किंवदंतियों से निकली कहानी
फिल्म ‘राम सेतु’ भारतीय सिनेमा की उस नई पीढ़ी का एक और नया परिचय देती फिल्म है जिसे अपनी लोक कथाओं में ‘कांतारा’ जैसी रुचि है। हिंदी सिनेमा में ये काम निर्देशक अयान मुखर्जी ने शुरू किया और उनको भी ‘डा विंची कोड’ जितनी तो नहीं लेकिन उसी के आसपास के घृणा अभियान का सोशल मीडिया पर सामना करना पड़ा। अभिषेक शर्मा इस मामले में थोड़ी बेहतर स्थिति में हैं। उनको कदम कदम पर मार्गदर्शन देने के लिए भारतीय पुराणों पर अरसे से शोध करते रहे निर्माता, निर्देशक चंद्र प्रकाश द्विवेदी साथ रहे हैं। हालांकि, उनकी अपनी पिछली फिल्म ‘सम्राट पृथ्वीराज’ में अक्षय कुमार दर्शकों को एक राजपूत राजा के रूप में प्रभावित करने से चूक गए थे। अक्षय कुमार अपने करियर में उस मोड़ पर हैं, जहां से आगे जाकर वह मिथुन चक्रवर्ती की उत्तरार्ध की सिनेयात्रा दोहरा सकते हैं या अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘मोहब्बतें’ से सबक लेकर अपना करिश्मा अभी दो तीन दशक तक और जारी रख सकते हैं। फिल्म ‘राम सेतु’ में उनके प्रशंसक इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करते दिखते हैं।
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ट्रेलर से ज्यादा फिल्म में कुछ नहीं
अक्षय कुमार की हाल की फिल्मों के साथ सबसे बड़ी कमजोरियां रही है, उनकी फिल्मों के ट्रेलर। सिनेमाघरों में रिलीज हुई पिछली फिल्मों के अलावा इस दरम्यान अक्षय की ओटीटी पर रिलीज फिल्में ‘लक्ष्मी’, ‘अतरंगी रे’ और ‘कठपुतली’ के ट्रेलर भी जिन लोगों ने देखे हैं, उनके लिए इन्हें देखने के बाद फिल्म में इससे बेहतर कुछ नजर नहीं आता। ट्रेलर में ही फिल्म की पूरी कहानी खोल देने से भी अक्षय कुमार की फिल्मों में आम दर्शकों की दिलचस्पी लगातार कम होती जा रही है। दिवाली के अगले दिन देश भर के कोई तीन हजार स्क्रीन्स पर रिलीज हो रही फिल्म ‘राम सेतु’ सौ करोड़ रुपये के बजट में बनी शानदार फिल्म हो सकती थी लेकिन फिल्म देखते समय बार बार इसका दो सौ करोड़ से भी ज्यादा का बजट याद आता रहता है और ये भी याद आता रहता है कि इसमें से आधे से भी ज्यादा हिस्सा अक्षय कुमार के पास जाने वाला है। फिल्म ‘राम सेतु’ की कहानी अदालत में सवालिया घेरे में आए हिंदू आस्था के प्रतीक रहे उस पुल को खोजने की कहानी है जिसके अस्तित्व पर पिछली सरकारों के नुमाइंदों ने ही सवाल खड़े कर दिए थे।
सिनेमाई नजरिये की प्रयोगधर्मी फिल्म
सियासी अभियानों को परे रखते हुए फिल्म ‘राम सेतु’ को देखना रुचिकर है। एक पुरातत्व विशेषज्ञ उस राम सेतु को खोजने निकला है जिसका जिक्र भगवान श्री राम की सारी कथाओं में मिलता है। अपनी धर्मपत्नी सीता को खोजने निकले राम ने अपने सहायकों के साथ मिलकर देश के दक्षिणी सिरे रामेश्वरम से लेकर पड़ोस के देश श्रीलंका तक समुद्र में पुल बना दिया था और ये पुल ऐसे पत्थरों से बना, जो पानी में डूबते नहीं थे। फिल्म इस राम सेतु के अस्तित्व को स्थापित करती है और ये भी स्थापित करती है कि मान्यताओं में चली आ रही कहानियां सिर्फ कल्पनाएं नहीं हैं। सफेद दाढ़ी, लंबे बालों वाले अक्षय कुमार को देखकर लगने भी लगता है कि ये बंदा वाकई पढ़ा लिखा है। इतिहास का जानकार है और अनीश्वरवादी होने के बावजूद उसकी अपने कर्म में श्रद्धा है और कर्म से बड़ी पूजा तो खैर दुनिया में दूसरी है ही नहीं। फिल्म का शुरू का आधा घंटा आपको बार बार फिल्म ‘नेशनल ट्रीजर’ की भी याद दिला सकता है। इस मामले में दूसरा जो कलाकार फिल्म मे प्रभावित करता है वह हैं सत्यदेव। बाकी कलाकारों में नासिर को करने को कुछ नया मिला नहीं। जैकलीन की फिल्मी कहानी, अदाकारी की कहानी कभी रही ही नहीं। पूरी कहानी में बार बार लंका जपने के बावजूद वह श्रीलंका की होकर भी जैकलीन वहां का किरदार नहीं निभा रही हैं। नुसरत ने शायद ये फिल्म बस अक्षय के नाम पर कर ली है।
फुलटू मनोरंजन से चूकी फिल्म
निर्देशक अभिषेक शर्मा ने पूरी फिल्म सिर्फ और सिर्फ अक्षय कुमार के आभामंडल की चमक में रोशन करने की कोशिश की है। अपने हीरो पर जरूरत से ज्यादा बोझ डाल देने की उनके लेखन की ये गड़बड़ी लगातार चली आ रही है। किसी कहानी को विकसित करने में छोटे छोटे किरदारों की कितनी बड़ी भूमिका होती है, ये बात हिंदी सिनेमा के नए निर्देशक लगातार भूलते जा रहे हैं। सिर्फ फिल्म के हीरो पर पूरी फिल्म टिका देना उस हीरो के साथ भी ज्यादती ही है। कलाकार उनकी काबिलियत पर भरोसा करते हैं और ये भरोसा कायम रखने के लिए अभिषेक को अपनी फिल्मों के साथ लेखन टीम में कुछ ऐसे लोगों को भी शामिल करना चाहिए जिनके साथ वह बहस कर सकें, लड़ सकें और फिर आपसी समझ का एक नया पुल विकसित कर सकें। तकनीकी टीम औसत है। डैनियल बी जॉर्ज ने फिल्म के मूड के हिसाब से साउंड डिजाइन करने की कोशिश तो की है पर धरती, जल और आकाश के दृश्यों में उनके सुरों का बहव उसी हिसाब से नहीं है। रामेश्वर भगत का संपादन सुस्त है। हां, असीम की सिनेमैटोग्राफी ने फिल्म को रहस्य और रोमांच से लबरेज रखने में काफी मदद की है। वीएफएक्स की बात रहने देते हैं, वैसे ही फिल्म बहुत भारी है। त्योहार के मौकों वाली मस्ती और मटरगश्ती इसमें नहीं है। बॉक्स ऑफिस पर फिल्म का पहला वीकएंड छह दिनों का रहने वाला है और इतवार तक इस फिल्म का मजबूती से टिके रहना ही इसकी तकदीर तय करेगा।