फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Tarot Movie Review: ताश के पत्तों में छिपी मौत के बेरंग किस्से, नई पीढ़ी को डराने की कोशिश में नाकाम रही फिल्म

विज्ञापन
टैरो रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
Movie Review
टैरो
कलाकार
हैरिये स्लेटर , अडायन ब्रैडल , अवंतिका , वूल्फगैंग नोवोग्रात्ज , हंबरली गोंजालेज , लार्सन थॉम्प्सन और जैकेब बाटालोन
लेखक
स्पेन्सर कोहेन और एना हालबर्ग
निर्देशक
स्पेन्सर कोहेन और एना हालबर्ग
निर्माता
लेसली मॉर्गनस्टीन , एलिसा कॉपलोविट्ज डटन और स्कॉट ग्लासगोल्ड
रिलीज:
3 मई 2024
रेटिंग
1/5

सिनेमा में 90 मिनट की फिल्मों का सिलसिला तेजी पकड़ रहा है। एक अच्छी कहानी, एक चुस्त पटकथा, बेहतरीन कलाकार और साथ में दर्शकों की रूह को छूता संगीत, किसी भी 90 मिनट की फिल्म के लिए ये चल निकला फॉर्मूला है। करीब 90 मिनट की हॉरर फिल्म ‘टैरो’ में ऐसा ही कुछ करने की कोशिश की गई है। नई सदी के युवाओं के बीच अंधविश्वास को मानने, न मानने की बहस के बीच से निकलने की कोशिश करती सोनी पिक्चर्स की नई रिलीज ‘टैरो’ का लक्षित दर्शक वर्ग न्यू मिलेनियल्स ही हैं। ये फिल्म ‘फाइनल डेस्टिनेशन’ सीरीज की फिल्मों की तरह ही मौत को झांसा देने की कोशिशों के साथ आगे बढ़ती है। लेकिन, स्पेन्सर कोहेन और एना हालबर्ग की ये कोशिशें कितनी कामयाब रहीं, आइए समझने की कोशिश करते हैं।

विज्ञापन

टैरो रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘टैरो’ जिस उपन्यास पर बनी है, उसका प्रकाशन साल 1992 में हुआ था। उस समय के हिसाब से इस कहानी का ताना-बाना भी ठीक ही है। लेकिन तकनीकों के इस नए दौर में इस कहानी को नए सिरे से गढ़ना और कहानी में लिखे गए हॉरर से न्यू मिलेनियल्स को डराने की कोशिश करना बहुत दूर की कौड़ी है। कहानी युवाओं के एक समूह की है जो छुट्टिया मनाने शहर से दूर एक पुरानी हवेलीनुमा इमारत में ठहरते हैं। साथ लाया कोटा खत्म होने पर ये घर में छुपा कर रखी गई शराब की बोतलें तलाशने की कोशिश करते करते पहुंच जाते हैं एक ऐसे तहखाने में, जहां टैरो कार्ड का एक बक्सा उन्हें मिलता है। इस समूह की एक युवती को टैरो रीडिंग का शौक रहा है। अपनी बीमार मां के लिए उसने इनके जरिये भविष्य जानने की खूब कोशिश भी की और अब उसके इस शौक को उसके दोस्त जगा देते हैं। वह सबके लिए कार्ड फेंटती है। उन्हें वृत में सजाती है और सबकी सूर्य राशियों के अनुसार उनका भविष्य बांचती है।

टैरो रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
पुरानी हवेली में बांचा गया भविष्य इन युवाओं के अपने अपने ठिकानों पर पहुंचने से पहले ही सच होने लगता है। जिसका जो कार्ड निकला था, और उसका जो भी भविष्य बांचा गया था, वह सच होने लगता है। पुलिस आती है। तफ्तीश शुरू होती है। लेकिन, एक एक कर मर रहे अपने साथियों के तार एक बार टैरो कार्ड से जुड़े होने की बात समझ आते ही जंग शुरू होती है इन शापित कार्ड्स को नष्ट करने की। फिल्म ‘टैरो’ की सबसे कमजोर कड़ी इसकी कहानी ही है। नई सदी में नए हॉरर की जरूरत है, लेकिन ये फिल्म बहुत ही घिसे पिटे हॉरर फॉर्मूले को दर्शकों डराने का आधार बनाती है। फिल्म की शैतान आत्मा रूप बदलने में माहिर है और शेप शिफ्टिंग का ये पुराना आजमया फॉर्मूला भी यहां अपना असर नहीं जमा पाता है।

टैरो रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘टैरो’ न्यू मिलेनियल्स की हॉरर फिल्म सिर्फ कहने भर को है। इसमें डराने के लिए इस्तेमाल किए गए जंप स्केयर्स और स्क्रीन पर पड़ते खून के छींटे इसे किसी भी तरह आज के समय की फिल्म नहीं बनने देते। फिल्म की शूटिंग बहुत ही कम रोशनी में की गई है। निर्देशक द्वय की सोच इसके पीछे शायद लगातार एक डरावना माहौल बनाए रखने की होगी, लेकिन अच्छा हॉरर अब सिनेमा के पर्दे पर वही होता है जो चकाचौंध कर देने वाली रोशनी के बीच घटित हो। हॉरर सिर्फ रात में ही अब नहीं होता, ये दिन के उजाले में भी किसी की जान ले सकता है। मौत आने का तरीका पता हो, और मरने वाले को इसका अंदाजा भी हो जाए, इसके बाद भी वह खुद ही मौत के करीब दौड़ जाए, ये सब अब फिल्मों में बहुत हो चुका है।
विज्ञापन

टैरो रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
स्पेन्सर कोहेन और एना हालबर्ग की पटकथा कमजोर है और उनका निर्देशन बहुत ही पारंपरिक और एक फरमे में गढ़ा हुआ दिखता है। दोस्तों के समूह में इनकी आपसी दोस्ती के तार भी वे ठीक से नहीं बुन पाए हैं। समावेशी समूह बनाने के लिए इन दोस्तों में एक लड़की भारतीय मूल की नजर आती है और एक दोस्त एशिया प्रशांत क्षेत्र का, लेकिन इससे बात बनती नहीं है। कहानी का डीएनए ही इतना कमजोर है कि इस पर कोई ढंग की हॉरर फिल्म बन पाना मुश्किल ही है। ये सच है कि इक्कीसवीं सदी चौथाई बीतने को है और फिर भी समाज में भविष्य बांचने की परंपरा अपनी जड़ें जमाए हुए है, लेकिन इनके बीच से निकली कहानी में कुछ तो नई सदी जैसा होना ही चाहिए था।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें