करीब एक एक घंटे के चार और करीब पौने-पौने घंटे के चार और एपिसोड यानी कुल आठ एपिसोड की वेब सीरीज ‘हीरामंडी द डायमंड बाजार’ निर्माता-निर्देशक संजय लीला भंसाली का वह ख्वाब है जो उन्होंने 14 साल पहले मोईन बेग से इसका विचार पहली बार सुनने के बाद से ही बुनना शुरू किया और जो अब जाकर पूरा हुआ है। कोई चार साल से इसकी मेकिंग पर काम चल रहा है। उससे भी पहले से संजय इसका संगीत बुनते रहते हैं। ए एम तुराज के लिखे गीत और संजय लीला भंसाली का संगीत इस सीरीज की आत्मा है तो सुब्रत चक्रवर्ती व अमित रॉय के बनाए सेट्स इसका अवतार। सीरीज का संपादन भी खुद संजय लीला भंसाली ने किया है तो समझ सकते हैं कि इसमें कुछ भी ऐसा देखने को आपको नहीं मिलेगा, जिसकी इस पूरी कहानी में कोई जरूरत न हो। कहानी आजादी से ठीक कुछ साल पहले की है। लाहौर इसका रंगमंच है। तवायफें इसके सबसे अहम किरदार हैं। लखनऊ और बनारस इसकी क्षेपक कथाएं हैं।
हीरामंडी द डायमंड बाजार (वेब सीरीज)
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कहानी लाहौर के कोठों पर कब्जे की
खैर, बात शुरू करते हैं वेब सीरीज ‘हीरामंडी द डायमंड बाजार’ की। ये कहानी है मल्लिका जान की। मल्लिका जान लाहौर के इस कोठे पर कैसे आई? इसकी भी कहानी है कि ये यहां की सबसे कद्दावर तवायफ कैसे बनी? बेटियों उसके कहर के कांपती हैं। बड़ी बेटी बिब्बोजान लुके-छिपे क्रांतिकारियों का साथ दे रही है। दूसरी आलमजेब की बगावत अपनी शेरो शायरी को लेकर है। अपनी गजल के आखिरी शेर को ‘मतला’ न कहकर आखिरी शेर ही कहने वाले शायर नियाजी की महफिल तक जा पहुंची छोटी बेटी ही ‘हीरामंडी द डायमंड बाजार’ का भंसाली की तिजोरी से निकला असली हीरा है। इन दोनों बेटियों की अपनी अपनी प्रेम कहानी के अलावा एक इकतरफा प्रेम कहानी लज्जो की भी है। शराब पी-पीकर वह भी देवदास की तरह दीवानी हो चुकी है। सब कुछ मल्लिकाजान के हिसाब से चल ही रहा होता है कि उसके अतीत का साया करवट लेता है। उसका पुराना गुनाह नए तेवर में अपने पुराने रूप के साथ फरीदन बनकर लौट आता है। कोठों पर कब्जे की जंग में आजादी की जंग का तड़का है। नवाबों के सुरूर को फेंटता तवायफों का गुरूर है और है एक ऐसी पटकथा जो एक बार इसे देखना शुरू करने के बाद आखिर तक आपको रुकने नहीं देने देती है।
हीरामंडी द डायमंड बाजार (वेब सीरीज)
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कहानियों के भीतर भी कहानियां
बतौर निर्देशक और निर्माता संजय लीला भंसाली ने हिंदी सिनेमा को ‘हम दिल दे चुके सनम’, ‘ब्लैक’, ‘देवदास’ ‘गुजारिश’, ‘गोलियों की रासलीला रामलीला’, ‘बाजीराव मस्तानी’ और ‘पद्मावत’ जैसे नगीने दिए हैं। उनकी फिल्मों में कहानियों का रस कैमरे से होकर परदे पर टपकता है। उनकी पिछली फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ की कहानी मुंबई के वेश्याबाजार की कहानी थी, इस बार यही कहानी लाहौर पहुंची है। बस, यहां की तवायफें हर किसी की हमबिस्तर नहीं होतीं। वह किसी नवाब या किसी अंग्रेज अफसर को अपना ‘साहब’ बनाने की फेर में रहती हैं। मुजरों में लुटाई गई दौलत मल्लिकाजान पर निछावर करती हैं और अगर ऐसा नहीं किया तो कपड़े उतारकर उनकी जामातलाशी भी होती है। शक के ऐसे ही एक दायरे में में बार बार घूमकर पहुंचती रहती है कहानी ‘हीरामंडी’ की। तवायफों के बीच चलने वाली साजिशें, नवाबों के घरों तक जा पहुंची इन मोहब्बत की कहानियों और अंग्रेज अफसरों को मोहरा बनाकर इस्तेमाल करने की इनकी तरकीबों के बीच ‘सबका जासूस एक’ जैसा एक किरदार यहां उस्तादजी का भी है।
हीरामंडी द डायमंड बाजार (वेब सीरीज)
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फैमिली ट्री समझने के लिए दिमाग खुला रखें
वेब सीरीज ‘हीरामंडी द डायमंड बाजार’ की कहानी की रफ्तार तेज है। इसके साथ कदमताल करने के लिए आपको अपना दिमाग भी औसत से थोड़ा ज्यादा तेज चाहिए होगा। किसने किसको मारकर किस विरासत पर कब्जा किया? कौन किसकी बेटी और कौन किसकी खाला क्यों और कैसे है? ये समझने में थोडी दिमागी कसरत लगेगी। भारतीय घरों की महिलाएं तो ऐसी कसरतें सास-बहू के धारावाहिकों में खूब करती रही हैं, सो उनको इसकी आदत है। पुरुष दर्शकों को थोड़ा हो सकता है, शुरू में परेशानी पेश आए। लेकिन, ये पूरा ‘फैमिली ट्री’ एक बार समझ आ जाए तो फिर आगे का रास्ता आसान हो जाता है। कहानी ये पूरी की पूरी महिला प्रधान है। पुरुष किरदार यहां बस शतरंज के प्यादे हैं। शह और मात का खेल सीधे सीधे मल्लिका जान और फरीदन के बीच खेला जा रहा है। मोईन बेग की कहानी करिश्माई है। भंसाली ने विभु पुरी के साथ मिलकर इसकी पटकथा को रहस्यमयी बनाए रखा है। दिव्य निधि की भाषाई पकड़ उनकी दूसरी लिखावट की तरह यहां भी संवादों में साफ झलकती है। और, ए एम तुराज की मौसिकी का तो कहना ही क्या! सीरीज नेटफ्लिक्स पर प्रसारित हो रही है तो समलैंगिक रिश्तों की क्षेपक कथाएं भी हैं। अंग्रेज अफसर से रहम की गुहार लगाते उस्तादजी फरीदन की आंखों में भी रहते हैं। और, फरीदन को नवाबों के अलावा आसपास की औरतें भी खूब भाती हैं।
हीरामंडी द डायमंड बाजार (वेब सीरीज)
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हर मुस्लिम सोशल ड्रामा की थोड़ी थोड़ी झलक
कलम से मजबूत वेब सीरीज ‘हीरामंडी द डायमंड बाजार’ कैमरे से और भी मजबूत है। टॉप एंगल से धरातल के समानांतर रखे कैमरे के फिर 90 अंश का कोण बनाते हुए एक जैसे शॉट्स के दोहराव को छोड़ दें तो सुदीप चटर्जी और महेश लिमये ने कमाल काम इस सीरीज में किया है। रात के दृश्यों में सेट्स की लाइटिंग आपको ‘मुगले ए आजम’ की याद दिलाती है। और, दिन के समय अपने अपने बरामदों में थिरकती तवायफें ‘पाकीजा’ की। इन दोनों फिल्मों को देखने वालों को बहुत कुछ वैसे ही दृश्य इस सीरीज में भी दिखेंगे। ‘मेरे हुजूर’ जैसा मोहब्बत का इसरार है। ‘तवायफ’ जैसा इन्कार है और फरीदन की सजाई महफिल की ‘तिलिस्मी बाहें’ आपको हेलन और शशिकला की याद भी दिला सकती हैं। हिंदी सिनेमा के तमाम संदर्भ बिंदुओं के बीच ‘नूरजहां’ का अक्स भी पूरी सीरीज में यहां वहां बिखरा दिखाई जरूर देगा। रात के समय का प्रकाश और छाया संजोयन अगर गौर करने लायक है तो दिन के समय ये सेट पहली बार खिल उठता है, अमीर खुसरो की मौसिकी पर पीले कपड़े पहन वसंत का स्वागत करती तवायफों के सामूहिक नृत्य में।
हीरामंडी द डायमंड बाजार (वेब सीरीज)
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परफेक्शन से आगे निकल गए संजय लीला भंसाली
निर्देशक संजय लीला भंसाली के सामने इस सीरीज में चुनौती ये रही है कि वह ऐसा क्या अपने प्रशंसकों को दिखाएं जो उनकी फिल्मों में वे पहले देख नहीं चुके हैं। उनकी कहानियों में बनावटीपन का पहला एहसास दर्शकों को फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ में नजर आया। इस फिल्म का पूरा एहसास बहुत कृत्रिम महसूस होता है, वैसी ही कुछ ‘फीलिंग’ वेब सीरीज ‘हीरामंडी द डायमंड बाजार’ देखते समय भी महसूस होती रहती है। सारे किरदार इतना ज्यादा सजे धजे रहते हैं कि लगता ही नहीं हम आजादी से पहले की कोई कहानी देख रहे हैं। बागी भी पूरे मेकअप में हैं और कहीं कोई ‘सीन’ गरीब न दिखें तो हर फ्रेम का ‘कोना कोना कोटक’ करने में संजय की टीम ने पूरी मेहनत की है। तकनीकी तौर पर ये सीरीज जरूरत से ज्यादा समृद्ध है। और, इतना ज्यादा ‘परफेक्शन’ सिनेमा को नाटक बनाने में देर नहीं लगाता। उनके रचे गाने कमाल हैं। कॉस्ट्यूम सेलेक्शन में उनकी मेहनत साफ दिखती है। सेट्स को सजाने में भी उन्होंने जो कीमियागिरी की है, वह भी आंखों में अटकती है।
हीरामंडी द डायमंड बाजार (वेब सीरीज)
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अदिति राव हैदरी फिर चैंपियन
कलाकारों की यहां पूरी एक बरात है। इस बरात की अगुआई करने वाली सभी छह अभिनेत्रियों ने अपने अपने किरदार दमदार तरीके से निभाए हैं, लेकिन इन सबमें चैंपियन बनकर निकली हैं अभिनेत्री अदिति राव हैदरी। ‘पद्मावत’ की मेहरुन्निसा को ‘हीरामंडी’ की बिब्बोजान बनते देखना रुचिकर है। बिब्बो एक तरह से ‘1942 ए लव स्टोरी’ की उस रज्जो का विस्तार है जिसे खुद संजय लीला भंसाली ने विधु विनोद चोपड़ा के लिए लिखा था। मनीषा कोइराला ने मल्लिकाजान को एक अलग ही आभामंडल के साथ जीया है। ईद पर अपनी बेटी से मिलने उसके प्रेमी के घर जा पहुंचने वाले दृश्य में उनका आना हो या फिर अपनी बड़ी बेटी के लिए आखिरी मुजरे का एलान, हर बार वह अपने रुआब को अपना आतंक बनाकर जीने में कामयाब रही हैं। लज्जो बनी ऋचा चड्ढा का किरदार हालांकि इन सबमें सबसे छोटा है लेकिन दो एपिसोड में ही वह अपना असर छोड़ जाती हैं। संजीदा शेख की आंखों में उनके सीने में लगातार सुलगती रहने वाली आग आंसू बनकर बार बार बहती दिखती है। सोनाक्षी सिन्हा को इस सीरीज में एक तरह से देखा जाए तो खलनायिका के तौर पर पेश किया गया है और अपना किरदार उन्होंने निभाया भी अच्छे से है।
हीरामंडी द डायमंड बाजार (वेब सीरीज)
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ताहा शाह और शर्मिन की असरदार प्रेम कहानी
पुरुष किरदारों में ताहा शाह वेब सीरीज ‘हीरामंडी द डायमंड बाजार’ के हीरो हैं। ताजदार और आलमजेब की प्रेम कहानी कुछ कुछ सलीम और अनारकली जैसी प्रेम कहानी है। दोनों मिलते भी अनारकली की दरगाह पर ही हैं। कैमरे के पीछे शर्मिन ने अपने मामा संजय लीला भंसाली से जो कुछ भी सीखा है, उसे वह अपनी पहली फिल्म ‘मलाल’ में भले परदे पर पेश करने से चूक गई हों, लेकिन यहां वह सीधे अपने मामा की निगाहों के सामने फूल की तरह खिली हैं। हिंदी सिनेमा में रेखा को पहली बार लाने वाले निर्माता मोहन सहगल की पोती शर्मिन ने सिनेमा घुट्टी में पिया है और बतौर अभिनेत्री मिला ये उनका सबसे बड़ा मौका है। फिल्म एडीटर बेला सहगल और अप्लॉज एंटरटेनमेंट के कर्ताधर्ता दीपक सहगल की बेटी की ये पहली अंगड़ाई है। आगे आगे क्या होता है, देखना दिलचस्प रहेगा। आलमजेब जैसा किरदार करना किसी कसौटी से कम नहीं है और अच्छा लगा देखकर कि इस कसौटी पर शर्मिन इस बार खरी उतरी हैं।
हीरामंडी द डायमंड बाजार (वेब सीरीज)
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याद रह जाएंगे उस्तादजी बने इंद्रेश मलिक
वेब सीरीज ‘हीरामंडी द डायमंड बाजार’ में शेखर सुमन और अध्ययन सुमन के लिए करने को कुछ खास नहीं है। बल्कि, शेखर सुमन जब पहली बार सीरीज में दिखते हैं और जो हरकतें करते दिखते हैं, उसे देखकर सोचना ये पड़ जाता है कि आखिर खुद पर हंसी उड़ाने वाला ऐसा किरदार करने की उन्हें जरूरत ही क्या रही होगी। अध्ययन ने अपना किरदार जोरावर बहुत सलीके से निभाया है। जुल्फिकार की जवानी के किरदार में भी अध्ययन को ही लेने की क्या वजह रही होगी, ये तो पता नहीं लेकिन ये दोहराव दर्शकों को भ्रमित करने वाला ही है। उस्ताद का किरदार दर्शकों को बरसोंबरस याद रह जाएगा। इसे निभाने वाले कलाकार इंद्रेश मलिक की अदाकारी देखने लायक है। किसी ट्रांसजेंडर का कहानी और किरदारों को यूं छेड़ता किरदार हिंदी सिनेमा में पहले कम ही नजर आया। अंग्रेज अफसर बने जैसन शाह ने भी अपना असर छोड़ा है, बिल्कुल इस सीरीज के धीरे धीरे चढ़ते असर की तरह।