कुश्ती की प्रतियोगिताओं में लेते थे हिस्सा
बचपन से ही उनका रुझान शारीरिक खेलों की तरफ था। खासकर कुश्ती में उनकी गहरी दिलचस्पी थी। स्कूल और कॉलेज में वो अक्सर प्रतियोगिताओं में भाग लेते और अव्वल आते। उनका सपना था कि वो एक दिन पहलवान बनें, लेकिन किस्मत ने उनके लिए कुछ और ही सोच रखा था।
सुरेश को खेलों के रूचि के साथ-साथ छोटी उम्र से ही भजन और संगीत सुनने का भी शौक था। पिता भी भजन गाया करते थे, जिससे घर में संगीत के संस्कार पनपने लगे। महज 5‑6 वर्ष की उम्र में ही उनके पिता ने उनकी गायकी में प्रतिभा देख ली और प्रारंभिक संगीत शिक्षा शुरू कर दी।
पहलवान से कैसे बन गए गायक?
8 वर्ष की उम्र में सुरेश वाडकर की संगीत प्रतिभा परंपरागत गुरु अचायरी जियालाल वसंत ने पहचानी और उन्हें ट्रेन करना शुरू किया। उन्होंने गुरुकुल पद्धति में शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दी एवं गुरु के संरक्षण में स्कूली पढ़ाई भी की। बाद में प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद से उन्होंने साल 1968 में प्रभाकर प्रमाणपत्र प्राप्त किया। इसके बाद वो मुंबई के आर्य विद्या मंदिर में संगीत शिक्षक के रूप में जुड़े और पेशेवर रूप में शिक्षा देना शुरू किया।
कॉलेज के दिनों में उन्होंने संगीत प्रतियोगिता में भाग लिया और वहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई। जिस प्रतियोगिता में उन्होंने भाग लिया था, वो प्रतिष्ठित 'संगीत नाटक अकादमी' द्वारा आयोजित की गई थी। प्रतियोगिता में जीत दर्ज करने के बाद उन्हें संगीत को करियर बनाने की प्रेरणा मिली।
गुरु से मिले मार्गदर्शन ने बदली किस्मत
साल 1976 में आयोजित हुए इसी सिंगिंग मुकाबले के बाद उन्हें बड़ा ब्रेक मिला। इस तरह बॉलीवुड में उन्हें एंट्री का मौका संगीतकार रवींद्र जैन ने दिया और उन्होंने अपनी खास आवाज से एक अलग ही पहचान बनाई। उनकी गायकी में रागों की गहराई और सुरों की नजाकत है, जो उन्हें अन्य गायकों से अलग करती है। उन्होंने न केवल हिंदी फिल्मों में बल्कि मराठी, कोंकणी और भक्ति गीतों में भी अपनी छाप छोड़ी है।
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लता मंगेशकर ने दी नई उड़ान
बॉलीवुड में सुरेश वाडकर की प्रतिभा को सबसे पहले पहचाना भारत रत्न लता मंगेशकर ने। उन्होंने सुरेश की आवाज से प्रभावित होकर राज कपूर से सिफारिश की कि वो इस युवा गायक को मौका दें। राज कपूर अपनी फिल्म 'प्रेम रोग' के लिए गायक की तलाश कर रहे थे और लता जी के कहने पर उन्होंने सुरेश को मौका दिया। फिल्म 'प्रेम रोग' का गाना "मेरी किस्मत में तू नहीं शायद" सुरेश वाडकर के करियर का टर्निंग पॉइंट बन गया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
भक्ति संगीत में भी खास मुकाम
फिल्मी गानों के साथ-साथ सुरेश वाडकर भक्ति संगीत में भी काफी सक्रिय रहे हैं। हनुमान चालीसा, शिव तांडव स्तोत्र, विठ्ठल भजन, साईं बाबा आरती और गणेश वंदना जैसे कई लोकप्रिय भक्ति गीत उनकी आवाज में बेहद लोकप्रिय हैं। उनके द्वारा गाए गए भक्ति गीतों को देशभर में भक्तिपूर्ण वातावरण में सुना जाता है। आज भी कई मंदिरों और धार्मिक कार्यक्रमों में उनके भजन अनिवार्य रूप से गूंजते हैं।
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