फिल्म 'रोष' की कहानी रहस्य, रोमांच, झूठ और विश्वासघात पर आधारित है। फिल्म की कहानी रजत खन्ना, रोनिका, अलीना और गणेश के इर्द गिर्द घूमती है। रजत, रोनिका और अलीना बहुत अच्छे दोस्त है। एक पार्टी से लौटते वक्त तीनों एक हादसे का शिकार हो जाते हैं। रहस्य तब और गहरा हो जाता है जब डिलिवरी बॉय गणेश की एंट्री होती है। डिलीवरी बॉय गणेश कौन है, जो रोनिका के जन्मदिन का केक डिलीवरी करने के बहाने उसके घर में घुस जाता है? कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ती है, रहस्य और गहराता जाता है। ऑनलाइन ठगी का शिकार हुए लोगों का इस घटनाक्रम से क्या संबंध है, इस चीज को बहुत ही नाटकीय ढंग से फिल्म में दिखाया गया है।
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फिल्म शूटिंग ज्यादातर एक ही बंगले में हुई है। फिल्म 'रोष' के लेखक, निर्देशक जयवीर पंघाल ने इस बात का पूरी तरह से ख्याल रखा है कि फिल्म कहीं बोझिल ना लगे। फिल्म के हर दृश्य के बाद थ्रिलर और सस्पेंस दर्शको को अंत तक बांधे रखता है, फिल्म के शुरुआत में जो किरदार निगेटिव लगते हैं, बाद में उसी किरदार के साथ सहानुभूति हो जाती है। रोल रिवर्सल का ये प्रयोग काफी प्रभावशाली बन पड़ा है। पैसे के अभाव में इलाज न हो जाने की वजह से पत्नी की मौत से व्यथित ये एक पति की कहानी है। कहानी में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सिर्फ अपने फायदे के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
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जोश में होश खोने का डर रहता है, लेकिन रोष में होश नही होता है। इस एक लाइन के वाक्य में फिल्म 'रोष' का सार समझा जा सकता है। एक पत्नी अपने होने वाले बच्चे की डिलीवरी के दौरान होने वाले खर्च को ध्यान में रखकर अपने गहने बेचकर पैसे बैंक में डिपॉजिट करा देती है। थोड़ी सी लापरवाही की वजह से ये रकम अकाउंट से गायब हो जाती है और बिना पैसे के पत्नी का सही इलाज नहीं हो पाता और उसकी मृत्यु हो जाती है। इस सदमे को उसका पति बर्दाश्त नहीं कर पाता है और रोष में आकर अपना होश खो देता है। किस तरह से वह ऐसे पैसे को निकलवाने वाले ठगों के गिरोह तक पहुंच कर सबके पैसे वापस करवाता है, फिल्म का ये एक दिलचस्प पहलू है।
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अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती के बेटे मिमोह चक्रवर्ती ने फिल्म फिल्म 'रोष' में रजत खन्ना की भूमिका निभाई है। उनका किरदार ग्रे है। यह एक ऐसा किरदार है जिसके साथ एक अभिनेता को अपनी प्रतिभा को दिखाने का भरपूर मौका मिलता है। अभिनय की भाव भांगिकाओ को समझना अब भी मिमोह के लिए बहुत जरूरी है। गणेश की भूमिका में यश राज ने न सिर्फ अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय करने की कोशिश की है बल्कि उनके अभिनय में विविधता देखने को मिली है। यह अगल बात है कि वह कई दृश्यों में वह शाहरुख खान की नकल करते पकड़े जाते हैं। निकिता सोनी और अलीना राय की कोशिशें अच्छी हैं पर अभी पनघट की डगर इनके लिए आसान नहीं है। फिल्म के बाकी कलाकारों का अभिनय सामान्य रहा।
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फिल्म के निर्देशक जयवीर पंघाल ने ही फिल्म की कहानी, पटकथा, संवाद और गीत भी लिखे हैं। बतौर निर्देशक उन्होंने एक अच्छी फिल्म बनाने की कोशिश की है। लेकिन, संवादों की पुनरावृति फिल्म में खटकती है। एक अच्छी कहानी पर दमदार सस्पेंस थ्रिलर बनाने के लिए उन्हें पटकथा और चुस्त रखनी चाहिए थी। फिल्म के सिनेमैटोग्राफर अभय आनंद की समझदारी इस फिल्म में दिखती है। फिल्म के ज्यादातर दृश्य रात के हैं और उन्होंने इस बात का पूरा ख्याल रखा कि फिल्म के रात वाले दृश्यों में माहौल सही जमे। आलोक सिंह का संपादन ठीक है। बस उन्हें इस बात का ध्यान रखना चाहिए था कि संवादों की पुनरावृत्ति को संपादन में संभाला जा सकता था। संगीतकार मोंटी शर्मा ने अच्छा संगीत तैयार किया है। गाने सुनने के बाद एक अलग तरह के आनंद की अनुभूति होती है। नए गायक प्रवण सिंघल में काफी उम्मीदें दिखती हैं। उन्हें स्थापित संगीतकारों के साथ की जरूरत है और अगर ऐसा हुआ तो वह आने वाले समय में एक बेहतरीन पार्श्वगायक के तौर पर हिंदी सिनेमा में अपनी जगह बना सकते हैं।