नेटफ्लिक्स की इस सीरीज के तकनीशियनों की लिस्ट देखकर लगता तो यही है कि महिला सशक्तीकरण का अपना कोई विचार हिंदी सिनेमा में स्थापित करने के लिए ये सीरीज बनाई गई है। या फिर हो ये भी सकता है कि जिन कलाकारों का बड़े परदे से हिंदी सिनेमा में बोरिया बिस्तर करीब करीब बंध चुका है, उनको सहारा देने के लिए ये सीरीज बनी हो। बस दर्शकों को कोई मनोवैज्ञानिक सहारा देने की कोशिश नेटफ्लिक्स की क्रिएटिव टीम इन दिनों नहीं कर रही है। पहले इसकी ओरिजनल मूवीज टीम ने ‘नादानियां’ और ‘ज्वेल थीफ’ जैसी फिल्मों से पकाया, अब रिले रेस का बैटन ओरिलिजन सीरीज टीम ने थाम लिया है। पहली नजर में तो यही लगता है कि जैसे ‘नादानियां’ ही हम फिर से देखने बैठ गए बस हीरो हीरोइन बदल गए हैं। और, हीरो हीरोइन यहां भी ऐसी एक्टिंग करते शुरू के 15 मिनट में दिखते हैं कि रिव्यू न लिखना हो तो सीरीज देखना वहीं बंद कर दिया जाए।
कहा यही जाता रहा है कि किसी भी सीरीज के पहले दो एसिपोड कहानी का ताम झाम सेट करने के लिए बिखरे बिखरे हो सकते हैं, और इसी कहावत को याद करते हुए छह एपिसोड और देखने का जतन किया भी गया लेकिन पूरी सीरीज देखन के बाद लगता यही है कि इससे अच्छा मनोरंजन तो इन दिनों नॉन फिक्शन में हो रहा है। सोफिया शेखर और अविराज सिंह की लव एंड हेट रिलेशनशिप पर बनी ये सीरीज अपने टेकऑफ में ही मात खा जाती है। घोड़े पर भागते ईशान खट्टर जैसे ही घूमकर देखते हैं, जवानी के दिनों के डीनो मोरिया जैसे दिखने लगते हैं। डीनो मोरिया की सीरीज मे कास्टिंग की वजह भी यही हो सकती है। सीरीज में कास्टिंग के नाम पर पुराने पटाखों की भरमार है। लेकिन, नोरा फतेही का होना इस सीरीज का सबसे कमजोर कास्टिंग प्वायंट है। नहीं तो जीनत अमान, साक्षी तंवर ने अपना पूरा मजमा तो जमा ही दिया था। सुमुखी सुरेश और लीजा मिश्रा का एक कांड यहां अलग ही बनता बिगड़ता रहता है और बाकी के कलाकार ऐसे हैं कि आप आखिर तक उनको पहचानने का केबीसी खेलते रह सकते हैं।
स्टार्ट अप्स और रॉयल एक्सपीरियेंसेस के बीच झूलती वेब सीरीज ‘द रॉयल्स’ की कहानी नेहा वीना शर्मा ने नेटफ्लिक्स की जरूरतों के हिसाब से एक ऐसी वेब सीरीज रचने की कोशिश की है जिसकी आत्मा तो भारतीय हो पर जिसे देखने के लिए दुनिया भर में बसे भारतीय उत्सुक हो जाएं। रोमांटिक कॉमेडी फिल्म जैसा इसका कैनवास इस हिसाब से लगता भी ठीक ठाक है, बस इस कैनवास पर कलाकारी करने के लिए बाकी जो लोग आए उन्होंने एक के बाद एक इसमें पलीता ही लगाया है। सीरीज की कास्टिंग के बाद दूसरी कमजोर कड़ी है इसकी प्रोडक्शन डिजाइन है। इसका कलर टैम्पलेट आंखों को बहुत ज्यादा चुभता है। अंतरा लाहिड़ी चाहती तो तमाम सारे ऐसे दृश्य संपादन में हटा सकती थीं जिन्हे देखते समय दोहराव सा महसूस होने लगता है।
आठ एपिसोड तक ये सीरीज देखने की अगर आपके अंदर पूरी इच्छाशक्ति है तो प्लीज इसे देखने का समय पहले से तय कर लें। सिर्फ सीरीज देखने के लिए इसे देखने की कोशिश न करें। हां, घर के दूसरे काम करते समय अगर ड्राइंग रूप के बड़े वाले टेलीविजन पर ये सीरीज चलती छोड़ देंगे तो आप दोनों काम साथ साथ भी कर सकती हैं और खास कुछ मिसिंग इसमें होगा नहीं। कहने को ये सीरीज अपने नाम और इसमें काम करने वालों के दाम के चलते खूब देखे जाने का हल्ला भी मचेगा और बातें ये भी होंगी कि इस तरह की सीरीज और कहानियां मिलकर ही एक ओटीटी की अच्छा बुके बनाती है। लेकिन, ये सब कहने वाली बातें हैं। पंचम घावरी ने कुछ बढ़िया नए कलाकारों की इसमें कास्टिंग की होती और हर्ष उपाध्याय, कनिष्क सेठ के साथ रूह और जोह ने कुछ अच्छे रॉयल फील वाले गाने बनाए होते तो कुछ और ही बात होती। नेटफ्लिक्स पर कोई बढ़िया हिंदी ओरिजिनल फिल्म या ओरिजिनल सीरीज देखे अब तो जमाना सा हो गया लगता है।