बीते कुछ दिनों से मैं भी अपने फुलेरा मतलब अपने गांव में हूं। फुलेरा की कहानी के सीजन 4 में जो कुछ मिसिंग है, वह सब यहां है। 24 घंटे बिजली की आंख मिचौली चलती रहती है। ग्राम प्रधान और खंड विकास कार्यालय के बीच विकास योजनाओं का करंट ऊपर नीचे होता रहता है। मनरेगा के काम ठेके पर हो रहे हैं। स्कूल के अध्यापक इस बात को लेकर अभी से चिंताग्रस्त हैं कि जनगणना में उनके ऊपर कितना बोझ आने वाला है। ग्राम पंचायतों और स्कूलों के विलय को लेकर भी खूब बातें होती हैं। सब अपने-अपने काम में बिजी हैं। गांव की राजनीति भी चलती रहती है। मिठाई की दुकान से लेकर मंदिर के बरामदे तक। लेकिन, इस बार फुलेरा ग्राम पंचायत में ये सब नहीं है। न दिशा मैदान करने गए प्रधान जी की चाभी गुम होने जैसा कुछ है, न भुतहा पेड़ के नीचे लेटे प्रह्लाद चा का चेहरा चमक पा रहा है। वेब सीरीज ‘पंचायत सीजन 4’ का जो रूप है, वह इसकी लिखाई के फरमे में ढल जाने का सबूत है। और, ये सलाह इस बात की भी है कि एक बार जो कहानी हिट हो जाए तो उसे च्यूइंग गम सरीखा मत खींचो।
नहीं मिले तीसरे सीजन के सवालों के जवाब
पिछला सीजन याद है आपको ‘पंचायत’ का? कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा, सरीखा एक सवाल छूट गया था उत्तर तलाशते तलाशते कि गोली किसने चलाई? ये याद है तो विधायक जी और उनका घोड़ा भी याद होगा? मनोज तिवारी का गाना तो खैर याद होगा ही और याद ये भी होगा कि सचिव जी और प्रधानजी की बिटिया की लव इश्टोरी तनिक और करीब आ चुकी थी। अब जाहिर बात है कि चौथा सीजन देखने से पहल इसके हर फैन ने रेडी रेकनर या गांव की भाषा में कहें तो कुंजी जैसा कुछ तुरंत रिवाइंड किया ही होगा, लेकिन अफसोस कि चौथा सीजन इस राह पर है ही नहीं, उसे भाई लोग अलगै रास्ता पकड़ा दिए हैं। नाम ही बस फुलेरा है, बाकी सब आषाढ़ की बारिश में फूली लकड़ी जैसा फूल गया है। कभी अनुभव किया है कि बारिश में लकड़ी का दरवाजा फूलने के बाद कितना जोर लगाना पड़ता है, उसे बंद करने के लिए, कुछ कुछ वैसा ही जोर लगाया गया है इस सीजन को बना देने के लिए।
कलाकार क्या करें जब कहानी ही नहीं
वेब सीरीज ‘पंचायत’ का चौथा सीजन, जिस अंदाज में रिलीज किया गया है, उसे लेकर भी संदेह के बाद उठते हैं। हफ्ता भर पहले ऐसी करामाती सीरीज का ट्रेलर रिलीज करके कौन रिलीज डेट बताता है। जिस सीरीज में जितेन्द्र कुमार, नीना गुप्ता, रघुवीर यादव, फैसल मलिक, चंदन रॉय, सानविका, दुर्गेश कुमार, सुनीता राजवार और पंकज झा जैसे बेहतरीन कलाकार हों, वो इन सबके मेले के बाद भी दिल को न छू पाए तो कोफ्त होती है। ये समय की भी बर्बादी है और एक मजबूत ब्रांड की छवि तो बिगाड़ती ही है। कहानी इस बार पूरी तरह गांव फुलेरा के चुनाव पर टिक गई है, जहां मंजू देवी और क्रांति देवी आमने-सामने हैं। हालांकि, असली लड़ाई तो उनके पतियों के बीच चल रही है, जो एक-दूसरे को हराने के लिए तरह-तरह की चालें चलते हैं। अगर आपको निंदा रस भाता है तो शुरू शुरू में आपको ये अच्छी भी लग सकती है, लेकिन फिर समझ आता है कि इसे जबरिया खींचा जा रहा है।