टेलीविजन के पुराने खिलाड़ी रहे निर्देशक उमेश बिष्ट ने सही समय पर बहुत सही कदम उठाया है अपना ध्यान वेब सीरीज की तरफ लाकर। उनकी कोशिशें ‘ओ तेरी’ और ‘पगलैट’ भी इसी बात की तरफ इशारा करती हैं कि कहानियों की संवेदनाओं पर उनकी पकड़ अच्छी रहती है। कलाकार उन्हें बेहतर मिलें तो वह तमाशा बेहतरीन सजा सकते हैं। इस बार भी उमेश ने वेब सीरीज ‘ग्यारह ग्यारह’ में ऐसी ही कुछ कोशिश की हैं। फिल्म ‘किल’ से ताजा ताजा बड़े परदे पर हिट हुए राघव जुयाल इस सीरीज का प्रमुख आकर्षण हैं। ‘गहराइयां’ वाले धैर्य करवा हैं और हैं ‘बंबई मेरी जान’ वाली कृतिका कामरा। तीनों ने और भी तमाम सारे काम कैमरे के सामने किए हैं, लेकिन ये तीनों रचनाएं उनकी श्रेष्ठ अदाकारी में गिनी जा सकती हैं।
ग्यारह ग्यारह रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कोरियाई सीरीज ‘सिगनल’ की रीमेक
खैर, बात करते हैं वेब सीरीज ‘ग्यारह ग्यारह’ की और इसकी कहानी की। भारत में कोरियाई धारावाहिकों की लोकप्रियता हाल के दिनों में खूब बढ़ी है। कोरोना संक्रमण काल में इनको लेकर चर्चाओं में इजाफा हुआ और अब हर ओटीटी पर ये कहानियां हिंदी में डब होकर खूब देखी जा रही हैं। ‘ग्यारह ग्यारह’ ऐसी ही एक कोरियाई सीरीज ‘सिगनल’ का हिंदी अनुकूलन है। कहानी मुख्य रूप से पुलिस की कार्यप्रणाली को दिखाती है। तीन अलग अलग कालखंडों के किस्से आपस में यूं गुत्थमगुत्था हैं कि एपिसोड दर एपिसोड कहानी खो खो की तरह एक किरदार के धक्के से दूसरे किरदार को दौड़ाती रहती है। इन सबके बीच एक खास समय है, 11 बजकर 11 मिनट, एक वॉकी टाकी जो दुनिया की नजरों में कबाड़ है, और दो ऐसे किरदार जो घड़ी की दो सुइयों की तरह बार बार एक दूसरे के ऊपर नीचे से गुजरते रहते हैं।
ग्यारह ग्यारह रिव्यू
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पुलिसिया दस्तूरों की अपराध कथा
वेब सीरीज ‘ग्यारह ग्यारह’ एक अपराध कथा है जिसमें विज्ञान और विश्वास दोनों को कुछ यूं तरह घोला गया है कि कहानी अविश्वसनीय होते हुए भी समय की तरंगों पर नई तान गढ़ती रहती है। उत्तर प्रदेश पुलिस से लेकर उत्तराखंड पुलिस तक के बीच की पुलिसिया दस्तूरों को कहानी का मुख्य आधार बनाया गया है। कंधों पर लगे सितारों, सीनियर पुलिस अफसर का बेमतलब गालियों के साथ ही बात करना और कम उम्र के पुलिस इंस्पेक्टर वाली हिंदी सिनेमा का चलन बन चुकीं आम गलतियों को छोड़ दें तो ये सीरीज ओटीटी पर अरसे बाद दिखी एक अच्छी क्राइम सीरीज है। सस्पेंस फिल्मों के शौकीनों के लिए इसमें अतिरिक्त मसाला है और सीरीज का निर्देशन, इसका अभिनय और इसका संगीत इसकी जान है।
ग्यारह ग्यारह रिव्यू
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उमेश बिष्ट ने संजोई संवेदनाएं
उमेश बिष्ट ने वेब सीरीज ‘ग्यारह ग्यारह’ के लिए ‘सिगनल’ का हिंदी अनुकूलन कितना सटीक किया है, इस पर टिप्पणी बिना मूल सीरीज देखे करना उचित नहीं होगा लेकिन एक हिंदी वेब सीरीज के तौर पर विषय और इसका भूगोल उन्होंने ठीक चुना है। पहाड़ों पर लोक कथाएं बहुत प्रचलित होती हैं। वहां इनका लौकिक रहस्य अपने कथानक के साथ साथ अपने वातावरण से भी खुराक पाता है, इस मामले में उमेश अपने प्रयास में सफल भी रहे। पटकथा लेखन में उन्हें संजय शेखर और पूजा बनर्जी का अच्छा साथ मिला और संवाद भी गौतम गोविंद शर्मा व समीर सरल शर्मा ने ठीक ही लिखे हैं। थोड़ा इसमें पहाड़ी टच और होता तो बेहतर होता क्योंकि अभी इसके किरदार देहरादून की बजाय पोंटा साहिब की तरफ ज्यादा झुके हुए हैं।
राघव जुयाल-ग्यारह ग्यारह रिव्यू
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नंबर वन रहे राघव जुयाल
अदाकारी में राघव जुयाल यहां फिर एक नंबर हैं। एक दरोगा को एक पुलिस इंस्पेक्टर बनने में हालांकि खासा वक्त लगता है लेकिन चाचा चौधरी जैसा युग आर्या का किरदार उसे समय से पहले भी प्रमोशन दिला सकता है। युग आर्या के किरदार में राघव जुयाल ने अपनी अदाकारी का एक नया आयाम खोला है। वह अच्छे अभिनेता बनते जा रहे हैं, बस उन्हें इस बात को अपने अभिनय में दिखाना नहीं है एक अच्छा अभिनेता वही हैं जो किरदार के हिसाब से चले, अपनी कलाकारी के हिसाब से नहीं। इस लिहाज से उनके लिए ये अदाकारी का संक्रमण काल है। यहां से आगे वह एक बेहतरीन कलाकार के रूप में खुद को हिंदी सिनेमा में स्थापित कर सकते हैं या फिर पैसे, डिजाइनर कपड़ों और सीन्यॉरिटी, जूनियॉरिटी के खेल में खुद को फंसा सकते हैं। काम उनका काबिले तारीफ है और कृतिका कामरा के साथ उनकी जुगलबंदी देखन लायक है।
कृतिका कामरा-ग्यारह ग्यारह रिव्यू
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कृतिका कामरा के कौशल का कमाल
कृतिका कामरा का असल टैलेंट किसी वेब सीरीज में सबसे पहले ‘तांडव’ में दिखा। टेलीविजन धारावाहिक और फिल्में उन्होंने भी राघव की तरह खूब की हैं लेकिन वेब सीरीज ‘बंबई मेरी जान’ में उनकी कलाकारी जो बढ़नी शुरू हुई थी, उन कलाओं का पूरा चांद अब जाकर बनता दिख रहा है। ‘मटका किंग’ से भी दर्शकों को उम्मीदें खासी हैं, खासतौर से उनको इस सीरीज में डीएसपी वामिका रावत में देखने के बाद। वामिका के किरदार का जो अतीत है, उसका बोझा वर्तमान मे ढोने में कृतिका ने काफी मेहनत की है। शौर्य अटवाल के पिता के साथ वाले उनके दृश्य काफी भावुक हैं और एक किरदार की अपनी कमजोरियों व ताकतों दोनों का उन्होंने अच्छा संतुलन अपने अभिनय में बनाए रखा है।
धैर्य करवा-ग्यारह ग्यारह रिव्यू
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धैर्य करवा के अभिनय का लिटमस टेस्ट
वेब सीरीज ‘ग्यारह ग्यारह’ जिस एक कलाकार के लिए सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण रही, वह है धैर्य करवा। धर्मा प्रोडक्शन्स ने उन्हें और ‘किल’ के हीरो लक्ष्य को एक साथ बड़े परदे पर लॉन्च करने का एलान किया था, लेकिन मामला क्यों नहीं जमा, इसकी तमाम थ्योरीज सुनने को मिलती रहती हैं। फिल्म ‘83’ में रवि शास्त्री के किरदार में धैर्य ने लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा था। ‘गहराइयां’ में वह पहली बार एक अभिनेता के रूप में खुद को स्थापित करने की गंभीर कोशिश करते दिखे। ‘अपूर्वा’ में भी उन्हें मौका मिल चुका है और अब ‘ग्यारह ग्यारह’। उनकी कद काठी एक पुलिस अफसर के लिहाज से बिल्कुल ठीक है लेकिन दूसरे कलाकारों की हाइट से संतुलन बनाने में उनकी दिक्कत लगातार बनी रहती है। सीरीज की धुरी वही हैं, इसलिए बार बार नजर उन्हीं पर आकर टिकती है।
ग्यारह ग्यारह रिव्यू
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बिंज वॉच करने लायक क्राइम सीरीज
तकनीकी तौर पर वेब सीरीज ‘ग्यारह ग्यारह’ ओटीटी जी5 के स्तर की ही है। कम बजट में अच्छी सीरीज बनाने का पूरा दबाव उमेश बिष्ट ने झेला है और उसमें कमोबेश वह सफल भी रहे हैं। गौतमी कपूर, पुर्णेंदु भट्टाचार्य और गौरव शर्मा का काम ठीक है। हर्ष छाया की छवि के हिसाब से उनका किरदार थोड़ा ओवर हो गया है। मुक्ति मोहन के किरदार के ग्राफ पर सीरीज की कहानी और दर्शकों की रवानी दोनों टिकी रहती है। उनके बारे में ज्यादा कुछ लिखना सीरीज का मजा खराब कर सकत है। बिंज वॉच के हिसाब से अरसे बाद कोई क्राइम सीरीज ढंग की आई है, ये सप्ताहांत आप इसके नाम कर सकते हैं।