फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Film Review: बुलंदी के नारों के बीच देखिए 'यूनियन लीडर' की लाचारी

Sat, 20 Jan 2018 05:04 PM IST
रवि बुले
विज्ञापन
union leader
विज्ञापन
निर्माता-निर्देशकः संजय पटेल
विज्ञापन

सितारेः राहुल भट्ट, तिलोत्तमा शोम, जयेश मोरे
रेटिंगः **

'यूनियन लीडर' मजदूर एकता जिंदाबाद जैसा नारा नहीं लगाती, लेकिन जान के खतरे वाले उद्योगों में श्रमिकों की स्थिति और लापरवाह-स्वार्थी-धनलोलुप फैक्ट्री मालिकों की तस्वीर सामने लाती है। लंबे समय से सिनेमा की नजर इधर नहीं गई थी। इस इंडो-कनाडाई प्रोजेक्ट में कुछ बातों को संवेदना से छुआ गया है। श्रमिकों के अधिकारों की बात की गई है। निर्देशक संजय पटेल की यह पहली फिल्म कई अंतरराष्ट्रीय समारोहों में सराही गई।

'यूनियन लीडर' में अहमदाबाद की एक केमिकल फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूर क्रोमियम सल्फेट के प्रभाव में अपने फेफड़े गंवा रहे हैं। पांच मजदूर कैंसर के शिकार होकर मौत के मुंह में जा चुके हैं, लेकिन फैक्ट्री मालिक को परवाह नहीं। श्रमिक नेता को मालिक ने अपनी तरफ मिला रखा है। हकीकत समझ आने पर मजदूर नई यूनियन बनाते हैं, जिसकी बागडोर जय (राहुल भट्ट) को दी जाती है। मजदूरों की आवाज बुलंद होते ही मालिक फैक्ट्री बंद करने का फैसला करता है। अब मजदूरों का क्या होगा, क्योंकि जो मिल रहा था, वे उससे भी हाथ धो बैठे हैं!
विज्ञापन
विज्ञापन

निर्देशक ने फिल्म के अंत को बेहद सहज करते हुए पुलिस तंत्र और न्याय व्यवस्था की जटिलताएं एक पल में गुल कर दीं। संजय पटेल कहानी पर और काम करते, तो बेहतर होता। राहुल भट्ट श्रमिक लीडर के रूप में ढलने की कोशिश करते हैं लेकिन उनके सिक्स पैक और डोले-शोले खूब उभरते हैं। तिलोत्तमा शोम जय की पत्नी के रूप में भूमिका से न्याय करती हैं।

फिल्म उस भारत की तस्वीर दिखाती है, जहां कतार का आखिरी बाशिंदा बुलंदी के तमाम नारों के बीच वाकई लाचार है। उसके परिवार के लिए सुरक्षा नहीं है। उसके हक की आवाज की सुनवाई नहीं है। हां, उसके पास अगली पीढ़ी के लिए सपने जरूर हैं, लेकिन वे भी आखिर कितनी कठिनाइयों को सहते हुए कब तक जिंदा रह पाएंगे?
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें