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Thai Massage Review: फिर प्रशंसकों का दिल तोड़ने में कामयाब रहे इम्तियाज, थाईलैंड की छवि चमकाने का ‘बूम बूम’

सार

फिल्म ‘थाई मसाज’ का नायक सेवानिवृत्त है। पत्नी गुजर चुकी है। हस्तमैथुन उसके रतिसुख का सहारा है। और, एक दिन वह इसमें भी नाकाम रहता है। अपने खास दोस्त से वह ये समस्या बताता है तो वह उसकी हंसी उड़ाता है। अवसाद उसका इतना गहराता है कि वह आत्महत्या की ठान लेता है।
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थाई मसाज रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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Movie Review
थाई मसाज
कलाकार
गजराज राव , दिव्येंदु शर्मा , अलीना जसोबिना , सनी हिंदुजा और अनुरिता झा आदि
लेखक
मंगेश हडावले , साजिद अली और आशीष ठाकुर
निर्देशक
मंगेश हडावले
निर्माता
इम्तियाज अली और मोहित चौधरी
रिलीज डेट
11 नवंबर 2022
रेटिंग
1/5

विस्तार
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इम्तियाज अली कहीं खो गए हैं। वे इम्तियाज अली जिन्होंने ‘जब वी मेट’, ‘लव आजकल’, ‘रॉकस्टार’ और ‘हाईवे’ जैसी फिल्में निर्देशित कर हिंदी सिनेमा को प्यार के कुछ अलग मायनों से परिचित कराया। नायिकाएं उनकी हमेशा पथ प्रदर्शक जैसी रही हैं। कहानी में उनकी हिस्सेदारी हाशिये पर रहते हुए भी वह नायक को उसके जीवनचक्र के केंद्रबिंदु तक पहुंचाने का जरिया बनती रहीं। फिर उन्हें शाह रुख प्रेम हुआ। ‘जब हैरी मेट सेजल’ बनाई। मामला जमा नहीं। इसके बाद अपनी ही कहानी को लेकर ‘लव आजकल’ फिर से बनाई। इस बार रायता बिखर गया। लेकिन, उनकी छवि एक मजबूत फिल्मकार की रही है। सिर्फ दो तीन फिल्मों के अपेक्षानुरूप न चलने से कोई फिल्मकार सेक्स का सहारा लेने लगे, ऐसा कम ही होता है लेकिन इम्तियाज अली के मामले में ऐसा लगातार हो रहा है। वह डरे हुए फिल्मकार दिखने लगे हैं। पहले ‘शी’ फिर ‘डॉ. अरोड़ा’ और अब ‘थाई मसाज’। लोग जब भी खिड़की के पास बैठे बालक वाला लोगो देखते हैं, उम्मीदें बंधती है कि हिंदू कॉलेज वाला बागी फिर से अपने तेवर दिखाएगा, लेकिन इम्तियाज अपने प्रशंसकों के धीरज का इन दिनों बार बार इम्तिहान ले रहे हैं।

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थाई मसाज रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अच्छी बात को अच्छे से कहने का सलीका नहीं
हो सकता है उल्लू ऐप या ऑल्ट बालाजी पर ‘सरिता भाभी’ और ‘गंदी बात’ जैसी वेब सीरीज की लोकप्रियता को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाले दर्शकों को इम्तियाज की इन नई कहानियों में रतिसुख जैसा कुछ मिलता भी हो लेकिन इम्तियाज के नाम पर फिल्में व सीरीज देखने वाले उनके पुराने दर्शक उनसे छिटकते जा रहे हैं। फिल्म ‘थाई मसाज’ देखने का मेरा बिल्कुल मन नहीं था। लेकिन, इम्तियाज के साथ लंबे समय से रहे उनकी टीमवालों ने भरोसा दिलाया कि फिल्म वह नहीं है जैसी नाम से समझ आती है। ये भी एक नया अनुभव था सीखने का कि फिल्म जो ट्रेलर में है, पोस्टर में है, वैसी नहीं भी हो सकती है। तो सिनेमा का ये नया सबक सीखने को ‘वकांडा फॉरएवर’ से ठीक पहले हम जा पहुंचे थियेटर में। गिनती के दर्जनभर फिल्म समीक्षक भी ये फिल्म देखने नहीं आए जबकि इसके ठीक बाद के ‘वकांडा फॉरएवर’ के प्रेस शो में लाइन लगाकर एंट्री हुई।

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थाई मसाज रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
बुजुर्गों का सिनेमा समय की जरूरत
इसमें कोई संदेह नहीं कि फिल्म ‘थाई मसाज’ का विषय बहुत सामयिक है। करीब 140 करोड़ की आबादी वाले अपने देश में करीब 14 करोड़ लोग 60 साल से ऊपर हैं। युवाओं की पसंद पर फिदा सिनेमा में इस 10 फीसदी आबादी को ध्यान में रखकर सिनेमा बनना अब शुरू तो हुआ है लेकिन इनका दर्शक वर्ग सिनेमाघरों तक अपने दोस्तों के साथ जब तक आएगा नहीं, मामला जमेगा नहीं। और, ये दर्शक वर्ग अभी बढ़ने वाला है। करीब 68 साल की औसत आयु वाले भारत में लोगों की जिंदा रहने की उम्र अगले 25 साल में बढ़कर 73 वर्ष से ऊपर होने वाली है। फिल्म ‘थाई मसाज’ अपने ही घरों में हाशिये पर पहुंच रहे बुजुर्गों को अपने जबर्दस्ती ओढ़े गए बुढ़ापे के खोल से बाहर आने का संदेश देने वाली बेहतरीन फिल्म हो सकती थी। जैसे एडल्ट्स ओनली का टैग लगाकर बच्चों के लिए कुछ विषय वर्जित कर दिए गए, वैसे ही घर के बड़े होते बच्चों ने एक काल्पनिक टैग इस बात का भी बना लिया है जो घर के बुजुर्गों के लिए वर्जित है यानी कि दैहिक सुख की कामना।

थाई मसाज रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कहानी का सार अच्छा, विस्तार बेहूदा
फिल्म ‘थाई मसाज’ का नायक सेवानिवृत्त है। पत्नी गुजर चुकी है। हस्तमैथुन उसके रतिसुख का सहारा है। और, एक दिन वह इसमें भी नाकाम रहता है। अपने खास दोस्त से वह ये समस्या बताता है तो वह उसकी हंसी उड़ाता है। अवसाद उसका इतना गहराता है कि वह आत्महत्या की ठान लेता है। लेकिन, ऐन मौके पर एक ‘ज्ञानचंद’ उसे परम ज्ञान दे देता है। बुजुर्ग को लगता है कि उसकी मनोकामना इसकी सलाह से पूरी हो सकती है। पौरुष वापस आने का मोहल्ले में शोर होता है और इनका भोर थाईलैंड में होता है, ‘बूम बूम’ करने के लिए। कहानी की यही आत्मा है। इसमें फिर परिवार के दूसरे सदस्यों के अपने बाप का ‘बाप’ बनने की कोशिश है। उसके रतिसुख की आकांक्षा को वर्जित ठहराने की कोशिश है। थाईलैंड पर्यटन विभाग जैसी दृश्यावलियां हैं। और, एक उजला पक्ष है इसकी विदेशी कलाकार जिसने रिया का रोल निभाया है।

थाई मसाज रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सिनेमा में कब होगा ओल्ड कनेक्ट?
हिंदी सिनेमा में बीते एक दशक से हल्ला है कि कहानी ऐसी बनाओ जिसमें ‘यूथ कनेक्ट’ हो और इस यूथ का कनेक्शन इसी दरम्यान हो चुका है विश्व सिनेमा से। अब उसे ‘मोनिका ओ माय डार्लिंग’ तो पसंद आती है लेकिन ‘पीएम नरेंद्र मोदी’, ‘सम्राट पृथ्वीराज’ और ‘रामसेतु’ जैसी फिल्मों के ट्रेलर तक ही वह रुक जाता है। सिनेमाघर ये यूथ जाता है ‘नो टाइम टू डाय’, ‘स्पाइडरमैन नो वे होम’ और ‘आरआरआर’ देखने। युवा दर्शकों को लेकर मची इस खींचतान के बीच हॉलीवुड ने उन दर्शकों पर अभी से डोरे डालने शुरू कर दिए हैं जो उम्रदराज हो चुके हैं या हो रहे हैं। ‘द फादर’ और ‘द सन’ जैसी फिल्में इसी सोच से निकली हैं। पर फिल्म ‘थाई मसाज’ की कोई सोच ही नहीं है। ये गजराज राव को मिली शोहरत को सेक्स का मुरब्बा बनाकर बेचने की कोशिश है। हो सकता है, गजराज राव को भी लगता है कि फिल्म ‘बधाई हो’ अपनी कहानी की वजह से नहीं उनकी वजह से चली है। और, कोई भी अभिनेता भला क्यों मना करेगा हीरो बनने से।
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थाई मसाज रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
लौट आओ, हिंदी सिनेमा के इम्तियाज़
इम्तियाज अली फिल्म ‘थाई मसाज’ के निर्माता है। उनसे भटकते हिंदी सिनेमा की अंगुली थामकर उसे सही राह पर लाने की उम्मीद रहती है लेकिन वह खुद ही नहीं समझ पा रहे कि उन्हें कार्तिक आर्यन और सारा अली खान की ‘लव आजकल’ से मिले सदमे के बाद जाना कहां हैं। इम्तियाज को मुंबई से बाहर निकलने की जरूरत है। इंदौर, मेरठ, नागपुर, वाराणसी और चंडीगढ़ जैसे शहरों में कुछ महीने बिताने की जरूरत है और अपने उन दर्शकों से संवाद करने की भी जिन्होंने उन्हें हिंदी सिनेमा का ‘इम्तियाज़’ (तमीज़) माना। उनके भाई साजिद अच्छे तकनीशियन हो सकते हैं, लेकिन इम्तियाज को कहानियां बाहर की भी सुननी चाहिए। मंगेश हडावले जैसे निर्देशक उनकी सोहबत में अगर शुरू में ही सही दिशा न पा सके तो दोष उन पर ही जाएगा। इंदौरी जुबान का परफेक्शन ही सिनेमा नहीं है। सिनेमा मनोरंजन का साधन है और इसमें प्रयोग उतने ही सफल हो सकते हैं जितनी मलेरिया के इलाज के लिए रसगुल्ले में रखी कुनैन की गोली।
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