फिल्म का एक संवाद याद दिलाता है कि आंखों पर पट्टी बांधे हुए न्याय की देवी के हाथों में केवल तराजू नहीं तलवार भी है। फिल्म एक माता-पिता द्वारा अपनी पुत्री श्रुति और नौकर खेमपाल की हत्या का केस सीबीआई को सौंपे जाने के साथ शुरू होती है।
अफसर अश्विनी कुमार इस मामले को तथ्यों की नई रोशनी में देखता है और एक-एक करके हत्याकांड के संदिग्ध नए चेहरे उभरने लगते हैं। फिल्म में एक जांच अधिकारी अपने साथियों से कहता है कि उन्हें काम करते हुए भावनाओं में नहीं बहना चाहिए और तटस्थ होकर कर्म करना चाहिए।
लेकिन निर्देशक मेघना गुलजार और निर्माता विशाल भारद्वाज का झुकाव राजेश-नूपुर तलवार दंपति के पक्ष में साफ दिखता है। फिल्म उन संजीदा दर्शकों के लिए है, जिनकी दिलचस्पी यह जानने में है कि आखिर हमारी पुलिस तथा जांच एजेंसियां कैसे काम करती हैं।
अगर आपकी दिलचस्पी इस कहानी में है, तो आगे की स्लाइड में जानिए, देश के प्रतिष्ठित समीक्षकों की कसौटी पर फिल्म कितनी खरी उतरी। किस समीक्षक ने फिल्म को लेकर क्या राय रखी। किस समीक्षक ने फिल्म को कितने स्टार दिए।