निर्माता-निर्देशकः कुशल श्रीवास्तव
सितारेः के के मेनन, मंदिरा बेदी, राइमा सेन, शारिब हाशमी
रेटिंगः ***
निर्देशक की ड्रामे पर पकड़ है और बीच-बीच में गुजरी बातों को वह सिर के बल खड़ा करके दर्शकों को चौंका देते हैं। फिल्म का कैमरा वर्क अच्छा है।
अच्छी किताबें और अच्छे लोग तुरंत समझ नहीं आते, उन्हें पढ़ना पड़ता है! अच्छी फिल्में भी देखे जाने की मांग करती हैं। सिर्फ ट्रेलर से उन्हें नहीं समझा जा सकता। 'वोदका डायरीज' निर्देशक कुशल श्रीवास्तव की पहली फिल्म है और उन्होंने रोचक विषय चुना है, जो शुरू से अंत तक थ्रिल में बांधे रखता है! 'वोदका डायरीज', मनाली में एक क्लब है। यहां एक के बाद एक मर्डर हो रहे हैं और एसीपी अश्विनी दीक्षित (के के मेनन) हैरान हैं कि माजरा क्या है?
खते-देखते चार लाशें मिलती हैं। एसीपी की हैरानी तब और बढ़ जाती है, जब मारे गए लोगों के बीच मुर्दाघर में उसे अपना शव भी नजर आता है! 'वोदका डायरीज' अश्विनी दीक्षित की पर्सनल कहानी है, जो अंत में चौंकाती है। रहस्यवाली कहानियों में के के मेनन बढ़िया लगते हैं और इस बार भी अपने अभिनय से उन्होंने कोई कसर बाकी नहीं रखी।
कुशल श्रीवास्तव ने उन्हें यहां एसीपी का किरदार देते हुए भी पुलिसिया हाव-भाव और संवेदनाओं से इतर रखा और यही बात कहानी को अलग बनाए रखती है। के के मेनन के अलावा अन्य किरदार भी हैं, लेकिन मंदिरा बेदी को छोड़ कर कोई उभर नहीं पाता। शारिब हाशमी जरूर एसीपी के सहायक के रोल में जमे और असरकारी हैं।
फिल्म बर्फीले मौसम में फिल्माई गई है और प्राकृतिक सौंदर्य पर्दे पर उभर कर आता है। इस लिहाज से फिल्म शुरू से अंत तक आम बॉलीवुड फिल्मों से अलग नजर आती है। जो दर्शक रहस्य-रोमांच की बहुत किताबें पढ़ चुके हैं और ऐसा सिनेमा देखना भी पसंद करते हैं। उन्हें 'वोदका डायरीज' दिलचस्प लगेगी कि आखिर एसीपी दीक्षित किसकी तलाश में हैं और कोई क्यों उन्हें छका रहा है?
निर्देशक की ड्रामे पर पकड़ है और बीच-बीच में गुजरी बातों को वह सिर के बल खड़ा करके एसीपी दीक्षित के साथ दर्शकों को भी चौंका देते हैं। फिल्म का संपादन और कैमरा वर्क अच्छा है। 'वोदका डायरीज' को आप 'रहस्य' और 'तलवार' जैसी फिल्मों की कतार में रख सकते हैं, जहां धीरे-धीरे गुत्थियां सुलझती हैं। आप उनके सुलझने में उलझे रहते हैं और वक्त के बीतने का पता ही नहीं चलता।