मटका किंग रतन खत्री-फिल्म 'मटका' का दृश्य
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क्या होता है मटका खेल
मटका एक प्रकार का जुए का खेल है। यह गैरकानूनी खेल है। दरअसल, इस खेल में बहुत जोखिम होता है, लेकिन लोग ज्यादा पैसा पाने के लालच में इस खेल का हिस्सा बनते हैं। इस खेल की शुरुआत न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज से बॉम्बे कॉटन एक्सचेंज में भेजे जाने वाले कपास की शुरुआती और समापन दरों पर सट्टा लगाने से शुरू हुई। लेकिन इस तरह के सट्टे पर प्रतिबंध लगाया गया। ऐसे में जो सट्टा लगाने वाले लोग थे, उन्होंने दूसरे रास्ते तलाश किए। अब कागज के टुकड़ों पर संख्या लिखी जाती और उन्हें एक मटके में डाल दिया जाता था। फिर एक व्यक्ति एक चिट निकालता था और जीतने वाले नंबरों की घोषणा करता था। जिसके पास वहीं नंबर होता, वह व्यक्ति खेल में पैसे जीत जाता। इस तरह से इस खेल का नाम मटका ही पड़ गया, लेकिन यह एक तरह का जुआ ही है।
मुंबई में कब शुरू हुआ
ऐसा कहा जाता है कि 1962 में कल्याणजी भगत ने मुंबई में वर्ली मटका शुरू किया। वहीं रतन खत्री ने 1964 में न्यू वर्ली मटका की शुरुआत की, जिसमें खेल के नियमों में थोड़े बदलाव किए गए। कल्याणजी भगत का मटका हर दिन चलता था, जबकि रतन खत्री का मटका सप्ताह में केवल पांच दिन ही चलता था। यह मटका खेल इतना लोकप्रिय हुआ कि मुंबई के कपड़ा मिल मजदूर भी इसे खेलते। ऐसा कहा जाता है कि 1980 और 1990 के दशकों में मटका कारोबार अपने चरम पर पहुंच गया। हर महीने 500 करोड़ रुपए से अधिक की सट्टा राशि लगाई जाती। पुलिस को इन पर लगातार कार्यवाही करनी पड़ती। इस खेल में रतन खत्री बहुत बड़ा नाम बना, वह देश और विदेश में करोड़ों रूपए की सट्टेबाजी में शामिल पाया गया।
कमजोर पड़ा मटका का खेल
यह खेल पहले ही अवैध था लेकिन इसमें पैसा बहुत अधिक बनता था। ऐसे में कहा जाता है कि एक समय में इसमें बड़े अपराधी किस्म के लोग भी शामिल हो गए। पुलिस को ऐसे में मटका खेल पर और भी सख्ती करनी पड़ी। धीरे-धीरे यह खेल कमजोर पड़ा, लेकिन आज भी यह मटका खेल मुंबई के ईद-गिर्द के इलाकों में खेला जाता है।