे सीजन में भी सुष्मिता फिर से इसीलिए कमाल लगी हैं।

आर्या 2 - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
लेकिन, वेब सीरीज ‘आर्या’ की असली चमक इसकी गैलेक्सी के दूसरे सितारे हैं। जयंत कृपलानी का फ्रेम में होना ही इसकी दमक बढ़ा देता है। आर्या के तीनों बच्चे वृति वघानी, विरेन वजीरानी, प्रत्यक्ष पंवार अद्भुत अभिनय करते हैं। अवसाद की शिकार बेटी के रूप में वृति प्रभावित करती हैं तो विरेन की मैच्योरिटी उनके अभिनय स्तर को दर्शाती है। आकाश खुराना, गीतांजलि कुलकर्णी और अंकुर भाटिया अपने अपने किरदारों में पूरी तरह रमे नजर आते हैं। दर्शक बीच बीच में नमित दास और चंद्रचूड़ सिंह को मिस तो करते हैं लेकिन सिकंदर खेर और विश्वजीत प्रधान दर्शकों का ध्यान भटकने नहीं देते। एक विश्वस्त सिपहसालार के तौर पर सिकंदर ने फिर एक बार अपनी छाप छोड़ी है। उम्र के साथ उनका अभिनय भी निखर रहा है और अब समय है कि उनको लीड किरदार वाली कोई वेब सीरीज या फिल्म मिलनी चाहिए। विश्वजीत प्रधान एक अलग ही रंग में हैं। उनके चेहरे से उनके किरदार का काइयांपन खूब झलकता है। कई बार तो उनमें शक्ति कपूर का अक्स भी उभरता नजर आता है।
विज्ञापन

आर्या - फोटो : सोशल मीडिया
तकनीकी रूप से वेब सीरीज ‘आर्या’ ठीक ठाक है। लेखकों की लंबी चौड़ी फौज होने के चलते इसका प्रवाह तीसरे एपीसोड के बाद थोड़ा बहकता दिखता है लेकिन कहानी और पटकथा आखिर तक आते आते मैनेज हो ही जाती है। ‘पेनोजा’ के भारतीय संस्करण में सफल रहे राम माधवानी को सुदीप सेनगुप्ता की चित्ताकर्षक फोटोग्राफी से खूब मदद मिली है। खूशबू राज और अभिमन्यु चौधरी के वीडियो संपादन में बेहतरी की गुंजाइश दिखती है खासतौर से चौथे और पांचवे एपीसोड में वास्तविकता स्थापित करने की कोशिश करने वाले शेकी शॉट्स से बचा जा सकता था। विशाल खुराना का संगीत वेब सीरीज ‘आर्या’ की पृष्ठभूमि के हिसाब से थोड़ा अलग है। यहां उनकी कथा के कलेवर को समझ पाने में अनुभव की कमी भी झलकती है। समय हो तो वेब सीरीज ‘आर्या’ देखने में बुराई नहीं है। आखिर तक ध्यान अपने पर बनाए रखने में ये कहानी उत्तीर्ण है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें