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छोटे परदे के स्टार्स के पास है समय की कमी

Wed, 08 May 2013 04:39 PM IST
अपराजिता अग्रवाल
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छोटे परदे के सितारे हर दिन आपको हंसाते-रुलाते हैं, पर इस चक्कर में उनके पास खुद के लिए वक्त ही नहीं बचता है।
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बरुण सोबती, जिन्होंने टीवी पर ‘इस प्यार को क्या नाम दूं’ नाम के अपने पॉपुलर शो को अलविदा कह दिया था, का कहना है, `इस देश में लेबर लॉ के मुताबिक आपको एक हफ्ते में 45 घंटे काम करना चाहिए, लेकिन टीवी इंडस्ट्री में 84 घंटे काम करना पड़ता है।'

लेकिन इतना काम क्यों, जब एक सीरियल का समय सिर्फ 15-20 मिनट ही होता है? दरअसल टीवी की दुनिया के लिए अलग से नियम-कानून की जरूरत है।

सुप्रीम कोर्ट के वकील अनुराग तोमर इस संदर्भ में बताते हैं, 'इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट के दायरे में टीवी सितारे नहीं आते। छोटे परदे के सितारे और निर्माताओं में कर्मचारी और मालिक का रिश्ता नहीं है, क्योंकि इन सितारों की कोई स्थायी तन्ख्वाह नहीं होती। कोई भी परेशानी होने पर ये सितारे सिविल लॉ के तहत निर्माताओं पर कानूनी कार्यवाही कर सकते हैं।'
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पॉपुलर चैनल पर आ रहे शो ‘संस्कार : धरोहर अपनों की’ के केंद्रीय किरदार जय सोनी बताते हैं कि, 'कई बार सीरियल की कहानी के मुताबिक ज्यादा काम करना पड़ता है। एक टीवी सितारा 20 घंटे काम करता है। उसे सिर्फ 4 घंटे सोने को मिलते हैं।'- शो का डेली आना भी इसका कारण है।

‘दिया और बाती हम’ के निर्माता शशि मित्तल कहते हैं, `रोज एक एपिसोड बनाना है, तो स्क्रिप्टिंग और शूटिंग का काम लंबा चलेगा ही।'

'सपने सुहाने लड़कपन के' शो में रोल कर रहे अंकित गेरा के मुताबिक,  वीकएंड के महाएपीसोड भी काम बढ़ा देते हैं।' इस मामले में सीरियल के लीड किरदार पर दबाव ज्यादा होता है, क्योंकि उन्हें हर दूसरे फ्रेम में दिखाया जाता है। इसीलिए कुछ को तो अपने लोकप्रिय हो रहे किरदार से भी हाथ धोना पड़ जाता है। यही हाल हुआ प्रत्यूषा बैनर्जी का।

प्रत्यूषा ने हाल ही में अपनी मां और अपनी तबीयत खराब होने की वजह से पॉपुलर शो 'बालिका वधू' छोड़ दिया। उनका कहना है, 'आपकी कोई निजी जिंदगी नहीं रहती और अगर स्पेशल एपिसोड हो तो समय लगने की कोई सीमा नहीं।'
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नए ट्विस्ट की डिमांड भी अचानक शूटिंग शिड्यूल का कारण बनती है। कई सौ या हजार एपिसोड्स की लंबी कहानी एक साथ लिख लिया जाना संभव ही नहीं है।

‘ना बोले तुम ना मैंने कुछ कहा’ के निर्माता सुधीर शर्मा बताते हैं, 'अगर कहानी पहले से ही तय हो तो काम काफी हद तक आसान हो जाता है। शो की अच्छी टीआरपी नहीं आए तो अचानक पूरी कहानी बदलनी पड़ती है।' हालांकि सिंटा (सिने एंड टीवी स्टार्सएसोसिएशन) के 12 घंटे काम के नियम के बाद काफी राहत है।
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