उत्तरजीविता को फिर से परिभाषित करती फिल्म
फिल्म ‘नेवर लेट गो’ डरावनी फिल्मों की श्रेणी की उस उप श्रेणी की फिल्म है जिसे अंग्रेजी में सर्वाइवल ड्रामा कहा जाता है। हिंदी में इसे हम उत्तरजीविता को लेकर बना डरावना सिनेमा कह सकते हैं। इस तरह के सिनेमा में किसी एक व्यक्ति, समूह या समाज को किसी जानी पहचानी या अनजान शक्ति से बचना होता है। जीवित बने रहने का ये संघर्ष आसपास के वातावरण से खुराक पाता है और इसके किरदार हालात के हिसाब से अपने रंग बदलते रहते हैं। फिल्म ‘नेवर लेट गो’ दरअसल फिल्म ‘मदर लैंड’ के नाम से बननी शुरू हुई थी। कहानी ये एक ऐसी मां की है जो दुनिया तबाह होने के बाद एक ऐसे जंगल में बने घर में अपने जुड़वा बच्चों के साथ पनाह लिए हुए है, जहां भूतों के साये उसे नजर आते हैं। तीनों घर से बाहर निकलते हैं तो घर की नींव से बंधी रस्सी से अपनी कमर कसे रहते हैं और हर बार बाहर निकलने से पहले एक दूसरे से वादा करते हैं, ‘नेवर लेट गो’, मतलब रस्सी को छोड़ना नहीं है।
सच क्या है, जो बड़ों ने बताया या फिर..!
केविन कफलिन और रयान ग्रासबी की फिल्म ‘नेवर लेट गो’ का ऊपरी स्तर ठेठ हॉरर फिल्म जैसा है। मां है। दो बेटे हैं। दोनों रोज खाने की तलाश में निकलते हैं। जो कुछ भी जीवित उनको नजर आता है। पकड़ कर जिंदा या भूनकर या तलकर खा जाते हैं। जंगल भले विशाल है। जानवर वहां भी सीमित है। नौबत पेड़ों की छाल तक खाने की आती है। लेकिन, इससे काम बनता नहीं। घर में तीन इंसानों के अलावा चौथा, एक जानवर भी है। ये कुत्ता दोनों बेटों में से एक का जिगरी है। तय होता है कि अब इसे खाना पड़ेगा। जिसका ये पालतू है, वह विद्रोह कर देता है। दूसरा बेटा और मां के वोट निर्णायक बन जाते हैं। मां कुत्ते को मारने के लिए ले जाती है और बेटा मां की कमर में बंधी रस्सी काट देता है। फिल्म ‘नेवर लेट गो’ यहां से अपनी असली पहचान पाती है और बताती चलती है कि जो कुछ दिखता है, वह हमेशा सत्य नहीं होता है। सत्य वह भी नहीं होता जिसे सुन सुनकर हम बड़े होते हैं या फिर जिसे हमें सत्य मानकर घुट्टी में पिलाने की कोशिश होती है।
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स्वयं, समूह और समाज की डरावनी समझ
फिल्म ‘नेवर लेट गो’ की अंतर्धारा भीतर तक हिला देने वाली है। इंसान के लिए सबसे जरूरी वह खुद है। अपने स्वार्थ के लिए वह रिश्ते, नाते, वफादारी कुछ नहीं देखता। और, रिश्तों में सबसे अहम होता है विश्वास। ये टूटा तो फिर रिश्ता, रिश्ता नहीं रहता। और, जब रिश्तों की मजबूती नहीं होती तो फिर सामने होता है जमाना। जिसकी हकीकत को झेल पाना अकेले अकेले किसी के बस की बात नहीं। निर्माता शॉन लेवी ने शायद इस कहानी की इसी अंतर्धारा पर अपना दांव लगाया और इसी अंतर्धारा को मजबूती देने हैली बेरी भी बतौर निर्माता इस फिल्म से जुड़ीं। मैंने ये फिल्म जब देखी तो हिंदी फिल्म ‘छोरी’ के निर्देशक विशाल फूरिया पास वाली सीट पर बैठे थे। इंटरवल में हम दोनों यही बातें करते रहे कि हिंदी में हॉरर सिनेमा को मजबूती देने के लिए शॉन लेवी जैसे लोगों के साथ साथ हैली बेरी जैसे समर्पित कलाकार तो चाहिए ही, साथ ही लॉयन्सगेट जैसी ऐसी कंपनियां भी चाहिए जो इस तरह की कम बजट मे बनी फिल्मों को सिनेमाघरों तक पहुंचा सकें।
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क्या वाकई नागिन अपने बच्चे खाती है?
हिंदी में हॉरर को मजबूती देने के छिटपुट प्रयास पहले भी होते रहे हैं। ‘शैतान’, ‘स्त्री 2’ और री रिलीज पर ‘तुम्बाड’ की सफलता ये बताती है कि हिंदी में भी हॉरर फिल्में देखने वाले दर्शकों का एक बड़ा वर्ग ऐसी फिल्मों के लिए बेकरार बैठा है। और, फिल्म ‘नेवर लेट गो’ जैसी फिल्मों से अपनी आस पूरी करने की कोशिश करता है। इस फिल्म की असल जान हैं इसकी नायिका हैली बेरी। वह दर्शकों को फिल्म के लिए आकर्षित करने का काम तो करती ही हैं, बतौर अभिनेत्री भी उन्होंने फिल्म में एक बेबस मां का जो अभिनय किया है, वह अवार्ड विनिंग परफॉर्मेंस है। बेटों के भटकते ही उनकी गर्दन के पास छुरा लेकर उनसे मंत्र पढ़वाना, आत्मा की शुद्धिकरण के लिए तहखाने में कैद करना, ये सब एक मां की मजबूरी की निशानियां हैं। और, इसे हैली ने बहुत ही शानदार तरीके से कैमरे के सामने जीया है। असल जिंदगी में भी तो मांए ऐसी ही होती हैं। बच्चों की सुरक्षा के लिए कुछ भी कर गुजरती हैं। बच्चों को जंगल में अजगर की केंचुल मिलती है और भले नागिन अपने बच्चों को ही खा जाती हो लेकिन यहां कहानी फिल्मी होते हुए भी मां अपने बच्चों की ही रहती है। हैली बेरी के बच्चे बने पर्सी डैग्स फोर्थ, एथंनी बी जेनकिन्स ने भी सराहनीय अभिनय इस फिल्म में किया है।
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माहौल की महत्ता बताती फिल्म
फिल्म ‘नेवर लेट गो’ सिनेमा में वातावरण की महत्ता को भी दर्शाने वाली फिल्म है। वैंकूवर के पास के जंगलों में शूट की गई इस फिल्म के लिए कयामत के बाद का जैसा वातावरण कहानी के अनुसार चाहिए था, वैसा तलाशने में और उसके बीच बने घर को परदे पर इकलौती शरणस्थली के रूप में प्रदर्शित करने में ही फिल्म की पहली जीत है। ये जंगल, इसके बाशिंदे, इसमें बना कुआं, इसकी रस्सियां, रस्सियों को थामे खड़ा घर, सब इस कहानी के किरदार हैं। और, फिल्म के लिए ये माहौल रचने में इसकी टीम ने अद्भुत काम किया है। प्रोडक्शन डिजाइनिंग में तो फिल्म एक नंबर है ही, मैक्साइम अलेक्जान्ड्रे की सिनेमैटोग्राफी फिल्म की रूह है। इसे स्पंदन देने का काम किया है फिल्म के पार्श्वसंगीत ने जिसे रॉबिन कोउडर्ट ने बहुत ही इत्मीनान से रचा है। हॉरर फिल्मों के शौकीनों के लिए ये एक अच्छी टाइम पास फिल्म हो सकती है।
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