इन सवालों के भी दिए जवाब
इंडस्ट्री को एक सोच बदलनी हो तो कहां जरूरत है उसकी?
मुझे बॉलीवुड में कुछ नहीं बदलना। वह एक सोसाइटी की झलक है। सोसाइटी बदलेगी तो बॉलीवुड बदल जाएगा। हमें ऐसी सोसाइटी बनाने है, जो बराबरी की हो, महिलाओं की इज्जत करे। ऐसा कुछ सोसाइटी होगी तो इंडस्ट्री में भी ऐसा हो जाएगी। मुझे लगता है कि औरत के अनगिनत लेबर पर हम गाने बनाते हैं। आज उसी की वजह से विज्ञापनों में कितना बदलाव है। यह बदलाव समाज में तेजी से दिखते हैं।
औरतों से कहा जाता है कि आपको बैलेंस करना होगा। आप इसे किस नजरिए से देखते हैं?
बैलेंस तो हम सबको करना पड़ता है। ग्रैविटी हमें बैलेंस पर रखती हैं। आपकी जड़ें जितनी मजबूत हों। परिवार के संस्कार जितने मजबूत हों। वह आपको स्ट्रेंथ देते हैं। मदरहुड की बात आपने की तो मैंने करीब डेढ़ साल तक आराम किया है। मैं मेंटली तैयार नहीं थी काम करने के लिए। मैंने वक्त लिया। क्योंकि लगा कि मेरे दिमाग और बॉडी को हील करने की जरूरी है। सबको ऐसा करना चाहिए। मुझे लगता है कि मर्द भी अगर चाहें तो बोलें कि मैं अपने नवजात शिशु के साथ तीन महीने रहना चाहता हूं।
मदरहुड ने कितना बदला?
बहुत धैर्य आया है। गुस्सा बहुत कम हो गया है। मदरहुड आपको सम्मान करना सिखाता है।
आप बेटी की मां हैं? आप उसे क्या सिखाना चाहेंगी?
मैं अपनी बेटी को बताऊंगी कि तुम अन्नपूर्णा हो पर शक्ति भी हो। काली का चित्र बेटी को दिखाऊंगी, जिसमें महिषासुर का सिर उनके हाथ में है। ऐसी देवी आपको कहीं नहीं मिलेगी, हिंदुस्तान के अलावा। मेरी प्रेरणा मां काली हैं। मैं अपनी बेटी को भी यह सिखाऊंगी। सिर्फ बेटी की मां नहीं, बेटों की भी। मैं चाहूंगी कि एक दिन ऐसा आए कि जो रेप पीड़िता का नाम हम छिपाते हैं, उनकी गलती थी क्या? आदमियों का नाम ब्लर करना चाहिए।
प्रोड्यूसर बनने का फैसला कब लिया?
बतौर एक्टर तो बहुत कुछ हो जाता है। हमें पांच साल तो मुंबई समझने में लग जाते हैं। मैंने अपनी शर्तों पर ही काम किया। जो पसंद आया, उसमें रिस्क होने पर भी मैंने किया। मैं बतौंर निर्माता ऐसी कहानी कहना चाहूंगी, जो भारतीय जड़ों से जुड़ी हों लेकिन ग्लोबल उन्हें ले जा सकें। मैं कुछ अलग करना चाहूंगी। इसलिए मैंने गर्ल्स विल बी गर्ल्स प्रोड्यूस की थी।
चैरिटी करने की प्रेरणा कहां से मिली?
अली की जो मामी हैं, उन्होंने पूरे लॉकडाउन में बहुत सारे कारीगरों को नौकरी से नहीं निकाला इससे मुझे बहुत प्रेरणा मिली। मुझे लगा कभी भी चैरिटी करने से अच्छा है कि किसी को इतना सक्षम कर दो कि वह अपने परिवार के लिए कमा सके। इसकी अभी शुरुआत हुई है। इसमें छपाई का काम औरत करती हैं और कढ़ाई पुरुष करते हैं। महिला और पुरुष मिलकर काम करते हैं।
लखनऊ में क्या बदलाव आया है?
लखनऊ अपने कल्चर और खानपान को लेकर बहुत जागरुक हो गया है। मैं 2013 में भी मैंने यहा एक फिल्म शूट की थी तो कहना चाहूंगी कि मुंबई से बहुत अच्छी सड़कें हैं आपकी।
लखनऊ का कौन सा खाना पसंद है?
बताशे। हर बार मैं जरूर खाती हूं यहां आकर।
भोली पंजाबन का किरदार काफी लोकप्रिय हुआ। क्या फिर से भोली पंजाबन को देखेंगे?
बिल्कुल। मैं तो फिर से उस रोल को दोबारा निभाना चाहूंगी। कॉमेडी रोल लोगों को काफी रिलीफ देता है जीवन में। मैं एक कॉमेडी फिल्म की कहानी लिख भी रही हूं।
समाज में लड़कियों के लिए बदलाव लाना बहुत जरूरी है। आज भी लड़कियां सेफ महसूस नहीं करती हैं। घर से निकलने के लिए पेरेंट्स भी मना करते हैं। उसके लिए सोसाइटी में बदलाव कैसे आ सकता है?
अगर आपको समाज को बदलना है तो आपको आदमियों को बदलना होगा। अपनी बेटियों को घर में न रखें। बेटों पर अगर आपको डाउट है, कुछ गलत कर रहा है तो आप उसको घर में रखें। बेटियां अपने आप सेफ हो जाएंगी। मैं नहीं चाहती कि हिंदुस्तान में शरिया कानून आए, जैसा गल्फ कंट्रीज में होता है। मैं पेरेंट्स से कहूंगी कि आप अपने लड़कों को संभालिए। मेरी बेटी अभी दो साल की भी नहीं है। मैं अखबार पढ़ती हूं। यह हर पेरेंट के दिमाग में विचार है कि अगर आपका बेटा है तो उसकी भी जिंदगी नरक होगी।