अजब लेखन, गजब निर्देशन
किसी भी पत्रकार के लिए जीवन में संयोग कम ही बनते हैं। और, ऐसे मौकों पर एक फील्ड रिपोर्टर पर उसके संपादक का विश्वास ही उसकी सबसे बड़ी थाती होती है। फिल्म ‘शी सेड’ में ऐसे कई दृश्य हैं जो पत्रकारिता की आदर्श परिस्थितियों को स्थापित करते हैं। लीड खबर को फाइनल करते समय रिपोर्टरों के साथ मौजूद समाचार संपादक से लेकर कार्यकारी संपादक व प्रबंध संपादक और अपने रिपोर्टर का हर कदम पर साथ देने वाले सीनियर इस फिल्म के वे रूपक है जिन्हें हर अखबार के शीर्षस्थ प्रबंधन को जरूर देखना चाहिए। फिल्म क्या है, किस विषय पर है, उस मामले में क्या हुआ? ये सब जानते हुए भी ऐसी किसी फिल्म को देखना भी कम चुनौती भरा नहीं होता है। लेकिन तारीफ करनी चाहिए फिल्म ‘शी सेड’ की लेखक रेबेका लेंकेविक्ज और निर्देशक मारिया शार्डर की जो इसे उस कालखंड से शुरू करती हैं जब हार्वी वाइंस्टीन की अनैतिक गतिविधियों का शिकार हुई महिला का सिनेमा के प्रति पहला आकर्षण होता है और उसे समुद्र तट पर शूटिंग कर रही टीम में इंटर्न की नौकरी मिल जाती है। 1992 से शुरू होने वाली कहानी अब वहां तक आ चुकी है जब कैलिफोर्निया में हार्वी वाइंस्टीन के खिलाफ शुरू हुए नए मामले के जज ने अपने जूरी मेंबर को फिल्म ‘शी सेड’ का ट्रेलर न देखने की सलाह दी है। यही इस फिल्म की सबसे बड़ी जीत है।
इसे भी पढ़ें- Throwback Thursday: इस अभिनेता के पिता ने पत्नी-बेटी को गोली मारकर कर ली थी आत्महत्या, जानें कैसे बचे कमल
मानवीय अनुभूतियों की सहज संवेदनाएं
फिल्म ‘शी सेड’ खोजी पत्रकारिता की एक कहानी को मानवीय अनुभूतियों के साथ सहज संवेदनाओं के साथ प्रस्तुत करती है। दोनों महिला पत्रकारों का खबरों पर जुटे रहने के बीच अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को सुलझाते दिखना उनके संघर्ष को बेहतर सम्मान देता है। पूरी फिल्म में जब भी ये दोनों पत्रकार परदे पर दिखते हैं तो कैमरा उनके आसपास के माहौल को लिखता चलता है। ये दिखाता है कि पत्रकार कोई सेलिब्रिटी नहीं है। वह तभी तक सफल है जब तक वह भीड़ का हिस्सा बना रहता है। यहां वहां दौड़ता भागता है। और सामान्य परिस्थितियों में भी असामान्य परिदृश्यों पर नजर बनाए रखता है। फिल्म शुरू वहां से होती है जब 2016 में टूए उन महिलाओं पर खबर कर रही हैं जिन्होंने डोनाल्ड ट्रम्प के व्यवहार के बारे में बात की और कैंटॉर सीरियाई शरणार्थियों पर काम कर रही हैं। अभिनेत्री रोस मैकगोवन के एक ट्वीट से कैंटॉर को लीड मिलती है और उनकी संपादक रेबेका कॉर्बेट इन दोनों को इस पर काम करने को प्रोत्साहित करती है।
मुलिगन और कजान की दमदार अदाकारी
टूए के किरदार में केरी मुलिगन और कैंटॉर के किरदार में जोए कजान ने फिल्म में कुछ इस तरह काम किया है कि लगता ही नहीं वे अभिनय कर रही हैं। लोगों के घरों तक अप्रत्याशित रूप से पहुंच जाना, वाइंस्टीन की शिकार हुई महिलाओं को लगातार संदेश भेजते रहना, एक एक तथ्य की जांच परख के लिए बेहद कठिन चुनौतियों का सामना करना और पीड़ित महिलाओं को ये समझाना कि हम और आप मिलकर अतीत को भले न सुधार सकते हों, लेकिन भविष्य में दूसरों के साथ ऐसी पुनरावृत्ति न हो, इसका जमीन तैयार करना कितना जरूरी है। कार्यकारी संपादक के रूप में एंड्रे ब्रॉगर का आभामंडल दर्शनीय है। वाइनस्टीन का दबाव पड़ने के बाद भी अपना लहजा सख्त रखने और अपने रिपोर्टरों को ही बातचीत में आगे रखने की कार्यशैली दूसरे संपादकों के लिए किसी सबक से कम नहीं है।
असलियत के करीब रहने की नायाब कोशिश
फिल्म ‘शी सेड’ एक अद्भुत टीम वर्क से बनी फिल्म है। रेबेका लेंकेविक्ज की पटकथा और मारिया शार्डर का निर्देशन इसे ऑस्कर की तमाम श्रेणियों में नामित होने का मजबूत दावेदार बनाते हैं। रेबेका ने फिल्म को कुछ यूं बुना है कि शुरुआती दृश्यों के बाद ही दर्शक कहानी के साथ हो लेते है। यौन शोषण के पुराने मामलों को परदे पर फिल्माने का तरीका भी काफी संवेदनशील रखा गया है। हार्वी वाइंस्टीन के कमरे में पीड़ित युवती के अंतर्वस्त्रों से फिसलता कैमरा जब शॉवर रूम तक जाता है तो समझ आता है कि मारिया का निर्देशन कितना सजग है और बिना उन दृश्यों को फिर से पुनर्रचित किए भी वह पूरी बात दर्शकों को समझाने में सफल रहती हैं। फिल्म का संपादन बेहतरीन है। पूरी फिल्म में हार्वी का चेहरा नहीं दिखाया जाता। हार्वी का किरदार कर रहे माइक ह्यूस्टन का भी सिर्फ सिर दिखता है और वह भी पीछे से। हार्वी की रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल भी फिल्म में किया गया है।
अपने कालखंड की बेहतरीन फिल्म
दो घंटे आठ मिनट की फिल्म ‘शी सेड’ को अमेरिकी सेंसर बोर्ड से आर रेटिंग मिली है। फिल्म की कथा वस्तु और भाषा के हिसाब से भारत में भी फिल्म ए सर्टिफिकेट के साथ ही रिलीज होने की संभावना दिखती है। पत्रकारिता और फिल्मों से जुड़े हर शख्स के लिए ये फिल्म किसी सबक जैसी है। और, इसे दर्शनीय बनाने में इसके कलाकारों, निर्देशक, लेखक के अलावा इसकी बाकी तकनीकी टीम का भी खास योगदान है। खासतौर से फिल्म की सिनेमैटोग्राफर नताशा ब्रैरियर ने फिल्म की भावनाओं, संवेदनाओं और अनुभूतियों को बहुत ही खूबसूरती से कैमरे में कैद किया है। निकलस ब्रिटेल का संगीत भी फिल्म की कथा के प्रभाव को बढ़ाने में सफल रहा है। फिल्म का न्यूयॉर्क फिल्म फेस्टिवल में पिछले महीने ही प्रीमियर हुआ और आने वाले दिनों में इसे मिलने वाले पुरस्कारों की गिनती अभी से शुरू हो चुकी है।