-निर्माताः अब्बास-मस्तान/पैन मूवीज
-निर्देशकः अब्बास-मस्तान
-सितारेः मुस्तफा बरमावाला, कियारा आडवाणी, रोनित रॉय
रेटिंग *
कोई भी मशीन तभी सही चलती है जब सारे कलपुर्जे ढंग से काम करें। इसके लिए तेल-पानी- बिजली लगती है। अब्बास-मस्तान की मशीन का मूल आइडिया है, हीरो को संवेदनहीन मशीन की तरह पाला-पोसा गया है। वह हृदयहीन है। इसका नतीजा क्या होगा? इस विचार को अच्छी स्क्रिप्ट, अच्छे एक्टर, कर्णप्रिय संगीत और थ्रिल पैदा करने वाले दृश्यों जरूरत थी। परंतु यह कहीं नहीं दिखता। आप सवा दो घंटे तक ‘खटारा’ में सफर के एहसास से रू-ब- रू रहते हैं। मशीन की चर्चा हो रही थी कि निर्देशक जोड़ी के अब्बास बरमावाला के बेटे मुस्तफा इससे हीरो बनकर बॉलीवुड में आ रहे हैं।
अब्बास-मस्तान ने बाजीगर, सोल्जर से लेकर रेस सीरीज की कामयाब रोमांटिक थ्रिलर बनाई हैं। उम्मीद थी कि मुस्तफा के लिए भी वे ऐसी रोमांचक कहानी लाएंगे। परंतु फिल्म बेहद निराश करती है। मुस्तफा सुस्त दिखते हैं। उनमें वह बात नहीं, जो किरदार की मांग थी। कहानी का केंद्रीय आइडिया जहां उनसे हृदयहीन हीरो जैसा दिखने की मांग करता है, वहीं उनका चेहरा सरल और रूमानी झलक दिखाता है। उनका किरदार और हाव-भाव कनफ्यूज लगते हैं। आप सिर्फ यही आशा कर सकते हैं कि भविष्य में वह अपनी कमियों को दूर कर लेंगे।
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