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Samwad 2026: ‘कभी पत्रकार बनना चाहती थी फिर संगीत की रुचि हावी हो गई’, संवाद के मंच पर बोलीं ऋचा चड्ढा

Mon, 18 May 2026 05:22 PM IST
Jyoti Raghav एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला

सार

Amar Ujala Samwad Lucknow 2026: अमर उजाला संवाद उत्तर प्रदेश 2026 का आयोजन राजधानी लखनऊ में जारी है। यहां अभिनेत्री ऋचा चड्ढा भी पहुंची हैं। उन्होंने यहां सिनेमा और अपनी पसर्नल लाइफ पर बात की। जानिए ऋचा ने कार्यक्रम में क्या कहा?
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ऋचा चड्ढा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अमर उजाला संवाद उत्तर प्रदेश 2026 का मंच सज चुका है। राजधानी लखनऊ में जारी इस कार्यक्रम में अभिनेत्री ऋचा चड्ढा ने भी शिरकत की है। इस दौरान उन्होंने अपने करियर, अभिनय और सिनेमा से जुड़े कई पहलुओं पर दिलचस्प बातें साझा कीं। पढ़िए कुछ अंश... 

मेरी सफलता मेरी खुद की है
मंच पर पहुंचीं ऋचा से जब पूछा गया कि क्या स्टेज पर आने पर या परफॉर्म करते वक्त नर्वसनेस होती है? तो एक्ट्रेस ने कहा, 'नर्वस तो नहीं होती लेकिन जब मेरी इतनी तारीफ होती है तो अविश्वसनीय लगता है। लखनऊ मेरा ससुराल है। अपनी यात्रा को लेकर मैं बहुत तहे दिल से शुक्रगुजार हूं। मुझे इस बात की खुशी है कि मुझे मेरे पसंदीदा करियर में मुकाम मिला है। मैं फिल्मी खानदान से नहीं हूं। तो यह अच्छा लगता है कि यहां तक अपने दम पर पहुंची हूं। लोग नेपोटिज्म पर बात करते हैं। मगर, इसका उल्टा भी होता है। मेरा सक्सेस मेरा खुद का है।
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जीत-हार के बारे में ज्यादा नहीं सोचती
मंच पर ऋचा ने कहा, 'किसी का करियर या जिंदगी एक प्रोसेस होती है। उसमें कोई डेस्टिनेशन नहीं होती। मैं जीत और हार के बारे में ज्यादा नहीं सोचती। मुझे अच्छा लगता है कि मैं अपने उसूलों को कायम रखकर अपना काम चुन-चुनकर यहां तक पहुंची हूं। हां, करियर की शुरुआत मैं जरूर कुछ ऐसी स्क्रिप्ट में काम किया जिन्हें कहते हैं कि अपना दिमाग घर पर रखकर आओ।'

ऋचा चड्ढा - फोटो : अमर उजाला
कभी जर्नलिस्ट बनने की चाहत थी
क्या ऋचा हमेशा से अभिनेत्री बनना चाहती थीं? पूछा जाने पर ऋचा ने कहा, 'बनना तो चाहती थी पर मुझे पढ़ने-लिखने का बहुत शौक था। मैं जर्नलिस्ट भी बनना चाहती थी। मेरी हिंदी-इंग्लिश दोनों बहुत अच्छी थी। म्यूजिक में भी रुचि थी। एक्टिंग का शौक था। फिर यह रुचि, ऋचा पर हावी हो गई और मैंने अपना करियर पथ चुना।'

मैंने हमेशा स्ट्रगल का स्वाद लिया
अपने शुरुआती दौर पर बात करते हुए ऋचा ने कहा, 'शुरुआत में मेरा बहुत स्ट्रगल रहा। मैं कोई दुख की ऐसी कहानी आपके साथ नहीं साझा करना चाहती कि मैं रेलवे स्टेशन पर सोई। मैंने स्ट्रगल का बहुत स्वाद लिया। यही सोचा कि जब मेरे पास फेम और पैसा आ जाएगा तो यह संघर्ष के दिन मुझे कितने याद आएंगे। कभी केतली में मैगी बनाकर भी खाती थी, वो स्ट्रगल सबका होता है पर ऊपर वाला बहुत कृपालु रहा।'

ऋचा चड्ढा - फोटो : अमर उजाला
लोग क्या कहेंगे? यह नहीं सोचती
मंच पर ऋचा ने कहा, 'दुनिया का सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग। मुझे यह रोग नहीं पालना। मैं अपने सपनों के लिए, अपने समाज के लिए काम करना चाहती हूं। इसमें कुछ तो लोग कहेंगे... लोगों का काम है कहना, यह गाना सुनकर मैं अपना मन बहला लेती हूं। यह हमारी जर्नी का हिस्सा है।'

पैरेंट्स ने हमेशा साथ दिया
परिवार की बात करते हुए अभिनेत्री ने कहा, 'मेरे माता-पिता को बहुत सपोर्ट रहा है। हालांकि, वे शुरुआत में चाहते थे कि मैं पीएचडी करूं और पढ़ाऊं। वो खुद एकेडमिक बैकग्राउंड से हैं। मेरा मन यह है कि अपनी पावर को अच्छे से यूज किया जाए। इसी दिशा में काम किया जाए। मैं जैसे-जैसे अपने करियर और जिंदगी में आगे बढ़ रही हूं तो मुझे यह जिम्मेदारी ज्यादा महसूस कर रही हूं।'
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ऋचा चड्ढा - फोटो : अमर उजाला
इन सवालों के भी दिए जवाब

इंडस्ट्री को एक सोच बदलनी हो तो कहां जरूरत है उसकी?
मुझे बॉलीवुड में कुछ नहीं बदलना। वह एक सोसाइटी की झलक है। सोसाइटी बदलेगी तो बॉलीवुड बदल जाएगा। हमें ऐसी सोसाइटी बनाने है, जो बराबरी की हो, महिलाओं की इज्जत करे। ऐसा कुछ सोसाइटी होगी तो इंडस्ट्री में भी ऐसा हो जाएगी। मुझे लगता है कि औरत के अनगिनत लेबर पर हम गाने बनाते हैं। आज उसी की वजह से विज्ञापनों में कितना बदलाव है। यह बदलाव समाज में तेजी से दिखते हैं।

औरतों से कहा जाता है कि आपको बैलेंस करना होगा। आप इसे किस नजरिए से देखते हैं?
बैलेंस तो हम सबको करना पड़ता है। ग्रैविटी हमें बैलेंस पर रखती हैं। आपकी जड़ें जितनी मजबूत हों। परिवार के संस्कार जितने मजबूत हों। वह आपको स्ट्रेंथ देते हैं। मदरहुड की बात आपने की तो मैंने करीब डेढ़ साल तक आराम किया है। मैं मेंटली तैयार नहीं थी काम करने के लिए। मैंने वक्त लिया। क्योंकि लगा कि मेरे दिमाग और बॉडी को हील करने की जरूरी है। सबको ऐसा करना चाहिए। मुझे लगता है कि मर्द भी अगर चाहें तो बोलें कि मैं अपने नवजात शिशु के साथ तीन महीने रहना चाहता हूं।

मदरहुड ने कितना बदला?
बहुत धैर्य आया है। गुस्सा बहुत कम हो गया है। मदरहुड आपको सम्मान करना सिखाता है।



आप बेटी की मां हैं? आप उसे क्या सिखाना चाहेंगी?
मैं अपनी बेटी को बताऊंगी कि तुम अन्नपूर्णा हो पर शक्ति भी हो। काली का चित्र बेटी को दिखाऊंगी, जिसमें महिषासुर का सिर उनके हाथ में है। ऐसी देवी आपको कहीं नहीं मिलेगी, हिंदुस्तान के अलावा। मेरी प्रेरणा मां काली हैं। मैं अपनी बेटी को भी यह सिखाऊंगी। सिर्फ बेटी की मां नहीं, बेटों की भी। मैं चाहूंगी कि एक दिन ऐसा आए कि जो रेप पीड़िता का नाम हम छिपाते हैं, उनकी गलती थी क्या? आदमियों का नाम ब्लर करना चाहिए।

प्रोड्यूसर बनने का फैसला कब लिया? 
बतौर एक्टर तो बहुत कुछ हो जाता है। हमें पांच साल तो मुंबई समझने में लग जाते हैं। मैंने अपनी शर्तों पर ही काम किया। जो पसंद आया, उसमें रिस्क होने पर भी मैंने किया। मैं बतौंर निर्माता ऐसी कहानी कहना चाहूंगी, जो भारतीय जड़ों से जुड़ी हों लेकिन ग्लोबल उन्हें ले जा सकें। मैं कुछ अलग करना चाहूंगी। इसलिए मैंने गर्ल्स विल बी गर्ल्स प्रोड्यूस की थी।

चैरिटी करने की प्रेरणा कहां से मिली?
अली की जो मामी हैं, उन्होंने पूरे लॉकडाउन में बहुत सारे कारीगरों को नौकरी से नहीं निकाला इससे मुझे बहुत प्रेरणा मिली। मुझे लगा कभी भी चैरिटी करने से अच्छा है कि किसी को इतना सक्षम कर दो कि वह अपने परिवार के लिए कमा सके। इसकी अभी शुरुआत हुई है। इसमें छपाई का काम औरत करती हैं और कढ़ाई पुरुष करते हैं। महिला और पुरुष मिलकर काम करते हैं।

लखनऊ में क्या बदलाव आया है?
लखनऊ अपने कल्चर और खानपान को लेकर बहुत जागरुक हो गया है। मैं 2013 में भी मैंने यहा एक फिल्म शूट की थी तो कहना चाहूंगी कि मुंबई से बहुत अच्छी सड़कें हैं आपकी।

लखनऊ का कौन सा खाना पसंद है?
बताशे। हर बार मैं जरूर खाती हूं यहां आकर।

भोली पंजाबन का किरदार काफी लोकप्रिय हुआ। क्या फिर से भोली पंजाबन को देखेंगे?
बिल्कुल। मैं तो फिर से उस रोल को दोबारा निभाना चाहूंगी। कॉमेडी रोल लोगों को काफी रिलीफ देता है जीवन में। मैं एक कॉमेडी फिल्म की कहानी लिख भी रही हूं।

समाज में लड़कियों के लिए बदलाव लाना बहुत जरूरी है। आज भी लड़कियां सेफ महसूस नहीं करती हैं। घर से निकलने के लिए पेरेंट्स भी मना करते हैं। उसके लिए सोसाइटी में बदलाव कैसे आ सकता है?
अगर आपको समाज को बदलना है तो आपको आदमियों को बदलना होगा। अपनी बेटियों को घर में न रखें। बेटों पर अगर आपको डाउट है, कुछ गलत कर रहा है तो आप उसको घर में रखें। बेटियां अपने आप सेफ हो जाएंगी। मैं नहीं चाहती कि हिंदुस्तान में शरिया कानून आए, जैसा गल्फ कंट्रीज में होता है।  मैं पेरेंट्स से कहूंगी कि आप अपने लड़कों को संभालिए। मेरी बेटी अभी दो साल की भी नहीं है। मैं अखबार पढ़ती हूं। यह हर पेरेंट के दिमाग में विचार है कि अगर आपका बेटा है तो उसकी भी जिंदगी नरक होगी।

 
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