मणिपुर के सीएम ने दी श्रद्धांजलि
मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि रतन थियम की कला में मणिपुर की आत्मा बसती थी।वो सिर्फ एक रंगकर्मी नहीं, बल्कि मणिपुरी संस्कृति के संवाहक थे। उनका समर्पण और दृष्टिकोण भारतीय थिएटर के लिए एक अमूल्य धरोहर बन चुका है।
रतन थियम के करियर की शुरुआत
रतन थियम का रचनात्मक सफर सिर्फ रंगमंच तक सीमित नहीं थी। उन्होंने पेंटिंग, कविता और लघु कहानियों से अपने कला-सफर की शुरुआत की। अपने शुरुआती दौर में वो नाट्य समीक्षक के रूप में भी सक्रिय रहे। धीरे-धीरे मंच से उनका जुड़ाव बढ़ा और वो खुद नाटक लिखने और निर्देशित करने लगे। उनके नाटकों की खासियत थी – प्राचीन भारतीय परंपराओं को समकालीन संदर्भों में ढालना।
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थिएटर ऑफ रूट्स के स्तंभ
1970 के दशक में जब भारतीय रंगमंच पश्चिमी प्रभावों से भरा हुआ था, तब रतन थियम ने 'थिएटर ऑफ रूट्स' आंदोलन को नई पहचान दी। इस आंदोलन का उद्देश्य था- भारतीय संस्कृति, दर्शन और पारंपरिक कला रूपों को नाट्य मंच पर फिर से दिखाना।
रतन थियम के यादगार नाटक
रतन थियम के नाटकों में सिर्फ कहानी नहीं होती थी, बल्कि उसमें संगीत, सीन, डायलॉग भी कमाल के होते थे। ‘उत्तर प्रियदर्शी’, ‘करणभारम्’, ‘द किंग ऑफ डार्क चैंबर’ और ‘इम्फाल इम्फाल’ जैसे उनके नाटकों में सामाजिक संदेश और सांस्कृतिक आत्मा दिखाई देती थी।
रतन थियम को मिली राष्ट्रीय पहचान
1987 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 2013 से 2017 तक वो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) के अध्यक्ष भी रहे। इस दौरान उन्होंने थिएटर की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई अहम फैसले लिए।