वेब सीरीज 'पंचायत' रिव्यू
- फोटो : एक्स (ट्विटर)
जो पंचायत का कोर जानते हैं वो समझते हैं कि इस सीरीज की दो बातें सबसे खास हैं। एक इसका देसीपन और दूसरा जो इसमें मजाकिया सिचुएशन पैदा होते हैं उनसे डील करने का सरपंच और उनके साथियों का तरीका। इस बार भी आप इसी उम्मीद के साथ सीरीज देखना शुरू करते हैं कि आपको यही देखने को मिलेगा। कुछ एपिसोड तक तो यह सही चलता है पर अचानक पांचवे-छठे एपिसोड के बाद यह पता नहीं क्यों डिस्कनेक्ट होने लगता है।
वेब सीरीज पंचायत सीजन 4 रिव्यू
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बहरहाल, शुरुआत एपिसोड में कई सीन मजेदार बन पड़े हैं। फिर चाहे वो सचिव जी का शराब पीकर भूषण से माफी मांगने जाना हो या मंजू देवी का अपने पति के टूटे हाथ पर ताना मारना हो कि- ‘अब क्या तोप का गोला लगेगा तब मानिएगा कि चोट लगा है..’।
बनराकस के साथ भोजपुरी गाने पर विधायक जी का डांस हो, विनोद को पार्टी में तोड़ने की कोशिश हो या फिर प्रधान जी के घर पर रेड पड़ने के बाद फनी सिचुएशन क्रिएट होना।
शुरू के तीन-चार एपिसोड में आपको वही हंसी-मजाक और अपनेपन के बीच-बीच में बनराकस का टेंशन मिलता रहेगा। इस सीजन में बनराकस का लालच और उसकी पत्नी क्रांति देवी का कपटीपना एक अलग ही लेवल पर पहुंच गया है। इन दोनों के साथ ही बिनोद और माधव दोनों के किरदार को भी पहले से ज्यादा स्पेस दी गई है।
सिचुएशन गड़बड़ होती है आखिरी के एपिसोड में जहां मेकर्स पंचायत चुनाव, क्रांति-बनराकस और पूर्व विधायक पर ज्यादा फाेकस कर जाते हैं। यहां एपिसोड को सेंटर में रखते हुए जो सिचुएशन क्रिएट की गई है वो भी उतनी दमदार नहीं है, जितना पिछली कुछ सीजन में हुआ करती थी। यहां से बाकी मामला ठंडा पड़ जाता है। कुछ सीन में तो ‘पंचायत’ की प्रसिद्ध चौकड़ी प्रधान, सचिव, प्रह्लाद चा और विकास के बीच बॉन्डिंग ही कमजोर दिखती है।
सीजन 4 के इन आखिरी एपिसोड में आपको जो थाेड़ा बहुत संभाले रखता है वो हैं सचिव जी और रिंकी की लव स्टोरी। हालांकि, यह लव स्टोरी भी इस सीजन में उतनी नहीं दिखाई गई जितना सबने उम्मीद की हुई थी।
बाकी बात करें आखिरी एपिसोड की तो बस इतना कहूंगा कि अगर आप पंचायत के कोर फैन हैं तो आखिरी एपिसोड पर्सनली आपको पसंद नहीं आएगा।
वेब सीरीज 'पंचायत' रिव्यू
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डायरेक्शन: इस वेब सीरीज में छोटी चीजों को जिस खूबसूरती से और मजेदार बनाकर दिखाया जाता है वो कमाल है। चाहे सचिव जी के मुंह से प्रधान जी का तकिया कलाम- ‘ई ससुर…’ सुनना हो या फिर खुद प्रधान जी का अपने ससुर जी को ही ‘ई ससुर’ बोल देना हो। कई ऐसे सीन हैं जहां आपको इस सीरीज का वो ही पुराना अंदाज देखने को मिलता है जो इसकी खासियत है। वहीं प्रह्लाद चा का एक डायलॉग जहां वो कहते हैं- ‘बेटा शहीद न हुआ हो.. जैसे लॉटरी लग गया हो..’ आपको भी चुभता है। कई सीन में आप भी इन किरदारों का दर्द महसूस करके उनके साथ उदास हो जाते हैं।
निर्देशक दीपक मिश्रा और अक्षत विजयवर्गीय ने सीजन 4 के कुछ एपिसाेड तक इसका वही पुराना मसाला फॉलो किया। हालांकि, आखिरी के एपिसोड में उन्होंने जो आंच धीमी की उससे मजा किरकिरा हाे गया। कुछ सीन खिंचे हुए से लगने लगे। कलाकारों के सामने आती एक ही तरह की सिचुएशन देखते हुए आपके लिए भी यह बोरिंग हो गया। आखिरी के दो से तीन एपिसोड में कुछ मिसिंग है। ऐसा लगता है जैसे ये जल्दीबाजी में पूरे किए गए हों।
वेब सीरीज 'पंचायत' रिव्यू
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एक्टिंग: सचिव के किरदार में जीतेंद्र का इस बार थोड़ा अलग अंदाज देखने को मिला। राेमांटिक सीन में भी वो कमाल के एक्टर हैं। प्रधान जी हर सीजन की तरह सीरीज की रीढ़ बने हुए हैं। नीना गुप्ता के पास यहां पिछले कुछ सीजन से ज्यादा करने के लिए था, उन्होंने उसे बखूबी किया भी। फैसल मलिक, चंदन राॅय और सानविका ने भी हर बार की तरह अपना काम बढ़िया तरीके से किया। दुर्गेश कुमार और सुनीता राजवर का काम इस सीरीज में यह है कि इनके किरदारों से आपको बेइंतहा चिढ़ और नफरत हो.. इसमें दोनों पूरी तरह सफल हुए। विनोद का किरदार निभाने वाले आशोक पाठक को इस बार ज्यादा स्पेस मिला, जिसका उन्होंने भरपूर फायदा उठाया है। विधायक जी के रोल में पंकज झा से आपको मिक्स्ड इमोशंस मिलते रहते हैं। सांसद के छोटे से किरदार में स्वानंद किरकिरे का काम बढ़िया है। अगले सीजन में उनके किरदार को और देखना पसंद करेंगे।
वेब सीरीज 'पंचायत' रिव्यू
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देखें या नहीं: कुछ कमियों के बावजूद भी पंचायत का सीजन 4 सारे इमोशंस बखूबी पकड़ता है इसलिए इसे लेकर मिक्स्ड रिएक्शंस ही सामने आ रहे हैं। अगर आप इसके फैन हैं तो यकीनन अब तक पूरा सीजन निपटा चुके होंगे। मायूस भी हाेंगे और उसकी वजह आप खुद जानते भी हैं। जो डाय हार्ड फैन नहीं, वो आराम से देखें। लाइट कॉमेडी पसंद करते हैं तो यह आपके लिए ही है।
'पंचायत' की टीम के साथ अमर उजाला का खास इंटरव्यू यहां देखें...