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Movie Review: 'इत्तेफाक' से ठंडे एंटरटेनमेंट में गर्मी की तलाश

Fri, 03 Nov 2017 01:57 PM IST
रवि बुले
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-निर्माताः रेड चिलीज/धर्मा प्रोडक्शंस
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-निर्देशकः अभय चोपड़ा
-सितारेः सिद्धार्थ मल्होत्रा, सोनाक्षी सिन्हा, अक्षय खन्ना
रेटिंग **1/2

यह इत्तेफाक नहीं कि सिनेमाई कहानियों के अंत में इन दिनों झूठ की जीत होती है। बॉलीवुड के सेलेब्रिटी अपराध करके बचते दिखे हैं। शोहरत और पैसे के दम पर वे सब खरीद लेते हैं। कानून को हरा देते हैं। इत्तेफाक में अगर सेलेब्रिटी राइटर दो हत्याएं करके भी बच निकलता है तो यह बॉलीवुड में जड़े जमा रही सोच का परिणाम है। 

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फिल्म की मुश्किल यह है कि इसकी कहानी कागजी मालूम पड़ती है। इससे ज्यादा सनसनीखेज मामले टीवी पर प्रसारित होने वाली ‘मनोहर कहानियों’ में दिखते हैं। इत्तेफाक में रफ्तार नहीं है। इसका सस्पेंस रगों में खून की गर्मी नहीं बढ़ाता। धीमी गति के समाचार की तरह यहां चीजें सरकती हैं। ‘ठंडे एंटरटेनमेंट’ वाली यह फिल्म टाइमपास के लिए टीवी/मोबाइल पर ठीक है। यहां ऐसा कुछ सिनेमैटिक नहीं जो बड़े पर्दे पर ही आनंद देगा।
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धीमी रफ्तार से भागती है फिल्म की कहानी

यह कहानी ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय मूल के राइटर विक्रम सेठी (सिद्धार्थ मल्होत्रा) की है जो अपने नए नॉवेल को लॉन्च करने मुंबई आया है। उसकी विदेशी पत्नी की होटल में मौत हो जाती है। पुलिस को शक है कि सिद्धार्थ ने ही अपनी पत्नी की हत्या की है। वह भागता है और भागते हुए एक वकील के घर में घुस जाता है, जहां वकील की पत्नी माया (सोनाक्षी सिन्हा) अकेली है।

कहानी यहां कुछ रहस्यमयी हो जाती है क्योंकि बंद अपार्टमेंट में क्या हुआ, पुलिस के सामने विक्रम और माया के बयानों से पता चलता है, जो अलग-अलग हैं। पता चलता है कि यहां वकील की भी हत्या हुई है। विक्रम कहता है माया और उसके अलावा वहां कोई तीसरा भी था, जिसने वकील को मारा। 

माया का कहना है कि विक्रम ने उसके पति की हत्या की। कौन सच बोल रहा है। क्या कहानी में कुछ और भी ट्विस्ट है? इस्तेफाक के मध्य भाग को रोचक ढंग से लिखा गया है लेकिन ओपनिंग और क्लाइमेक्स सपाट ढंग से बयान किए गए हैं। साथ ही अजीबोगरीब ढंग से बताया गया है कि विक्रम ने रेप का शिकार हुई एक लड़की की कहानी सुन कर उस पर उपन्यास लिखा, फिर लड़की की पहचान उजागर कर दी। 
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फिल्म का निर्देशन काफी अच्छा है

Ittefaq
अतः लड़की ने आत्महत्या कर ली। कहानी में कहीं यह सिरा नहीं जुड़ता और इसके संदर्भ समझ से बाहर रहते हैं। इत्तेफाक के लिए मंजे ऐक्टरों की जरूरत थी जो चेहरे और संवाद में भावनात्मक उतार-चढ़ाव के साथ खेलें। सिद्धार्थ-सोनाक्षी में वह बात नहीं। इसलिए वे अपने किरदारों को धार नहीं दे पाते। 

हत्याओं की जांच कर रहे पुलिस अधिकारी बने अक्षय खन्ना जरूर आकर्षित करते हैं। उन्हें सिद्धार्थ-सोनाक्षी का साथ मिलता तो रंगत कुछ और होती।अभय चोपड़ा का निर्देशन अच्छा है और काफी हद तक उन्होंने चीजों पर नियंत्रण रखा है। इत्तेफाक गीत-संगीत- नृत्य-कॉमेडी- ड्रामा से शून्य है। अतः पारंपरिक दर्शकों के लिए नहीं है।
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