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FILM REVIEW: नहीं देखी बोरिंग शादी तो 'वीरे दी वेडिंग' में जरूर जाएं...

Fri, 01 Jun 2018 12:33 PM IST
रवि बुले
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अगर आपने कोई बोरियत भरी शादी न देखी हो तो वीरे दी वेडिंग आपके लिए है। यहां ढंग का संगीत-नाच-गाना नहीं है तो बाकी उम्मीदें छोड़िए। नए पढ़े-लिखे युवाओं की रिश्तों से बगावत, तू नहीं और सही की सोच, आज फेरे-कल बिछुड़े, सिगरेट-शराब से दोस्ती और बिंदास सेक्स की बातें सैकड़ों फिल्मों में दिख चुकी हैं। चार सहेलियों की दोस्ती के अलावा यहां कुछ नया ढूंढते रह जाएंगे।
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लेकिन मुश्किल यह कि फिल्म में ऐसा कुछ नहीं जिसमें आपको स्त्रियों का निजी संसार दिखे। चार लड़कों की दोस्ती, मौज-मस्ती और बकवासों में जो मिलता है, वही इन लड़कियों की दुनिया में है। कोई समानांतर दुनिया नहीं है। निधि मेहरा-मेहुल सूरी की पटकथा और शशांक घोष का निर्देशन कहीं प्रभाव नहीं छोड़ते।

इस कहानी में दम नहीं है। स्कूली दिनों की चार सहेलियां हैं: कालिंदी (करीना कपूर खान), अवनी (सोनम कपूर), शिखा (स्वरा भास्कर) और मीरा (शिखा तलसानिया)। सदा मां-बाप के झगड़े देखने वाली कालिंदी का शादी पर से भरोसा उठ गया है। अवनी वकील है और उसे कोई लड़का पसंद नहीं आता। शिखा ने देखा-देखी वाले प्यार के बाद चट मंगनी पट ब्याह किया और अब तलाक के कगार पर है।

मीरा ने घर के बड़ों की मर्जी के एक अमेरिकी से शादी की। उन्होंने उसे अपने से दूर कर दिया। सिडनी में रह रही कालिंदी, जिसे उसका प्रेमी ऋषभ (सुमित व्यास) प्यार से कालू बुलाता है, तीन साल उसके साथ रहने के बाद शादी को राजी होती है। अब सहेलियां इस शादी के लिए अपने सुख-दुख के साथ इकट्ठी हैं। यहां से शुरू होते हैं तमाम झमेले, जो जैसे-जैसे फिल्म बढ़ती है ज्यादा नकली लगते जाते हैं।

फिल्म में रिश्तों की संवेदनाएं और अच्छे संवाद गुम हैं। करीना को अब रोमांस-शादी वाली कहानियों में नई लड़कियों के लिए जगह छोड़नी चाहिए। सोनम किसी नौसिखिए जैसा अभिनय करती हैं। शिखा औसत हैं। चौकड़ी में असर केवल स्वरा छोड़ती हैं। अब यह बॉलीवुड में भाई-भतीजावाद का डांका और कथित स्टारडम की पूजा है, जो उन्हें करीना-सोनम के होते फिल्म में लीड रोल नहीं दिया जा सकता! स्वरा एकमात्र हैं, जो यहां अपने किरदार से न्याय करती हैं।
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लेखक-निर्देशक गफलत में हैं कि ठोस कहानी के अभाव में क्या दिखाएं? चूंकि निर्माता के पास लगाने के खूब सारा धन है, अतः वे शादी में तीन करोड़ और अंगूठी पहनाने की रस्म मे डेढ़ करोड़ खर्च कर देने वाले परिवारों का पैसा उड़ाना दिखाते हैं। दमकती रंगीन लाइटों वाले शादी के सैट, खूब सारे डिजानर कपड़े, भड़कीली डिजानर ज्वैलरी, सिडनी और फुकेट के समुद्री किनारों से होते हुए कहानी खींचते हैं।

कभी नहीं लगता कि निर्देशक ने लड़कों-लड़कियों में सामाजिक-वैचारिक भेद की दीवार को गिराने का गंभीर प्रयास किया है। फिल्मी नजरिये से देखें तो न रोमांस है, न कॉमेडी। नायिकाएं संवादों में मुख्य रूप से सेक्स केंद्रित बातें करती हैं और कहीं-कहीं नारीवादी होकर मर्दों, परिवारों तथा समाज की रवायतों को लानत भेजती हैं। शराब उनका पसंदीदा पेय है। अगर आप चीयर्स कहते हुए बाकी सब नजरअंदाज कर सकते हैं तो इस शादी में हो आइए।
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