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Zero Se Restart Review: खुद को ‘महान’ जताने की विधु की एक और कोशिश, 70 मिनट की फिल्म के छह सौ रुपये!

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जीरो से रीस्टार्ट रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
जीरो से रीस्टार्ट
कलाकार
विक्रांत मैसी , मेधा शंकर , विधु विनोद चोपड़ा और अंशुमान पुष्कर
लेखक
जसकुंवर कोहली
निर्देशक
जसकुंवर कोहली
निर्माता
विधु विनोद चोपड़ा
रिलीज
13 दिसंबर 2024
रेटिंग
1/5

अगर आपने आशुतोष गोवारिकर निर्देशित फिल्म ‘लगान’ की मेकिंग पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘चले चलो’ देखी है तो ये भी याद होगा कि ये डॉक्यूमेंट्री आपने देखी कहां है? यूट्यूब पर घर बैठे किसी फुर्सत के पलों में या किसी दूसरे माध्यम पर अपनी आरामतलबी के मूड में। लेकिन, अगर आपको फिल्म ‘चले चलो’ सिनेमाघरों में टिकट लेकर देखने को कहा जाए तो ये तय है कि इसे देखने वालों की संख्या तुरंत आधी से भी कम रह जाएगी। और, ये इसके बावजूद कि ‘जीरो से रिस्टार्ट’ से लाख गुना बेहतर बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म है, ‘चले चलो’। ‘जीरो से रिस्टार्ट’ की तारीफ जिस एक बात के लिए की जा सकती है, वह ये है कि विधु विनोद चोपड़ा ने देश में डॉक्यूमेंट्री फिल्मों को सिनेमाघरों में रिलीज करने का जो बीड़ा उठाया है, वह देश में मनोरंजन के एक नए अध्याय की शुरूआत हो सकती है। 

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जीरो से रीस्टार्ट रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘12वीं फेल’ के बॉक्स ऑफिस पर पास होने के बाद से विधु विनोद चोपड़ा एक अलग ही दुनिया में हैं। बीते महीने वह इफ्फी, गोवा में थे तो बता रहे थे कि कैसे उनके हॉलीवुड के दोस्त फिल्म ‘12वीं फेल’ को ऑस्कर की सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फिल्म कैटेगरी में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए बिल्कुल सटीक फिल्म मानते हैं। यहां मुंबई में ‘जीरो से रिस्टार्ट’ के एक कार्यक्रम में उन्होंने अपना वह रूप भी दिखाया जिसके बारे में हिंदी सिनेमा पर लिखने या इसे जानने वाले मुंबई के अधिकतर लोग जानते हैं। ये रूप विधु विनोद चोपड़ा का वह रूप है जिसके बारे में सार्वजनिक रूप से ज्यादा कुछ लिखा नहीं गया है। वह जरूरत से ज्यादा खुद को प्यार करने वाले इंसान हैं। ऐसा करने में कोई बुराई भी नहीं है जब तक कि उनकी बातों के भ्रमजाल में फंसा एक दर्शक अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई खर्च करके ‘जीरो से रिस्टार्ट’ देखने न सिनेमाहाल न पहुंच जाए।

जीरो से रीस्टार्ट रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘जीरो से रिस्टार्ट’ अगर किसी दर्शक ने मुफ्त में देखी होगी तो उसे इसकी कसौटी कुछ और रखनी होती लेकिन सिनेमाघर में कोई छह सौ रुपये का टिकट खरीदकर जो भी दर्शक इसे देखने जाएगा, वह मेरी तरह खाली हाथ ही वापस आएगा। बहुत होता तो विधु इसे किसी ओटीटी पर रिलीज कर सकते थे या कुछ नहीं तो अपने प्रशंसकों के लिए उन्हें इसे यूट्यूब पर फ्री व्यूइंग के लिए जारी कर देना चाहिए था। किसी फिल्म के लिए कास्टिंग एक मेहनत भरी प्रक्रिया है, लेकिन क्या उसके बारे में हर किसी को जानने में दिलचस्पी होगी। ये जानना कितना जरूरी हो सकता है कि मनोज के किरदार के लिए वरुण धवन भी एक विकल्प थे। 

जीरो से रीस्टार्ट रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
हां, सिनेमा के छात्रों को ये जानना दिलचस्प हो सकता है कि शूटिंग से पहले विधु विनोद चोपड़ा की टीम कलाकारों के आने से पहले मौके पर पहुंचकर कितनी मेहनत करती थी, लेकिन ये जानकारी तो वह सिनेमा पढ़ाने वाले स्कूलों को अपनी ये फिल्म दान करके भी दे सकते थे। एक बढ़िया फिल्म बनाने की अपनी पूरी प्रक्रिया को भी सिनेमाघरों में टिकट लगाकर दिखाने से सिनेमा की कौन सी सेवा हो सकती है, कहना मुश्किल है। फिल्म ‘12वीं फेल’ के हर कार्यक्रम में विधु बताते आए हैं कि एक ड्रोन उड़ाने वाले लड़के को कैसे उन्होंने पहले लेखक और फिर फिल्म डायरेक्टर बना दिया! वह ये कभी नहीं बताते कि फिल्म ‘खामोश’ की रि रिलीज पर खुद से मिलने आए ‘ओएमजी 2’ के निर्देशक अमित राय के साथ उन्होंने क्या व्यवहार किया था!

जीरो से रिस्टार्ट रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
इसके ठीक उलट फिल्म ‘जीरो से रिस्टार्ट’ में 72 साल के विधु विनोद चोपडा वह सब करते दिख रहे हैं जो उनके जैसे अनुभवी फिल्ममेकर को शोभा नहीं देता। विधु की बतौर निर्देशक आखिरी हिट फिल्म ‘1942 ए लव स्टोरी’ रही है जो साल 1994 में रिलीज हुई। उसके बाद बीते साल जाकर उनकी फिल्म ‘12वीं फेल’ सफल रही है। इस फिल्म के ऊपर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने के विधु ने अगर ये सारे वीडियो व्लॉग सीरीज की शक्ल में अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर बारी बारी से रिलीज कर दिए होते तो इसमें उनका बड़प्पन साफ नजर आता। लोगों को भी तब समझ आता कि वह सिनेमा से इश्क करने वालों को कुछ नया सिखाने की कोशिश कर रहे हैं, और उसमें अपना मुनाफा नहीं सोच रहे हैं।
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जीरो से रीस्टार्ट रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
हर फिल्म मेहनत मांगती है। जिसने पांच मिनट की शॉर्ट फिल्म भी बनाई है, वह पांच घंटे इस बात को कैमरे के सामने बताने में बिता सकता है कि ये फिल्म बनाने में उसे कितनी दिक्कत हुई। किसी फिल्म की लोकेशन अगर चंबल है तो वहां तक फिल्म उपकरण ले जाने ही होंगे। कश्मीर की पहाड़ियों और राजस्थान के रेगिस्तान में न जाने कितनी फिल्में इन्हीं मशक्कत के बीच शूट हुई हैं। ‘12वीं’ फेल बेशक एक रोचक कहानी पर बनी फिल्म है, लेकिन उस फिल्म को बनाने की कहानी उतनी रोचक नहीं है कि लोग उसे फिल्म की तरह देखने सिनेमाघरों में उतनी ही तादाद में पहुंच जाएं। 

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