फिल्म ‘द मेहता बॉयज’ क्यों देखनी चाहिए? अगर सवाल ये है तो इसका जवाब मैंने रिव्यू की पहली लाइन लिखने के साथ ही दे दिया। लेकिन फिर भी, अगर सवाल अब भी कायम है तो इसके सार का विस्तार समझने की कोशिश करते हैं। मुंबई जैसे शहर में एक नक्शानवीस को अपने हुनर पर शायद भरोसा नहीं हो रहा है। उसकी दोस्त समझाती भी है कि दुनिया ऐसे ही औसत लोगों से भरी पड़ी है और उसका टैलेंट तो फिर भी उनसे कहीं इक्कीस है। पर इसी बीच मां गुजर जाती है। बेटा अपने घर आता है। बहन अमेरिका से पहले ही आ चुकी है। दोनों बातें करते हैं। असल किस्सा पिता और बेटे के आमने-सामने आने पर खुलता है। ये कहानी बाप-बेटे के रिश्तों की है। दोनों में अपनी अपनी अकड़ है। दोनों एक दूसरे को चाहते हैं, दिल से। लेकिन जता नहीं पाते। बेटा मां के निधन पर घर आता है। वहां से लौट रहा होता है तो बाप बिस्तर से उठकर उसके पास तक तो आता है, पर गले नहीं लगा पाता। रिश्तों की ये ठंडक पिघलनी शुरू होती है, मुंबई में बेटे की बरसाती में जहां अपने पिता के हाथ की बनाई गर्मागर्म नूडल्स खाते हुए वह अपने पिता के साथ चार्ली चैपलिन की फिल्म देखते हुए पहली बार हंसता दिखता है।
साथ हंसने और साथ रोने वालों के रिश्ते ही सबसे करीब के होते हैं, ये सब जानते हैं। फिल्म ‘द मेहता बॉयज’ रिश्तों की ही एक ऐसी खुली किताब बनने की कोशिश करती है जिसे पढ़ने का अलग ही आनंद है। जी हां, ये सिनेमा किताब जैसा ही आनंद देती है। बशर्ते आपके पास इसे पढ़ने का समय हो और उतनी सहजता भी जितनी शायद बाप-बेटे के रिश्तों वाली ठेठ कमर्शियल हिंदी फिल्मों में कम ही होती है। बाप-बेटे का रिश्ता शायद दुनिया का सबसे क्लिष्ट रिश्ता होता है। जैसा बाप अपने बेटे को बनाना चाहता है। बेटा कई बार बनना भी चाहता है लेकिन इस इनपुट से लेकर आउटपुट के बीच का जो प्रोसेस है, उसे लेकर दोनों में अंत तक मनभेद, मतभेद और मनीभेद बना रहता है। पिता हमेशा इस गुमान में रहता है कि उसे सब पता है। बेटों को अक्सर पिता का गाहे बेगाहे हर समय ‘ज्ञान’ बांटते रहना अच्छा नहीं लगता। हां, भाई-बहन की तकरार भी फिल्म ‘द मेहता बॉयज’ में है। दोनों एक दूसरे से टॉम एंड जेरी की तरह लड़ते हैं लेकिन साथ भी इन्हीं दोनों की तरह बने रहना चाहते हैं।
बतौर अभिनेता बमन ईरानी ने हिंदी सिनेमा में कमाल के किरदार किए हैं। वह ऐसे अभिनेता रहे हैं, जिन्होंने अपनी ब्रांडिंग पर शायद कभी काम ही नहीं किया। जितना अनुभव मेरा पारसी परिवारों को करीब से जानने का, उनके साथ उठने बैठने का रहा है, तो ये सब ऐसे ही होते हैं। दरियादिल इंसान, जिनके पास अपने ऊपर इतराने का समय ही नहीं होता। ये देखना दिलचस्प है कि बमन ने अपनी पहली ही फिल्म को इतने करीने से बनाया है कि कई बार तो इस बात पर कोफ्त होने लगती है कि इस आदमी ने पहले ही निर्देशन क्यों नहीं शुरू किया? फिल्म ‘द मेहता बॉयज’ ठेठ कमर्शियल फिल्म नहीं है। इसीलिए, शायद सिनेमाघरों तक पहुंची भी नहीं। सीधे ओटीटी पर उतरी इस फिल्म को गोवा फिल्म फेस्टिवल में खूब तालियां मिली थीं। अब इसे घर पर देखते हुए दो चार तालियां आप भी मन ही मन मारेंगे, ऐसा मैं कह सकता हूं।
निर्माता, निर्देशन, लेखन के अलावा बमन ने फिल्म में अभिनय भी किया है। लोग दो नावों की सवारी नहीं करने को कहते हैं, यहां वह चार नावों में एक साथ सवार हैं। और, हर डिपार्टमेंट में वह अव्वल नंबर रहे हैं। उनका अभिनय का मुरीद होना आसान है। उनका रिश्तों में नाटकीयता न ओढ़ने का कमाल ही उन्हें बेहतरीन अभिनेता बनाता है। बेटे के रूप में अविनाश तिवारी कई बार नया ‘मनोज बाजपेयी’ होने का भ्रम देने लगते हैं। उनकी अभिनय की रेंज वैसी ही है। वह कलाकार हैं। स्टार बनने के फेर में न पड़े तो आगे पचास साल तक और अभिनय कर सकते हैं। पिता को घर में न पाकर उनकी तलाश में निकलना और फिर कमर तक सड़क पर भरे पानी मे पिता को सामान लाते देखने वाला सीन कमाल है। परदे पर दमकने का काम यहां श्रेया चौधरी ने किया है। हीरो के आत्मविश्वास को लगातार बढ़ाते रहने की कोशिशें करने वाली हीरोइन को दर्शक भी सलाम करते हैं और अगर वह बाप-बेटे के बीच पुल भी बनने की कोशिश करे तो फिर कहना ही क्या? पूजा सरूप ने भी अपने अभिनय से सबको प्रभावित किया।
फिल्म ‘द मेहता बॉयज’ की कमजोर कड़ियां भी है। जैसे एक अच्छी कहानी का क्लाइमेक्स बहुत साधारण सा है। बमन यहां शायद पारंपरिक रास्तों और सूत्रों में उलझ गए। सिनेमैटोग्राफी इस फिल्म की और बेहतर हो सकती थी। संपादन अच्छा है। फिल्म अभी दो घंटे से कुछ ही कम है, लेकिन इसे 90 मिनट की फिल्म बनाकर इसे और चुस्त किया जा सकता है। गीत-संगीत की जरूरत हिंदी सिनेमा में शुरू से रही है और कहानी अगर पत्नी के गुजरने के बाद अकेले पड़े इंसान की हो जिसके बच्चे अपनी अलग अलग दुनिया में संघर्ष कर रहे हों तो इसकी गुंजाइश भी खूब निकलती है, पर बमन का हिंदी हृदय प्रदेशों के मनोविज्ञान को न समझना, इसकी वजह हो सकती है। कुल मिलाकर फिल्म एक कलात्मक फिल्म जैसी है और अगर इस सप्ताहांत समय हो तो इसे बिना किसी खास उम्मीद के देखेंगे तो आपको अच्छा ‘फील’ होगा।