मॉडर्न मास्टर्स: एस एस राजामौली (डॉक्यूमेंट्री)
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
छूटने से पहले तय तीर की दिशा
नेटफ्लिक्स की डॉक्यूमेंट्री ‘मॉडर्न मास्टर्स: एस एस राजामौली’ की तारीफ इस मायने में की जा सकती है कि ये अपने समय के सिनेमा में एक नया हस्ताक्षर रचने वाले निर्देशक का परिचय दुनिया भर में फैले उनके प्रशंसकों से कराती है और साथ ही अंग्रेजी समझ सकने वाले विश्व के अन्य सिनेप्रेमियों को भी उनके बारे में बताती है। डॉक्यूमेंट्री भारतीय दर्शकों खासतौर से जिस भाषा में राजामौली फिल्म बनाते हैं, उस तेलुगु भाषा के दर्शकों के लिए कतई नहीं है, क्योंकि वे सब इस डॉक्यूमेंट्री से कहीं ज्यादा पहले से जानते हैं। और, अगर डॉक्यूमेंट्री को तेलुगु में सुनेंगे तो उन्हें अपने पसंदीदा सितारों की आवाज तेलुगु में सुनाई नहीं देगी। यश चोपड़ा पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘द रोमैंटिक्स’ से खाद-पानी पाता ये वृत्तचित्र इंटरनेट पर मौजूद तमाम जानकारियों को परदे पर उसी क्रम में उतारता चलता है, और एक पत्रकार की अंतर्दृष्टि, एक फिल्मकार की सामाजिक समालोचना और एक भाषाई सिनेमा की विश्व सिनेमा के तौर पर स्थापना की बात करना भूल जाता है।
मॉडर्न मास्टर्स: एस एस राजामौली (डॉक्यूमेंट्री)
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कैमरून और रूसो का ठप्पा गैरजरूरी
‘मॉडर्न मास्टर्स: एस एस राजामौली’ एक बात और दिखाती है और वह ये कि मुंबई के फिल्म पत्रकार तब किसी इंसान या काम को बड़ा नहीं मानते जबकि उसकी तारीफ कोई विदेशी पत्रिका या कोई विदेशी शख्सियत न कर दे। जेम्स कैमरून और जो रूसो की मौजूदगी यहां इसी बात के लिए हैं क्योंकि वे राजामौली की किसी फिल्म की, उनकी किसी फिल्म के विषय की या उनकी किसी फिल्म के किरदार की कोई खास विवेचना करते नजर नहीं आते। वह अनुपमा चोपड़ा के पहले से सिखाए शब्द से बोलते दिखते हैं। डॉक्यूमेंट्री की पटकथा इसकी शूटिंग के बाद ही अमूमन लिखी जाती है, ‘मॉडर्न मास्टर्स: एस एस राजामौली’ को देखकर लगता है कि इसकी स्क्रिप्ट पहले लिखी गई और कलाकारों व फिल्ममेकर्स के इंटरव्यू फिर उसी हिसाब से पहले से तय दिशा में लिए गए।
मॉडर्न मास्टर्स: एस एस राजामौली (डॉक्यूमेंट्री)
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सिनेमा के विद्यार्थियों के लिए सबक नहीं
डॉक्यूमेंट्री ‘मॉडर्न मास्टर्स: एस एस राजामौली’ निर्देशक राजामौली को जमीन से उठकर आसमान छू लेने वाले निर्देशक के तौर पर पेश करती है और बात का सिरा वहां से पकड़ती है जहां से दुनिया ने उनको ‘बाहुबली’ या ‘आरआरआर’ से जानना शुरू किया या कूदकर उसके पीछे जाती भी है तो वहां जहां उनके संघर्ष को उनका आभामंडल विकसित करने के तौर पर विकसित किया गया है। उनकी पिछली पीढ़ी की कोशिशें, विफलताएं बताते हुए ऑस्कर विजेता संगीतकार एम एम कीरावणी के चेहरे पर दर्द नहीं इंटरव्यू की उत्तेजना नजर आती है। राजमौली की शख्सियत जानने के लिए कीरावणी व उनकी हमसफर से बातचीत इस डॉक्यूमेंट्री का सबसे अच्छा हाई प्वाइंट है, लेकिन सिनेमा के किसी विद्यार्थी को इस कालखंड का सिनेमा या इस दौर के सिनेमा के सामाजिक मनोविज्ञान को समझना हो तो ‘मॉडर्न मास्टर्स: एस एस राजामौली’ उसमें पूरी तरह विफल वृत्तचित्र है।
मॉडर्न मास्टर्स: एस एस राजामौली (डॉक्यूमेंट्री)
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
समालोचना नहीं ये है स्तुति गान!
नेटफ्लिक्स की डॉक्यूमेंट्री ‘मॉडर्न मास्टर्स: एस एस राजामौली’ का शोध, निर्देशन और इसका संगीत किसी हिंदी फिल्म सरीखा है और इसके लिए इसे बनाने वाली दोनों कंपनियों अप्लॉज एंटरटेनमेंट और फिल्म कंपेनियन स्टूडियोज की रोजमर्रा की जिंदगी को लेकर बनी अपनी नजर का असर साफ दिखता है। रीमेक के मास्टर के तौर पर खुद को स्थापित कर चुकी अप्लॉज एंटरटेनमेंट के सहारे खुद को बतौर निर्माता स्थापित करने की फिल्मी वेबसाइट फिल्म कंपनेयिन की इस पहली कोशिश का इसलिए तो स्वागत होना चाहिए कि ये सिनेमा के मौजूदा उस्तादों के बारे में दर्शकों को बताने की कोशिश कर रही है लेकिन आलोचना इस बात की इसकी होनी चाहिए कि इस कोशिश के उद्देश्य में एक समालोचनात्मक दृष्टि का अभाव है।
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