वेब सीरीज 'ग्राम चिकित्सालय' रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला
पंचायत से पीएचसी तक पहुंची टीवीएफ की कहानी
जी हां, ग्रामीण परिदृश्य में रची गई सीरीज ‘पंचायत’ को मिली सफलता ने अमेजन प्राइम वीडियो को इसी तरह की एक और सीरीज ‘ग्राम चिकित्सालय’ बनाने का आइडिया ओटीटी वालों ने ही दिया लगता है। सोचिए तो जरा टीवीएफ वालों को शोहरत मिलनी शुरू हुई थी ‘परमानेंट रूममेट्स’ से बीते 10 साल में ये वहां से उतरकर ‘ग्राम चिकित्सालय’ तक आ गए हैं। नेटफ्लिक्स को समझ आ रहा हो न आ रहा हो, प्राइम वीडियो वालों को समझ आ चुका है कि शहर में जिसको जितना ओटीटी-ओटीटी खेलना था, वह खेल चुका। अब बारी इंडिया की नहीं भारत की है। तो भारत का रहने वाला हूं भारत की बात सुनाता हूं, जैसे गाने सुन सुनकर टीवीएफ ने पैसा बटोरने का नया नुस्खा निकाला है, चलो गांव की ओर। पंचायत हो गई, पीएचसी तक बात पहुंचै चुकी है, अब गन्ना खरीद केंद्र, गेहूं खरीद केंद्र, प्राइमरी स्कूल, आंगनबाड़ी, चकबंदी, तहसील दफ्तर की बारी भी इनके बाद कभी भी लग सकती है।
वेब सीरीज 'ग्राम चिकित्सालय' रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
जबरिया बनाई गई वेब सीरीज में फंसे अमोल
वेब सीरीज ‘ग्राम चिकित्सालय’ देखकर शुरू से ही ये समझ आने लगता है कि ये किसी विचार पर बनी सीरीज नहीं है, ये सीरीज बनाने के लिए तलाशा गया विचार भर है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के बारे में इसके रिसर्चर ने भी रिसर्च नहीं की है। की होती तो कहानी वहां से शुरू होती जहां लाखों रुपये खर्च करके डॉक्टर बनने वाले गांव जाना ही नहीं चाहते। अमोल पाराशर इस सीरीज की कास्टिंग में हुई हड़बड़ी की कहानी खुद कहते हैं। उनकी टाइमिंग भी मैच नहीं हो रही है। न संवाद बोलने में, न अस्पताल खोलने में। कोलकाता वाला कोई राइटर ये भी कह रहा है कि ये कहानी तो उसने विनय पाठक को बहुत पहले बताई थी, तो क्या विनय पाठक इसे लेकर टीवीएफ के पास पहुंच गए? पता नहीं, इन दिनों सूचनाओं का युद्ध अकेले सीमा पर नहीं सीमा के भीतर भी चल रहा है। संभल के रहिए अपने घर में छुपे हुए गद्दारों से...!
वेब सीरीज 'ग्राम चिकित्सालय' रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
बहुत नकली सा लगा विनय पाठक का किरदार
विनय पाठक यहां गांव के वो झोलाछाप डॉक्टर हैं, जिनके बूस्टर से इंसान तो क्या आत्मा भी बूस्ट हो जाए। गूगल पर लक्षण डालते हैं, एआई बता देता है कि बीमारी क्या है, बस उसी का वह इलाज बता देते हैं। सोचिए एआई के मेडिकल क्षेत्र में उपयोग भर पर कोई सीरीज बनी हो तो कितनी शानदार हो सकती है। विनय पाठक का अभिनय बहुत स्वाभाविक नहीं है। उनके किरदार की रिसर्च भी बहुत कमजोर है। कहानी एपिसोड दर एपिसोड लुढ़कती रहती है। एमओ साब परेशान हैं कि लोग उनके पास आ ही नहीं रहे। और, अस्पताल के लोग परेशान हैं कि ये आदमी है क्या चीज? दवा-दारू का अंडर द टेबल चल रहा है सो अलग। कमीशन देने-लेने तक के खुलासे हो रहे हैं। पर बस ये कहानी किसी असली अस्पताल जैसी पता नहीं क्यों आखिरी एपिसोड तक लगी ही नहीं। ‘पंचायत’ जैसी फील नहीं है इसमें। गोरी छोरी को लीप पोत कर सांवला बनाने की कोशिशों ने इसकी और छीछालेदर की है।
वेब सीरीज 'ग्राम चिकित्सालय' रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सिनेमैटोग्राफी कमाल की, गाजे-बाजे में मजा नहीं
चंद्र शेखर प्रजापति चाहते तो हर एपिसोड को कम से कम 10 मिनट कतर सकते हैं, उनके रामराज के चलते एपिसोड फैले हुए लगते हैं। गिरीश कांत का कैमरा जरूर लगा रहता है, झारखंड को कश्मीर जैसा दिखाने में। उनके लॉन्गशॉट के बनाए कुछ फ्रेम वाकई बहुत खूबसूरत हैं और कहीं कहीं तो ‘शोले’ के फ्रेम्स की भी याद दिलाते चलते हैं। सीरीज के रचयिताओं दीपक मिश्रा और अरुणभ के अति आत्मविश्वास की मारी ये सीरीज इस बार संगीत में भी कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाती है। नीलोत्पल बोरा इसमें थोड़ा और लोकसंगीत भरे होते तो आनंद कुछ और ही होता। नीरज कुमार का प्रोडक्शन डिजाइन बहुत चाक चौबंद और चमकीला है। हां, सुमेधा शक्ति को सीरीज के कॉस्ट्यूम बनाने से पहले कुछ दिन झारखंड के गांव में जरूर गुजारने चाहिए थे। बहुत खाली समय हो तो टाइम पास करने के लिए सीरीज एक बार देखी जा सकती है, बस इससे ‘पंचायत’ के पहले दो सीजन जैसी फीलिंग वाली 'एक्सपेक्टेशन' मत करिएगा।