The Sabarmati Report Review
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आईआईएमसी का कैंपस प्लेसमेंट?
फिल्म ‘द साबरमती रिपोर्ट’ एक ऐसे कैमरामैन की कहानी है जिसने भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) से पत्रकारिता का कोर्स किया और नौकरी मिली उसे एक बड़े न्यूज़ चैनल में मनोरंजन बीट कवर करने वाले हिंदी पत्रकार की। गोधरा के पास ट्रेन में लगी आग के मामले की कवरेज करने गई स्टार रिपोर्टर के साथ उसे भेजा तो जाता है कैमरामैन बनाकर लेकिन वह ‘मैडम’ की शूटिंग करने के साथ साथ, हादसे के चंद पीड़ितों के ऐसे बयान भी रिकॉर्ड कर लाता है, जो प्रसारित हो जाते तो शायद ये फिल्म बनने की नौबत ही नहीं आती। वो बयान रिकॉर्ड करके लाता है डीवीसी टेप पर। चैनल समय में उल्टी तरफ चल रहा है क्योंकि उसकी लाइब्रेरी इसे ट्रांसफर करके रखती है बीटा टेप पर! ये बीटा टेप बाद में एक नई नई महिला जर्नलिस्ट को मिलता है, वह इस पुराने हिंदी पत्रकार को तलाशने निकल जाती है। हां, यहां आकर फिल्म ये भी बताती है गुजरात पुलिस के हाथ भी पैसे के मामले में खुले रहे हैं।
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नौकरी जाने पर जमीर खोता हिंदी पत्रकार?
फिल्म ‘द साबरमती रिपोर्ट’ बताती है कि इस हिंदी पत्रकार की नौकरी जाने पर वह सुबह शाम शराब के नशे में धुत रहता है। घर में काम करने आने वाली सहायिका के पर्स से पैसे चुराता है। घर चलाने के लिए डबिंग का काम करता है और पैसों के लिए ही इस नई पत्रकार के साथ गोधरा जाने को तैयार हो जाता है। ध्यान रहे कि ये हिंदी पत्रकार है। फिल्म बार बार ये दोहराती चलती है कि हिंदी के पत्रकारों की समाज में कोई इज्जत नहीं है। उनकी बात कोई सुनता नहीं है। दरअसल ये सारा सेटअप उस क्लाइमेक्स के लिए होता है जब अंग्रेजी चैनल की रिपोर्टिंग को एक हिंदी चैनल में लौटा यही पत्रकार गलत साबित करता है। नानावटी आयोग की रिपोर्ट, गुजरात हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उद्धरण देती इस फिल्म में भी फिल्म ‘एक्सीडेंट या कॉन्सपिरेसी गोधरा’ की तरह दर्शकों को यही याद दिलाने की कोशिश है कि अयोध्या से लौट रहे 59 रामभक्तों को गोधरा में जिंदा जला दिया गया था। उनके नाम भी फिल्म बताने की कोशिश करती है लेकिन 10-12 नाम परदे पर आने के बाद ये सिलसिला भी टूट जाता है।
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धीरज सरना का नाम निर्देशक के तौर पर
निर्देशक अनुराग कश्यप के सहायक रहे राजन चंदेल ने फिल्म ‘द साबरमती रिपोर्ट’ निर्देशित की है। लेकिन, उनकी बनाई फिल्म सेंसर बोर्ड में अटकी तो एकता कपूर ने फिल्म का अधिकतर हिस्सा फिर से शूट करा दिया और अब फिल्म के निर्देशक वह धीरज सरना हैं जो उनके साथ धारावाहिक ‘कहानी घर घर की’ से रहे हैं। उन्होंने ही कपिल शर्मा की बतौर हीरो फिल्म ‘किस किस से प्यार करूं’ भी लिखी है। धीरज सरना ने बतौर निर्देशक पूरी कोशिश की है कि जो भी निर्देश उन्हें मिले हैं, उनके दायरे में रहकर वह एक डॉक्यूड्रामा सरीखी फिल्म बना सकें। अयोध्या से अहमदाबाद जा रही ट्रेन की एस 6 बोगी में साजिशन आग लगाई गई, ये बात अदालत मान चुकी है लेकिन ये बात दर्शकों को याद बनी रहे, यही इस फिल्म का अगर उद्देश्य है तो बतौर एकता कपूर के मुलाजिम धीरज सरना पूरी तरह सफल हैं। बस, दिक्कत यही है कि यही बात फिल्म ‘एक्सीडेंट या कॉन्सपिरेसी गोधरा’ कोई सौ दिन पहले ही इससे बेहतर तरीके से दर्शकों को समझा चुकी है।
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विक्रांत मैसी की शोहरत भुनाने की कोशिश
फिल्म ‘द साबरमती रिपोर्ट’ पूरी तरह से फिल्म ‘12वीं फेल’ से लाइमलाइट में आए विक्रांत मैसी की शोहरत को भुनाने की कोशिश करती है, लेकिन चूंकि विक्रांत मैसी निर्देशक के कलाकार है, लिहाजा जो काम विधु विनोद चोपड़ा उनसे निकलवा ले गए, वह धीरज सरना के बस में दिखा नहीं। 2002 में शुरू होने वाली ये फिल्म डेढ दशक का सफर तय करती है। इस दौरान विक्रांत मैसी के बालों का रंग बदलने के अलावा उनकी देह भाषा या बोलने के लहजे में खास फर्क दिखता नहीं है। ऋद्धि डोगरा दबंग अंग्रेजी पत्रकार के रूप में हैं और राशि खन्ना एक ऐसी पत्रकार के रूप में जो सच की जीत के लिए लगी हुई है। फिल्म पहले सीन से ही बार बार दोहराती रहती है कि ‘सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित कभी नहीं’। दोनों का अभिनय अपनी अपनी जगह ठीक हैं। जरा देर की भूमिका में दिखीं नाजनीन पाटनी ने भी प्रभावशाली अभिनय किया है।
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हिंदी फिल्म में हिंदी ही सही नहीं लिखी
फिल्म ‘द साबरमती रिपोर्ट’ का अपना सेट नैरेटिव है और इस नैरेटिव को पसंद करने वाले दर्शकों को ये फिल्म पसंद भी आ सकती है लेकिन चूंकि घटना दो दशक पहले की है और फिल्म खुद दिखाती है कि अब भारत-पाकिस्तान के मैच में भारत के जीतने पर भी नए हिंदुस्तान के मुसलमान खूब पटाखे छोड़ते हैं तो कहीं न कहीं ये फिल्म संतुलन बनाने के चक्कर में लड़खड़ा जाती है। फिल्म की प्रोडक्शन डिजाइन में बहुत लोचे हैं। गोधरा स्टेशन पर मराठी में टिकट घर लिखा होना अटपटा लगता है। जली हुई ट्रेन के डिब्बों के भीतर के दृश्य भी स्वाभाविक नहीं लगते। फिल्म परदे पर जितनी भी लिखी हुई हिंदी आती है, कभी भी पूरा एक वाक्य सही नहीं लिखा है। और, वो भी उस फिल्म में जो बार बार हिंदी पत्रकारिता की प्रतिष्ठा बढ़ाने का दम भरती नजर आती है।