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The Real Review: लॉर्ड बॉबी की शोहरत पर लगा ‘सूर्य’ ग्रहण, थोड़ा ‘देवरा’, थोड़ा ‘कल्कि’ जैसा निकला ‘कंगुवा’

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'कंगुवा' फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
कंगुवा (पार्ट वन
कलाकार
सूर्य , बॉबी देओल , दिशा पाटनी , योगी बाबू और कार्ति आदि
लेखक
शिवा, आदि नारायण, मोहन कार्की
निर्देशक
शिवा
निर्माता
के ई ज्ञानवेलराजा, वामसी-प्रमोद
रिलीज:
14 नवंबर 2024
रेटिंग
1/5

पुनर्जन्म की कहानी वैसे तो सिनेमा का श्योर शॉट हिट फॉर्मूला रहा है, लेकिन इसके लिए एक अदद होशियार दिमाग निर्देशक की सख्त जरूरत पड़ती है। पुनर्जन्म की कहानियों में जो रस सुभाष घई ने फिल्म ‘कर्ज’ में, फराह खान ने ‘ओम शांति ओम’ में और अनीस बज्मी ने ताजा ताजा ‘भूल भुलैया 3’ में घोला है, वैसा कुछ फिल्म ‘कंगुवा’ में नहीं है। सूरिया, सूर्या या सूर्य जो भी उनके नाम का सही उच्चारण है, उनका तमिल सिनेमा में बड़ा नाम रहा है। फिल्म ‘कंगुवा’ में उनका नाम पूरे परदे पर बड़ा बड़ा हिंदी में सूर्य लिखकर आता है तो कायदे से हिंदी लेखकों और दर्शकों को उनका नाम आगे से ऐसी ही लिखना, बोलना चाहिए, लेकिन राम को रामा, रामायण को रामायणा, परशुराम को परशुरामा लिखने वाले मानें तभी ये मुमकिन है। 

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कंगुवा (पार्ट वन) रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
‘देवरा’ जैसे द्वीपों की कहानी
अभिनेता सूर्य की तमिल के साथ हिंदी में भी सिनेमाघरों में रिलीज हुई पहली फिल्म है ‘कंगुवा’। ये पहली बार जब कोरोना संक्रमण काल से ठीक पहले 2019 में घोषित हुई थी तो उस पर आंशिक ग्रहण लगा और ये तब बंद हो गई थी। लेकिन दो साल पहले फिल्म पुनर्जीवित हो उठी और, अब सिनेमाघरों में है। कहानी हजार साल के अंतराल में फैली है। कुछ कुछ ‘देवरा पार्ट वन’ जैसे पांच द्वीपों की कहानी है। हजार साल पहले फिरंगी इन द्वीपों पर कब्जा करने आ रहे हैं और कब्जा शुरू करने से पहले इन द्वीपों को आपस में लड़ा रहे हैं। एक द्वीप के राजा का बेटा है कंगुवा। फिल्म शुरू होने के कोई आधा घंटे बाद परदे पर दिखता है, उसका मुकाबला परिस्थितियोंवश एक ऐसे द्वीप के राजा उधिरन से होना है जहां अंतिम संस्कार के समय पूरा शरीर कौओं को सौंप देने की परंपरा है। उधिरन के बेटे इस युद्ध में मारे जाते हैं। उसका एक बेटा और भी है जिसके बारे में ज्यादा किसी को पता नहीं। इसे निर्देशक शिवा ने फिल्म के सरप्राइज के तौर पर रखा है सो ज्यादा इस पर लिखना ठीक भी नहीं।

कंगुवा (पार्ट वन) रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
‘एनिमल’ के एक्शन डायरेक्टर का अतिरेक
जंगलों में रहने वाले मनुष्यों की इस कहानी में दो चीजें अतिरेक में हैं। एक तो हिंसा और दूसरा म्यूजिक के नाम पर कानफोड़ू शोर। अब चूंकि कहानी उस दौर की है जहां रक्तपिपासुओं का भी राज हुआ करता था तो फिल्म ‘एनिमल’ के एक्शन डायरेक्टर सुप्रीम सुंदर मौका मिलने पर परदा कितना लाल कर सकते हैं, ये सोचा भी नहीं जा सकता। लेकिन, एक एक्शन डायरेक्टर होना और एक एक्शन फिल्म बनाना, दोनों में उतना ही अंतर है जितना रोहित शेट्टी का एक्शन डायरेक्टर होना और एक्शन फिल्म बनाना है। फिल्म ‘कंगुवा’ के निर्देशक शिवा कई बार लगता है कि सुप्रीम सुंदर को काम पर लगाकर खुद थाइलैंड की सैर करने चले गए और दो चार सीन भी वहां से शूट कर लगाए। फिल्म की  कहानी में ‘कल्कि 2898 एडी’वाला एंगल भी है। फिल्म बताती है कि साल 2024 में देश में पुलिस की हालत खस्ता है। पुलिस कमिश्नर तक अपराधियों को अपने मातहतों से पकड़वाने की बजाय भाड़े के अपराधियों को इसकी सुपारी दे रहे हैं। फिल्म के शुरू में सूर्य ऐसे ही एक भाड़े के अपराधी के किरदार में है जिसकी मुलाकात एक घटना के दौरान एक ऐसे किशोर से हो जाती है, जो उसे उसका पिछला जन्म याद दिलाता रहता है।

कंगुवा (पार्ट वन) रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
हां, कहने को दिशा पाटनी भी हैं..
अभिनेता के तौर पर सूर्य (या सूर्या) की तारीफ तमिल सिनेमा में खूब होती रही है। उनकी ‘गजनी’, ‘सिंघम’, ‘सिंघम 2’ और ‘सूररै पोट्रू’ जैसी फिल्मों की हिंदी रीमेक भी बनी हैं। और, हिंदी फिल्म दर्शकों के बीच भी उनकी काफी इज्जत रही है। लेकिन, उन्होंने अपने निर्देशक शिवा के साथ मिलकर ये सारी इज्जत अपनी पहली ही फिल्म में कम से कम हिंदी पट्टी के दर्शकों के बीच मिट्टी में मिला दी है। उत्तर भारतीय लोग अभिनेता सूर्य को उनके सौम्य, सहज और सरल स्वभाव के लिए जानते रहे हैं, और यहां सूर्य सिर्फ और सिर्फ रौद्र, वीर, भयानक और वीभत्स रसों से सराबोर हैं। हास्य, श्रृंगार और करुणा की जो भी छींटें हैं, वे इतनी कम है कि फिल्म खत्म होते होते याद भी नहीं रहता कि अरे, इस फिल्म की हीरोइन दिशा पाटनी हैं। फिल्म की लंबाई और दिशा के रोल का समय गिना जाए तो उनसे ज्यादा परदे पर योगी बाबू नजर आते हैं। 
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कंगुवा (पार्ट वन) रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म की सारी कड़ियां ही कमजोर 
सिनेमैटोग्राफर से लेखक और लेखक से निर्देशक बने शिवा के लिए ये फिल्म शुरू से चुनौती रही है। वह एक के बाद एक हिट फिल्में देने के लिए तमिल और तेलुगु दोनों भाषाओं के सिनेमा में खासी दखल रहते हैं, लेकिन ‘कंगुवा’ उनके लिए बड़ा झटका साबित होने जा रही है। सूर्य के प्रशंसकों को ये फिल्म शायद ही पसंद आए और हिंदी पट्टी में जो लोग इसे लॉर्ड बॉबी देओल के लिए देखने जाएंगे, वे अपने इस फैसले पर पछताते ही नजर आएंगे। वैसे फिल्म ‘एनिमल’ की सक्सेस पार्टी में जो बॉबी देओल इसी फिल्म का एक वीडियो सबको दिखाकर खूब उत्साहित नजर आ रहे थे, वही बॉबी देओल फिल्म की रिलीज आते आते इसकी प्रेस कान्फ्रेंस तक से कन्नी काट गए। दुख इस बात भी का भी रहा कि फिल्म का संगीत देवी श्री प्रसाद ने दिया है। लेकिन, फिल्म के एक भी गाने की धुन कर्णप्रिय नहीं है। बैकग्राउंड म्यूजिक के बारे में मैंने पहले ही बता दिया। रही बात एडिटिंग यानी संपादन की तो उसकी गलती के चलते फिल्म काफी लंबी हो गई है। इंटरवल के पहले ही दर्शक थक जाता है, कुछ फिल्म की लंबाई के चलते, कुछ फिल्म के उबाऊ होने के चलते।  

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