दर्शन ने शिकायत में क्या कहा?
साल की शुरुआत में 16 जनवरी को दर्शन ने आईबी मिनिस्ट्री में एक हजार से अधिक यूट्यूब लिंक का हवाला देते हुए शिकायत दर्ज कराई थी। साथ ही दोषी चैनलों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। अधिकारियों द्वारा कोई कार्रवाई न किए जाने पर दर्शन ने हाईकोर्ट का रुख किया।
अपनी याचिका में उन्होंने उन्होंने कहा कि मीडिया कर्नाटक हाईकोर्ट द्वारा न्यायालय और शहर की सिविल अदालत द्वारा 2024 में पारित आदेशों का घोर उल्लंघन कर रहा था। जिसमें मीडिया को मामले से जुड़ी संवेदनशील जानकारी दिखाने या बताने से रोकने पर प्रतिबंध लगाना शामिल है।
दर्शन ने यह भी दावा किया कि मीडिया चैनल ग्राफिक्स और एआई से तैयार किए एनिमेशन दिखाकर अदालती कार्यवाही और कथित घटनास्थन को अपने तरीके से बनाकर दिखा रहे हैं। यही नहीं निचली अदालत द्वारा दर्ज किए गए सबूतों पर चर्चा कर रहे हैं। मीडिया चैनल जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण ढंग से कार्यवाही और मामले से जुड़ी जानकारी की दिखा या छाप रहे हैं।
मीडिया प्रेरित न्याय लोकतंत्र के लिए खतरा
बेंच ने सुप्रीम कोर्ट, यूएसए के सर्वोच्च न्यायालय और यूके व फ्रांस की कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि इन सभी अदालतों का ये मानना है कि मीडिया रिपोर्टिंग को न्यायिक फैसलों का स्थान लेने या न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
दर्शन द्वारा दिखाई गई फुटेज को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि ये व्यवहार एक सुनियोजित मीडिया से प्रेरित न्यायनिर्णय के समान है, जो मुकदमे से पहले एक पूर्वाग्रह को जन्म देता है। कोर्ट ने कहा कि फ्रीडम ऑफ स्पीच संवैधानिक अधिकार है, लेकिन अगर यह मीडिया प्रेरित न्याय में बदल जाता है, तो यह लोकतंत्र की रक्षा करने की बजाय, उसके लिए खतरा बन जाती है।
मीडिया सिर्फ एक पहरेदार होती है, लेकिन अगर ये जज या जूरी की भूमिका निभाने लगे, तो यह कानून के लिए खतरा बन सकती है। हम इससे न्यायालय की प्रक्रिया को प्रभावित नहीं होने दे सकते।
इसलिए कोर्ट केंद्र सरकार को ये आदेश देता है कि वो इस मामले को गंभीरता से देखे और जरूरी कदम उठाए। वर्ना कोर्ट मामले में दखल देगा और संबंधित मीडिया संस्थान के लाइसेंस रद्द करने तक पर विचार किया जा सकता है।