'पिया तू अब तो आजा'
स्टूडियो में रिकॉर्डिंग चल रही थी। आशा भोसले अपनी लाइनें गा रही थीं और आर.डी. बर्मन कंट्रोल रूम में बैठे हर चीज पर बारीकी से नजर रखे हुए थे। तभी उन्होंने मजाक-मजाक में माइक के सामने आकर कहा, 'मोनिका... ओ माय डार्लिंग'। किसी ने नहीं सोचा था कि यह छोटी सी लाइन गाने का सबसे यादगार हिस्सा बन जाएगी। बाद में लोगों ने पूरा गाना जितना नहीं गुनगुनाया, उतना 'मोनिका...' वाली लाइनों को दोहराया। पंचम दा ने साबित कर दिया कि कभी-कभी इतिहास एक ही शब्द से बन जाता है।
'महबूबा-महबूबा'
आर.डी. बर्मन खुद को कभी महान गायक नहीं मानते थे, लेकिन 'शोले' के लिए बनी इस धुन में कुछ ऐसा था, जो किसी साफ-सुथरी आवाज में फिट नहीं बैठ रहा था। आखिरकार उन्होंने खुद गाने का फैसला किया। रिकॉर्डिंग खत्म हुई तो उनकी आवाज में मौजूद खुरदुरापन ही गाने की पहचान बन गया। ऐसा लगा जैसे कोई रेगिस्तान में बैठा बंजारा प्रेम का गीत गा रहा हो।
'चुरा लिया है तुमने जो दिल को'
पंचम दा की आदत थी कि वे हर आवाज में संगीत ढूंढ़ते थे। 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' की रिकॉर्डिंग के दौरान उन्होंने गिलास, चम्मच और धातु की चीजों से आवाजें निकालीं। आसपास के लोगों को लगा कि शायद वह मजाक कर रहे हैं। लेकिन जब गाना रिलीज हुआ तो वही खनखनाहट उसकी पहचान बन गई। यह सिर्फ गीत नहीं था, पंचम दा की कल्पना का नमूना था।
'बाहों में चले आओ'
अधिकतर संगीतकार चाहते हैं कि लोग उनकी धुन की तारीफ करें। लेकिन 'बाहों में चले आओ' में पंचम दा ने उल्टा किया। उन्होंने संगीत को जानबूझकर बहुत हल्का रखा, ताकि लता मंगेशकर की आवाज और शब्द सीधे दिल तक पहुंच सकें। न भारी ऑर्केस्ट्रा, न कोई बड़ा प्रयोग। सिर्फ भावनाएं। पंचम दा का कहना था कि जया बच्चन का किरदार ये गाना रात में सबके सोने के बाद गा रहा है, इसलिए इसका म्यूजिक कम होना चाहिए।
'दम मारो दम'
जब यह गाना बन रहा था, तब निर्माता-निर्देशक देव आनंद को डर था कि इसके बोल और अंदाज विवाद खड़ा कर सकते हैं। लेकिन पंचम दा ने इसे पारंपरिक हिंदी फिल्म गीत की तरह नहीं, बल्कि उस दौर के हिप्पी कल्चर की धड़कन की तरह तैयार किया। इलेक्ट्रिक गिटार, पश्चिमी बीट्स और आशा भोसले की बेफिक्र आवाज ने ऐसा माहौल बनाया कि गाना रिलीज होते ही युवाओं का एंथम बन गया। दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत में कई लोगों को लगा था कि यह गाना बहुत अलग है और शायद न चले, लेकिन जो हुआ वह सच आज सबके सामने है।
'ओ हसीना जुल्फों वाली'
यह वही फिल्म थी, जिसने आर.डी. बर्मन को बड़े संगीतकारों की कतार में खड़ा कर दिया। रिकॉर्डिंग के दौरान पंचम दा चाहते थे कि गाने में ऐसी ऊर्जा हो जो दर्शकों को सीट से उठने पर मजबूर कर दे। उन्होंने ड्रम्स और गिटार का इस्तेमाल उस दौर के हिसाब से बेहद आक्रामक तरीके से किया। कहा जाता है कि रिहर्सल के दौरान कई संगीतकार इस तेज रफ्तार धुन को बजाने में परेशान हो गए थे। लेकिन जब गाना पर्दे पर आया, तो उसकी रफ्तार और जोश ही उसकी पहचान बन गए।
'ये शाम मस्तानी'
इस गाने की धुन पंचम दा ने इतनी सहजता से बनाई थी कि सुनने वालों को लगता है जैसे यह धुन हमेशा से मौजूद थी। रिकॉर्डिंग के समय उन्होंने खास ध्यान रखा कि किशोर कुमार की आवाज में एक मस्ती और मुस्कुराहट महसूस हो। कहा जाता है कि पंचम दा बार-बार कहते थे कि यह सिर्फ गाना नहीं, बल्कि शाम की हवा जैसा महसूस होना चाहिए। शायद यही वजह है कि आज भी यह गीत सुनते ही एक अलग सुकून का एहसास होता है।
'रैना बीती जाए'
जब यह गीत रिकॉर्ड हो रहा था, तो पंचम दा जानते थे कि यह कोई आम फिल्मी गाना नहीं है। इसमें शास्त्रीय संगीत की गहराई भी थी और भावनाओं का दर्द भी। लता मंगेशकर ने रिकॉर्डिंग के दौरान इतनी बारीकी से सुर साधे कि स्टूडियो में मौजूद लोग मंत्रमुग्ध हो गए। कहा जाता है कि गाना पूरा होने के बाद कुछ देर तक कमरे में सन्नाटा रहा, क्योंकि सभी उसके असर से बाहर ही नहीं निकल पा रहे थे।
'हमें तुमसे प्यार कितना'
इस गाने की सबसे दिलचस्प बात यह थी कि इसके दो अलग-अलग संस्करण रिकॉर्ड किए गए थे। एक किशोर कुमार की आवाज में और दूसरा परवीन सुल्तान की आवाज में किया था। पंचम दा चाहते थे कि एक ही भावना को दो बिल्कुल अलग अंदाज में पेश किया जाए। जब दोनों संस्करण तैयार हुए, तो यह तय करना मुश्किल हो गया कि कौन सा बेहतर है। आज भी संगीत प्रेमियों के बीच इस बात पर बहस होती है कि दिल को ज्यादा कौन छूता है?
'मुसाफिर हूं यारों'
इस गाने की आत्मा उसकी सादगी में थी। पंचम दा नहीं चाहते थे कि संगीत शब्दों पर हावी हो जाए। उन्होंने धुन को बिल्कुल खुला और हल्का रखा, ताकि ऐसा लगे जैसे कोई अकेला मुसाफिर रास्ते पर चलते-चलते अपनी कहानी गुनगुना रहा हो। यही वजह है कि यह गीत सुनते समय श्रोता खुद को उस सफर का हिस्सा महसूस करने लगते हैं।