जयदीप अहलावत शेफाली शाह और स्वानंद किरकरे
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कोंकण में सांस लेती कहानी
पता नहीं अविनाश अरुण इस फिल्म के बहाने अपनी बचपन की किसी मित्र को संदेश भेज रहे हैं या फिर कोई टीस जो उनके मन के किसी कोने में दबी रह गई, उसे उकसाकर उससे मुक्ति पाना चाहते हैं, ये वह ही जानें लेकिन ये तो तय है कि कोंकण मे बिताए अपने बचपन को वह इस फिल्म में फिर से जीने की कोशिश कर रहे हैं। फिल्म के दो मुख्य चरित्र हैं शैलजा और प्रताप। दोनों के सरनेम मराठी हैं। कलाकार दोनों गैरमराठी हैं। दोनों कोंकण की कलात्मक और नैसर्गिक सुंदर दुनिया में एक ऐसी कहानी को रचने की कोशिश कर रहे हैं जिसकी आत्मा मराठी है। अविनाश के लिए ये फिल्म उनकी अपनी सिनेकला की शो रील जैसी है। जयदीप अहलवात और उन्होंने साथ साथ पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में वक्त बिताया और दोनों की दोस्ती की कश्ती खेने आए हैं शेफाली शाह और स्वानंद किरकिरे। अनिनाश ने फिल्म ‘थ्री ऑफ अस’ का नाम ये क्यों रखा, ये तो वही जाने लेकिन 1906 में लिखे गए इसी नाम के रैशेल क्रोथर्स के नाटक पर बनी मूक फिल्म से लेकर 2015 में बनी इसी नाम सी फिल्म तक चार फिल्में ‘थ्री ऑफ अस’ का इस्तेमाल कर चुकी हैं। फिल्म देखने के बाद लगता है कि अविनाश को थोड़ा सा अपना अहम ढीला करना चाहिए था और फिल्म का कोई सुंदर सा मराठी या हिंदी नाम रखना चाहिए था।
संपादन में अटककर चलती फिल्म
अपने नाम की ही तरह फिल्म ‘थ्री ऑफ अस’ शुरुआत में थोड़ी बेगानी सी लगती है। स्टैटिक शॉट में आते जाते कलाकार। हर दृश्य को फोरग्राउंड, बैकग्राउंड और सेंटर में बांटने की सी जिद फिल्म से दर्शक का नाता बनाने में थोडी देर लेती है। संपादन भी गड़बड़ है। कैमरा किरदारों के साथ चलना शुरू करता है। दर्शक को लगता है कि वह कहानी के साथ हो ले रहा है, लेकिन फिर एकदम से जंप कट। हो सकता है अविनाश दर्शकों को झटका दे देकर कहानी के साथ आगे ले जाने की जुगत में रहे हों, लेकिन संवेदनशील कहानियों में सिनेमाई तकनीक को भी संवेदनशील रहना बहुत जरूरी है। कहीं कोई संघात या अपघात किसी भी मनुष्य की चेतना को विकसित होने में बाधा बन सकता है। कुछ कुछ ऐसा ही शैलजा के साथ हुआ है। याददाश्त खोने की उसे बीमारी है, इसका पता चल चुका है। फिल्म शुरू ही होती है उसकी एक ऐसी टु डू लिस्ट से जिसे पढ़कर उसकी मानसिक स्थिति का पता चलता है। लोग सामान्य बातें करते हैं। शैलजा के लिए वे ताने जैसे हैं। लेकिन, वह मुस्कुराती रहती है। फिर एक दिन वह अपने पति के साथ अपने बचपन के कस्बे वेंगुरला आ जाती है। ट्रेन में दोनों बैठे। पत्नी ने चकलियां सहयात्रियों को बांटी और सफर खत्म। मुंबई से कोंकण जाना और वह भी ट्रेन से। ये अपने आप में एक अलग कहानी है। जिनको विदेश में जाकर तस्वीरें खींचना और सोशल मीडिया को उससे भर देना भाता है, उन्हें जीवन में एक बार कोंकण जरूर जाना चाहिए। खैर, अविनाश को जल्दी है अपनी कहानी तक आने की तो दोनों वेंगुर्ला आ जाते हैं। शैलजा को अपने बचपन के दोस्त की तलाश है, वह मिल जाता है। दोनों घुलते मिलते हैं। पति असहज होता है। पत्नी प्रसन्न होती है और प्रताप की पत्नी को ये सब अजीब तो लगता है लेकिन बहुत प्यारा अजीब लगता है। याद रहे कि फिल्म का नाम है ‘थ्री ऑफ अस’ और यहां कहानी में अभी शैलजा की छोटी बहन की कहानी आनी बाकी है।
शेफाली शाह और जयदीप अहलावत
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
शेफाली की शह पर जयदीप की मात
फिल्म ‘थ्री ऑफ अस’ की रिलीज की तारीख गुपचुप तरीके से घोषित हुई। फिल्म की रिलीज से पहले इसका प्रचार प्रसार भी बस नाम मात्र को हुआ। शेफाली शाह ने मुंबइया सिनेमा जिया है। और, अब वह उससे बाहर आकर अभिनय के समंदर में तैर रही हैं। ‘दिल्ली क्राइम’ और ‘डार्लिंग्स’ की शेफाली के ठीक विपरीत है ये किरदार। ये किरदार एक कमजोर महिला का है। ऐसी महिला जिसका दिल कुछ कह रहा है और दिमाग कुछ और। और, वह दिल की सुनती है। उसे एहसास होता है कि 28 साल पहले उससे गलती हो चुकी है। भाव, राग और ताल को मिलाकर उसने अपने बेटे का नाम भारत तो रख दिया है लेकिन उसके जीवन का भाव, राग और ताल असल में प्रताप से है। प्रताप भोला है। उसकी दो बेटियां हैं कथा और ऋद्धि। बड़ी बेटी इतनी बड़ी हो चुकी है माता पिता के साथ मेले में जाना उसे अच्छा नहीं लगता और छोटी बेटी जब ना करती है तो प्रताप को मिलता है मौका शैलजा के साथ उस पुरानी याद को फिर से ताजा करने का, जिसके बाद दोनों कभी मिले नहीं। फिल्म ‘थ्री ऑफ अस’ अविनाश अरुण की सिनेमैटोग्राफी की शो रील तो है ही लेकिन सिनेमा ये जयदीप अहलावत का है। हिंदी सिनेमा को इरफान खान का स्थान भरने वाला हीरो जयदीप में मिल चुका है। इस बात को जयदीप ने इस फिल्म में और पुख्ता किया है। आसमान में लटके हिंडोले पर अपने बचपन के प्यार को आखिरी दिन की बातें याद दिलाते प्रताप की जब आंखें डबडबा आती हैं तो जयदीप के चेहरे के भाव न जाने क्यों एकदम से इरफान के चेहरे की याद दिला जाते हैं। बेंच पर लिखी इबारत को पहचानने की बारी हो या फिर कुएं के पास जाकर सहमी शैलजा को सामान्य करने की होशियारी, जयदीप ने पूरी फिल्म में शैलजा के किरदार को वह आधार दिया है जिसकी तलाश में भटकती वह मुंबई से वेंगुर्ला आती है। स्वानंद किरकिरे कहने को तिकड़ी के तीसरे कोण हैं लेकिन काम उनका भी शानदार है।
कुमार गंधर्व के सुरों से सजा सिनेमा
ये अविनाश अरुण के ही कूबत की बात है कि कुमार गंधर्व का गाया सूरदास का भजन वह एक हिंदी फिल्म में पिरो सके। फिल्म उन सभी लोगों को बहुत बहुत पसंद आएगी जिनके बचपन की कोई ऐसी कहानी उनके दिल के किसी कोने में अब भी छिपी हो जिसकी नायिका कहीं खो चुकी है। उनकी इस सोच पर दांव लगाने के लिए ‘अंधाधुन’ और ‘मोनिका ओ माय डार्लिंग’ जैसी रहस्य रोमांच वाली फिल्में बनाने वाली कंपनी मैचबॉक्स शॉट्स तैयार हुई इसके लिए इसके निर्माताओं संजय राउतरे और सरिता पाटिल की प्रशंसा होनी ही चाहिए। फिल्म में एक और काबिले तारीफ काम है और वह फिल्म की साउंड डिजाइन का। विनीत डिसूजा ने पक्षियों के कलरव से लेकर क्रॉसिंग से गुजरती ट्रेन और समंदर किनारे के माहौल को बिल्कुल नैसर्गिक आवाजों के साथ अविनाश के कैमरे के जरिये परदे पर उतरी दृश्यावलियों की जान बना दिया है। फिल्म बहुत ही सीमित सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है, लेकिन अगर आपके घर के आसपास कहीं रिलीज हो रही है तो सिनेमा का आनंद लेने के लिए इसे देखें जरूर। अवधि भी बहुत ज्यादा नहीं है। ये खेल है सिर्फ डेढ़ घंटे का और कल का सिनेमा बना रहे, इसके लिए आज का ये खेल देखना जरूरी है।