कहानी सफर की नहीं, सड़क की
नेटफ्लिक्स से लेकर प्राइम वीडियो, सोनी लिव, डिज्नी प्लस हॉटस्टार और वूट तक हर तरफ इन दिनों मंदी का आलम है। बीते दो साल में जो पैसा अधिकतर ओटीटी वालों ने खुले हाथों लुटाया, उसका असर अब बाजार में दिखने लगा है। मंजूर हो चुकी सीरीज के अब नामंजूर हो जाने का गम लोगों के चेहरों पर पढ़ा जा सकता है। प्रोडक्शन कंपनियों में नए सिरे से बजट बनाए जा रहे हैं। राजकुमार राव जैसे दर्जन भर फ्लॉप फिल्में दे चुके सितारे इस सबके बीच भी 10-11 करोड़ रुपये की फीस एक डिजिटल फिल्म के लिए वसूल ले रहे हैं। इधर, उनसे बेहतर कलाकारों वाली ‘ट्रिपलिंग सीजन 3’ बनाने वालों को पांच एपिसोड के भी इतने पैसे नहीं मिल पा रहे हैं। मामला इस बार बजट वाली सीरीज बनाने का है। 25 मिनट के अरते परते के पांच एपीसोड हैं। हर एपिसोड में दो गाने हैं। दो तीन झगड़े हैं। एक मान मनौव्वल है और एक टोटका दर्शकों को झटका देने के लिए हैं। इस सीजन के हर एपिसोड का यही तय टेम्पलेट है। बस इस बार कहानी सफर की नहीं, सड़क की है और सड़क भी क्या कहें, पगडंडी जैसे रास्तों की है जिस पर तीन की बजाय इसके दूने से भी दो ज्यादा मुसाफिर इस उम्मीद से निकले हैं कि आखिर तक आते आते सब अच्छा हो जाए।
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माता पिता के आजाद ख्यालों का आसमां
कहानी के मुख्य किरदार चंदन, चंचल, चितवन ही हैं। लेकिन, ‘ट्रिपलिंग सीजन 3’ में फोकस में इनके मम्मी पापा की कहानी आ गई है। चंदन की शोहरत क्रिप्टोकरेंसी एक्सपर्ट के रूप में बन रही है लेकिन वह चाहता है एक कामयाब लेखक बनना है। चंचल रजवाड़े की रानी सा बनकर इतरा रही है। चितवन का मामला थोड़ा कैड़ा है। वह अपनी एक्स गर्लफ्रेंड के उसके पति से हुए बच्चे पर अपनी दावेदारी जता रहा है और इसके लिए बाकायदा अदालत तक जा पहुंचा है। ये सब वह अपनी मर्जी से करते रहे हैं। इनके माता पिता न्यू मिलेनियम के अभिभावक हैं। कूल हैं। अपने बच्चों के पंखों पर पाबंदी नहीं लगाते हैं। लेकिन, अपने में मगन रहने वाले ये बच्चे जब अपने माता पिता के अलग अलग रास्तों पर चलने के फैसले के बारे में सुनते हैं तो इनको झटका लगता है। कहानी और विचार के स्तर पर ‘ट्रिपलिंग सीजन 3’ इतना कमाल की सीरीज महसूस होती है कि लगता है कि ये आधे आधे घंटे के पांच एपिसोड से क्या होगा?
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पटकथा और संवादों ने दिया गच्चा
लेकिन, एक कमाल की सामयिक कहानी की जो पटकथा विकसित हुई है, उसे देखकर लगता है कि अच्छा है ये ब्रह्मास्त्र बिना कमान से छूटे ही वापस तरकश में चला गया। 25-30 मिनट के ये एपीसोड भी भारी लगने लगते हैं। अब्बास दलाल से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है। गोपाल तिवारी और क्रिस जॉर्ज को बाद में मामला संभालने के लिए लगाया गया, लेकिन बात बनी नहीं। मां-बाप ने एक मकान अपने रिटायरमेंट प्लान के तहत बनाया, बच्चों को लगता है कि इस पर उनका भी हक है। इस घोंसले में वह दाना चुगते चुगते अपनी चोंच थक जाने के बाद जब चाहे तब वापस आना चाहते हैं, विश्राम के लिए। लेकिन, मां बाप अपना अलग अलग घोंसला बनाने का फैसला कर चुके हैं। और, पुराना घोंसला वह बेच चुके हैं। मामला थोड़ा इमोशनल है। बच्चे चाहते हैं कि मां—बाप अलग होने का अपना फैसला वापस ले लें?
अदाकारी की पिकनिक मनाते कलाकार
‘ट्रिपलिंग सीजन 3’ 90 मिनट की एक बेहतरीन डिजिटल फिल्म हो सकती थी। एपीसोड में बंटी सीरीज के रूप में ये असर नहीं कर पाती, कुमुद मिश्रा, शरनाज पटेल और अमोल पाराशर की कुछ दृश्यों में अच्छी एक्टिंग के बावजूद। कुमुद मिश्रा ने हालिया रिलीज फिल्म ‘नजर अंदाज’ में जो बेहतरीन काम किया है, उसके सामने ये किरदार उनके लिए बाएं हाथ का खेल लगता है। शरनाज पटेल जब भी परदे पर दिखती हैं, एक हूक सी उठती है, उनका अंतर्द्वंद्व देखकर। कुणाल रॉय कपूर को ये समझने की जरूरत है कि राजसी परिवार के लोग या तो बहुत अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं या बहुत अच्छी हिंदी। वह खुला को मुंबइया बोली की तरह खुल्ला कभी नहीं बोलते हैं। मानवी गगरू फिल इन द ब्लैंक्स में अच्छी तरह से फिट हैं। सारा अंजुली के अभिनय में चमक है। उनको अच्छे किरदार मिले तो वह अपना असर भी छोड़ सकती हैं।
वॉरेन बफे का कोट ही असला रिटर्न
सीरीज के पिछले दो सीजन के मुकाबले इस बार ‘ट्रिपलिंग सीजन 3’ के गाने भी कमजोर हैं। हां, अमन पंत ने बैकग्राउंड म्यूजिक में संतुलन बनाए रखकर इस कमी को पूरा करने की कोशिश की है, पर गाने इस बार कहानी को हल्का करते हैं। शाज मोहम्मद ने ट्रेकिंग के समय अच्छी सिनेमैटोग्राफी की है और बारिश में भीगते भाई बहनों वाला दृश्य भी उन्होंने अच्छा शूट किया है। फारुक हुंडेकर के पास शायद इतना फुटेज शूट होकर आया नहीं कि उन्हें एडीटिंग के समय क्या छोड़ें, क्या लें वाले संकट से गुजरना पड़ा हो। एक एपीसोड को 30 मिनट तक ले जाने में ही उनका माउस हांफ गया दिखता है। सीरीज के शुरू होते ही एक दीवार पर टंगी तस्वीर में वॉरेन बफे के नाम से लिखा दिखता है, ‘द स्टॉक मार्केट इज ए डिवाइस फॉर ट्रांसफरिंग मनी फ्रॉम द इमपेशेंट टू द पेशेंट (अधीर निवेशक के खाते से एक धैर्यवान निवेशक के खाते में पैसे को पहुंचाना ही स्टॉक एक्सचेंज है)’! ‘ट्रिपलिंग सीजन 3’ में समय निवेश करने का ये सबक ही इकलौता रिटर्न है।