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Sector 36 Review: विक्रांत मैसी की अदाकारी के लिए देखना चाहें तो देख लें फिल्म, वाकई इस फिल्म से घिन आती है...

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'सेक्टर 36' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
सेक्टर 36
कलाकार
विक्रांत मैसी , दीपक डोबरियाल , दर्शन जरीवाला और आकाश खुराना आदि
लेखक
बोधायन रॉयचौधुरी
निर्देशक
आदित्य निंबालकर
निर्माता
दिनेश विजन और ज्योति देशपांडे
ओटीटी
नेटफ्लिक्स
रिलीज
13 सितंबर 2024
रेटिंग
2/5

कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, ये संवाद हिंदी सिनेमा के दर्शकों ने तमाम फिल्मों मे बार बार सुना है। लेकिन, एक नाले से मिले कटे हाथ से शुरू हुई तफ्तीश एक घर के अहाते में दफन करीब दो दर्जन मासूमों के अस्थिपंजर तक पहुंचेगी। बच्चों का शारीरिक शोषण करने के बाद उनके टुकड़े टुकड़े कर देने वाला पकड़ा जाएगा। उसका मालिक ऐसा धन्ना सेठ होगा कि तमाम अफसर उसे बचाने के लिए निछावर नजर आएंगे। सब कुछ किसी वीभत्स फिल्म जैसा लगता है। लेकिन, घटना असली है। साल 2005-2006 में नोएडा के गांव निठारी में सामने आई इस घटना ने पूरी दुनिया की मीडिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा था। लेकिन, क्या आपको पता है कि इस घटना के दोनों मु्ख्य आरोपी सबूतों के अभाव में बेगुनाह साबित हो चुके हैं!

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'सेक्टर 36' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सच्ची घटना पर बनी फिल्म का डिस्क्लेमर
जी हां, कानून के हाथ वाकई बहुत लंबे होते हैं। ये बात निठारी कांड पर बनी फिल्म ‘सेक्टर 36’ आपको फिर से समझाना चाहती है। लेकिन, फिल्म शुरू होते ही इस हाथ पांव ठंडे पड़ जाते हैं। सच्ची घटना पर फिल्म बनाना और इस बात पर कायम रहना कि ये फिल्म किसी सच्ची घटना पर बनी है, भारत के केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की सोच से मेल नहीं खाता है। यहां भी इस पूरे हादसे को ‘काल्पनिक’ मानने की मजबूरी है। नोएडा के निठारी को दिल्ली के सीलमपुर, शाहदरा जैसी जगह में बदल देने की कहानी की कमजोरी है और है एक ऐसा सिनेमाई गणित जिसे समझना हर किसी के बस की बात नहीं। अपना खुद का जियो सिनेमा ऐप चलाने वाली कंपनी के फिल्म प्रोडक्शन हाउस जियो स्टूडियोज ने ये फिल्म ‘स्त्री 2’ बनाने वाली कंपनी मैडॉक फिल्म्स के साथ मिलकर बनाई है और रिलीज ये नेटफ्लिक्स पर हुई है।

'सेक्टर 36' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
मजबूत हो कलेजा तभी देखें फिल्म
तो जिनको जिनको निठारी कांड के बारे में पहले से पता है, वे इस फिल्म को देखना भी चाहेंगे, इस पर संदेह की तमाम वजहें हैं। ये पूरा घटनाक्रम इतना वीभत्स है कि इसके बारे में पढ़कर ही लोगों को मितली आने लगती थी। उसी पूरे घटनाक्रम का फिल्मीकरण देखना भी हिम्मत का ही काम है। सलाह यही है कि कमजोर दिल के लोग ये फिल्म न देखें और अगर आपका का कलेजा मजबूत है और वीभत्स रस आपको नाट्यशास्त्र का बस एक और रस ही लगता है तो भी इसे देखने से पहले ये समझ लें कि आप देखने क्या जा रहे हैं। सिर्फ विक्रांत मैसी का अभिनय देखने के लिए ही ये फिल्म देखनी हो तो बाद दीगर है।

'सेक्टर 36' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आदित्य और बोधायान की कमजोर रिसर्च
निर्देशक विशाल भारद्वाज के सहायक रहे आदित्य निंबालकर ने फिल्म ‘सेक्टर 36’ बनाने के लिए अपने लेखक बोधायन रॉयचौधुरी पर भरोसा किया है। दोनों ने पुलिस की कार्यप्रणाली बस फिल्में देखकर समझी है। तीन सितारे वाला इंस्पेक्टर पुलिस की पदव्यवस्था में कितना स्टाफ डिजर्व करता है और उसके सीनियर डीसीपी जैसे पद पर रहने वाले अफसर की अहमियत क्या है, ये समझना इन दोनों को अभी बाकी है। यहां फोकस पूरा प्रेम पर है। उसे अपराध से प्रेम है। वह बच्चों से अपने प्रेम की पूर्ति करना चाहता है। कसाईबाड़े की उसकी यादें हैं और हरकतों में पूरा कसाई वह बन चुक है। और, इस हत्यारे को पकड़ने निकले हैं इंस्पेक्टर पांडे जी। चुलबुल तो नहीं हैं, लेकिन उससे कम भी नहीं हैं।
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'सेक्टर 36' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
विक्रांत मैसी के लिए देखें तो देख लें फिल्म
फिल्म ‘सेक्टर 36’ में विक्रांत मैसी का किरदार जिस तरह की दोहरी शख्सियत वाला है, उसे देखना दिलचस्प है। वह महत्वाकांक्षी है। घर परिवार वाला है। और, चलते फिरते अगर टकरा जाए तो पहचानना मुश्किल होगा कि ये वही वहशी दरिंदा है जो कोने में छुपकर बच्चों का शिकार करने का इंतजार करता है। लेकिन, विक्रांत की ये अदाकारी इस फिल्म को मुख्यधारा में लाने के लिए काफी नहीं है। दीपक डोबरियाल का अपना अलग टशन है। वह कोई भी किरदार कर लें, इन दिनों दीपक डोबरियाल ही लगते रहना चाहते हैं। कभी ये गुमान शाहरुख खान को हुआ था कि लोग फिल्में उनके किरदारों की वजह से नहीं उनके नाम की वजह से देखने आते हैं। आकाश खुराना का किरदार अधपका है और दर्शन जरीवाला के किरदार की कमजोरी फिल्म की कमजोरी बन जाती है।
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