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शानदार: बेकार फिल्मों की कतार में एक और फिल्म

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निर्माताः करन जौहर/द फैंटम्स
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निर्देशकः विकास बहल
सितारेः शाहिद कपूर, आलिया भट्ट, पंकज कपूर, सना कपूर
रेटिंग *

इस दशहरे पर आप किसी का भेजा फ्राई करना चाहें तो उसे बताएं कि शानदार एक शानदार फिल्म है। अगर उसने आपकी बात मान कर फिल्म देख ली तो तय मानिए कि आप उसके जीवन के रावण बन जाएंगे। पिछले साल विकास बहल ने फिल्म क्वीन से स्नेह और सम्मान का जितना बैंक बैलेंस बनाया था, वह शानदार के साथ खाली हो जाता है। क्वीन पिछले साल की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में थी और शानदार इस साल की सबसे खराब फिल्मों की कतार में है।

कहानी से लेकर निर्देशन, अभिनय और गीत-संगीत के स्तर पर आप अंत तक समझ नहीं पाते कि आखिर फिल्मकार कहना क्या चाहता है! यूं भी महसूस होता है कि फिल्मकार दर्शकों को नर्सरी/केजी जैसी कक्षाओं वाला बच्चा समझता है, जो उसकी हर बात पर ताली बजा देंगे।
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शानदार की बागडोर भले ही विकास बहल के हाथ में हो, लेकिन इससे करन जौहर-अनुराग कश्यप जैसे नाम जुड़े हैं। उनकी सिनेमाई प्रतिबद्धताएं भी यहां आप यहां पाते हैं। अतः यह कई हलवाइयों की रेसिपी से बनी मिठाई है।
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फिल्म में नहीं के बराबर है कहानी

जहां तक कहानी का सवाल है तो वह फिल्म में नहीं के बराबर है। भारत के एक बड़े औद्योगिक घराने की लड़की (सना कपूर) की शादी बिजनेस डील के रूप में इंग्लैंड में रहने वाले एक औद्योगिक घराने में तय हो गई है। लड़की मोटी मगर भोली-भाली-प्यारी-सी है और उधर लड़का साढ़े आठ पैक्स वाला मगर संस्कारहीन-उजड्ड है।

लड़की की छोटी बहन (आलिया भट्ट) है। जिसे उसके पिता (पंकज कपूर) कहीं से लाए थे। घर में सब उसे अनाथ समझते हैं। इंग्लैंड पहुंचने पर छोटी बहन को वेडिंग प्लानर लड़के (शाहिद कपूर) से प्यार हो जाता है। इन दोनों को नींद न आने के बीमारी है। अतः रात भर जागते-जागते उनमें प्यार हो जाता है और एक-दूसरे के साथ नींद आने लगती है! कहानी शुरू से अंत तक कुछ इस अंदाज में कही गई है कि फिल्म देखते-देखते आपका मन भी सो जाने का होने लगता है। अगर आपको नींद नहीं आती और सोना चाहते हैं तो इस फिल्म को आजमा सकते हैं।

विकास की फिल्म पर पकड़ नहीं दिखती। शाहिद-आलिया की जोड़ी नहीं जमती। शाहिद के खाते में यह एक और भुला दी जाने वाली फिल्म है। निजी जिंदगी में चुटकुलों की शिकार आलिया ने यहां हर सवाल का जवाब जानने वाली गूगल-टाइप लड़की का रोल किया है। पंकज कपूर एक भी दृश्य में असर नहीं छोड़ते। निर्देशक जब पंकज जैसे ऐक्टर को लेकर एक यादगार सीन नहीं गढ़ सका तो बाकी ऐक्टरों के साथ क्या किया होगा, आप खुद सोच सकते हैं।

त्यौहारों के इस छुट्टी वाले मौसम में घर के कामों में एक-दूसरे हाथ बंटा लें, जरूरतमंद दोस्तों-परिजनों की मदद कर दें, जिनके घर बहुत दिनों से नहीं गए हैं उनसे मिल आएं, कुछ अच्छा पढ़े अगर अर्सा बीत गया हो तो कोई किताब खरीद कर पढ़ लें... और तब भी लगे कि फिल्म के टिकट के पैसों का कुछ तो करना ही है तब किसी ऐसे मिशन में दे दें जहां अनाथ तथा गरीब बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा उठाया गया हो। इससे शानदार कुछ नहीं होगा।
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