द ब्रोकेन न्यूज (वेब सीरीज)
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
जंग टीआरपी की नहीं कारोबार की
बीबीसी की सीरीज ‘प्रेस’ के इस हिंदी अनुकूलन में देश में हाल फिलहाल घटी तमाम घटनाएं एक के बाद एक अलग अलग संदर्भों में आती है। दो ऐसे न्यूज चैनलों के बीच इन घटनाओं के जरिये ज्यादा से ज्यादा टीआरपी बटोरने का सबब बनती हैं, लेकिन जैसे जैसे सीरीज आगे बढ़ती है, समझ ये भी आता है कि न्यूज चैनल का कारोबार अब टीआरपी के कंपटीशन से कहीं आगे निकल चुका है। कारोबारी घरानों के अपने अपने स्वार्थों के तहत न्यूज चैनलों को अपने कब्जे में लेने की इस कहानी का दर्शकों के सामने परोसने का जरिया बने हैं दो न्यूज चैनल जो देश के किसी भी कोने में हो सकते हैं। यहां संदर्भ 12 करोड़ आबादी वाले राज्य का है। बार बार वर्ली सी लिंक दिखता है तो माना जा सकता है कि ये दोनों चैनल महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई से चल रहे हैं। सीरीज की कहानी में वह सब कुछ है जिसे दर्शक रोजमर्रा की जिंदगी में लगातार देखते रहे हैं। इसमें डाटा चोरी है। लोगों को ट्रोल करने वाली वाटर आर्मी है। चुनावी चंदे का सवाल है। आत्महत्या है। एप के जरिये लोगों को ठगने वाली कहानी है और भी तमाम घोटाले और कारनामे हैं।
द ब्रोकेन न्यूज (वेब सीरीज)
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हिंदी के दर्शकों के सामने हिंदी की कुर्बानी
दिक्कत वेब सीरीज ‘ब्रोकेन न्यूज’ के दूसरे सीजन में ये है कि इसे लिखते समय सब कुछ समेट लेने का उतावलापन साफ दिखता है। किसी एक घटना पर रुक कर न उसे समझने की कोशिश है और न ही उसकी गहराई में जाकर इसके देश पर पड़ सकने वाले असर को ढंग से समझने का प्रयास ही किया गया है। झगड़ा दो ऐसे न्यूज चैनलों के लोगों के बीच है जो हिंदी के हैं। अंग्रेजी मिश्रित हिंदी अपने टिकर, हेडर, न्यूज फ्लैश और बैंड्स में लिखते हैं और ये हिंदी भी सही से लिखी नहीं गई है। संवादों में ‘सुरक्षितता’ जैसे शब्द एक तरह से हिंदी की हंसी उड़ाते भी दिखते हैं। एक तरफ सरकार की गोद में बैठा एक न्यूज चैनल का सर्वेसर्वा है, जो अपने शो की एंकरिंग खुद ही करता है। और, दूसरी तरफ वह रिपोर्टर है जो पिछले सीजन में इसी अदावत के चलते जेल चली गई थी। लेकिन, खुद को तुर्रम खां समझने वाले इन बड़े नाम वाले एंकर्स की हैसियत कारोबारी घरानों को चलाने वालों के सामने क्या है, इसका खुलासा भी सीरीज करती चलती है।
द ब्रोकेन न्यूज (वेब सीरीज)
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स्टूडियो स्टूडियो घूमती कहानी
‘ब्रोकेन न्यूज’ का दूसरा सीजन कुछ कुछ जी5 पर हाल ही में प्रसारित फिल्म ‘साइलेंस’ के सीक्वल जैसा ही। एक ऐसी कहानी जिसे जनता के बीच खुले में जाकर पकना चाहिए था, वह बस स्टूडियो स्टूडियो घूमती रहती है। बीच बीच में सी लिंक या मुंबई की स्काईलाइन आती रहती है लेकिन समाचारों का जो असली सस्पेंस ‘फील्ड’ में पकना चाहिए, उस पर इसकी पकड़ नहीं है। सीरीज की कहानी ‘साइलेंस 2’ की ही तरह तेज रफ्तार है। दर्शकों का ध्यान लगातार स्क्रीन पर बना रहे, इसके लिए घटनाएं भी तेजी से घटती हैं, लेकिन इस अफरातफरी में सीरीज की पटकथा बहुत कुछ बताने में कुछ भी ठोस तरीके से कहने से चूक जाती है। कथा, पटकथा और संवादों के लिहाज से सीरीज कमजोर है। सीरीज की शूटिंग चूंकि ज्यादातर इनडोर ही है लिहाजा समाचारों की दुनिया की बजाय ये समाचार वाचकों की दुनिया की सीरीज बनकर रह जाती है।
द ब्रोकेन न्यूज (वेब सीरीज)
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‘स्कूप’ जैसे दृश्यों का दोहराव घातक
वेब सीरीज ‘ब्रोकेन न्यूज’ के दूसरे सीजन को देखने में आखिर तक मन लगा रहने की बस दो ही वजह हैं और एक है इसका निर्देशन और दूसरा इसके कलाकारों का अभिनय। विनय वाइकुल ने एक ऐसी स्क्रिप्ट पर सीरीज बनाई है जिसमें न्यूज चैनलों की हकीकत समझने वालों की शायद नजर नहीं पड़ी है। इसके बावजूद वह इसे सस्पेंस थ्रिलर जैसा एहसास देने में कामयाब रहते हैं। सीरीज देखते समय दर्शकों को हंसल मेहता की अखबारों की सियासत पर बनी सीरीज ‘स्कूप’ भी बार बार याद आती रहती है और श्रिया पिलगांवकर की पुलिस हिरासत में कपड़े उतारकर तलाशी वाला दृश्य तो करीब करीब वैसा ही शूट कर लिया गया है जैसा ‘स्कूप’ में करिश्मा तन्ना वाला सीन था। विनय वाइकुल को यहां अपना निर्देशकीय हस्तक्षेप करना चाहिए था। स्क्रिप्ट की ढेर दिक्कतों के बीच भी विनय का अपने किरदारों के बीच तनाव बनाए रखना और इसे उत्तरोत्तर संभाले रखना उनकी बड़ी जीत कही जा सकती है।
द ब्रोकेन न्यूज (वेब सीरीज)
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जयदीप, श्रिया और सोनाली पर पूरी जिम्मेदारी
लेकिन, जी5 की इस सीरीज को पूरी तरह संभाला है जयदीप अहलावत, श्रिया पिलगांवकर और सोनाली बेंद्रे की अदाकारी ने। जयदीप अहलावत की अदाकारी के रंग भी इसमें खुलकर बिखरे हैं। सरकारी पक्ष का न्यूज चैनल चलाने वाले की बदनीयती उनके किरदार में घुल गई है। घरेलू मोर्चे पर उनका किरदार एक अलग तनाव से गुजरता रहता है। लेकिन, इस सबके बीच दर्शकों को बार बार ये याद दिलाया जाता है कि ये किरदार जहनी तौर पर ईमानदार है, बस हालात ने उसे बेईमानी के दलदल में धकेल दिया है। जयदीप जैसे जानदार अदाकार के सामने श्रिया पिलगांवकर ने पूरी दम लगाकर मोर्चा संभाला है। जैसे को तैसा, वाली राह पर चल निकला उनका किरदार सीरीज का तनाव इसके शिखर पर ले जाने की कोशिश करता रहता है और इन दो चरम बिंदुओं के बीच का संतुलन बनाने वाले किरदार में सोनाली बेंद्रे ने भी कमाल का काम किया है।
द ब्रोकेन न्यूज (वेब सीरीज)
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तकनीकी तौर पर कमजोर सीरीज
अपनी कहानी, पटकथा और संवादों में कमजोर होने के चलते वेब सीरीज ‘ब्रोकेन न्यूज’ दूसरे सीजन में भी वैसा असर ला नहीं पाती है, जिसकी उम्मीद इसके कलाकारों की मौजूदगी के चलते इससे दर्शकों को पहले सीजन में भी रही थी। सीरीज का कला निर्देशन औसत है। पार्श्वसंगीत भी इसकी मदद नहीं कर पाता है। बॉम्बे हाईकोर्ट को मुंबई हाईकोर्ट लिखना, बिल को बील लिखना, इसकी ब्रांड वैल्यू को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं। सीरीज टाइमपास करने लायक है, लेकिन अगर इसकी राइटिंग और प्रोडक्शन टीम कायदे की ली गई होती तो ये बहुत शानदार सीरीज बन सकती थी।