सिनेमा से प्यार करने वालों के लिए ‘शमिताभ’ शानदार तोहफा है। ऐसी ही फिल्म के इंतजार में आप हफ्ते-दर-हफ्ते ढेर सारी मूंगफली टाइप फिल्मों से टाइमपास करते हैं। फिल्म शमिताभ एक लजीज सिनेमाई दावत है।
अमिताभ एक और यादगार-बेहतरीन रोल में। धनुष ने साधारण व्यक्तित्व से फिर ऊंचाई हासिल की है और अक्षरा के रूप में बॉलीवुड में एक खूबसूरत और सधी हुई अभिनेत्री ने पदार्पण किया है। इन सबको कॉकटेल जैसा बना दिया है निर्देशक आर.बाल्कि ने।
चीनी कम और पा जैसी फिल्मों के बाद उन्होंने एक और मास्टर स्ट्रोक लगाया है, जो सिनेमाहॉल में तालियों की गूंज पैदा करता है। एक अंधा था, एक लंगड़ा था। दोनों मिल कर मेले में पहुंचे थे। यह कहानी आपने बचपन में जरूर पढ़ी या सुनी होगी। अब ‘शमिताभ’ को देखिए। जीवन की विडंबनाएं आपको सिखाती हैं कि संपूर्ण कोई नहीं है। सब अधूरे हैं। सबको पूरा करने वाला कोई और है।
साइंस और प्रतिभा से मिलकर बनती है 'शमिताभ'
फिल्म शमिताभ की कहानी अमिताभ सिन्हा और दानिश की है। अमिताभ सिन्हा चालीस साल पहले फिल्म इंडस्ट्री में ऐक्टर बनने आया था मगर उसकी आवाज को किसी ने पसंद नहीं किया और आज वह एक कब्रिस्तान में रहता है।
वहीं दानिश ने बचपन से सिर्फ सिनेमा को ओढ़ा-बिछाया, खाया-पीया और जीया है। विधि का विधान यह कि हीरो बनने का सपना तो दानिश की आंखों में है लेकिन ईश्वर ने उसे आवाज नहीं दी। वह गूंगा है।
सपनों की खूबी यही है कि वे किसी सीमा को नहीं मानते। दानिश भी लड़ता है और उसे ऐसी लड़की की मदद मिलती है जो उसकी प्रतिभा को पहचानती है। साइंस भी सहायता करती है। नतीजा यह कि अमिताभ सिन्हा की आवाज और दानिश का टेलेंट मिल कर सिनेमा की दुनिया में धूम मचा देते हैं।
फिल्म में दिखती है चेहरे और आवाज की टकराहट
लेकिन फिल्म में तभी उनके बीच टकराव शुरू होता है कि यह सफलता वास्तव में किसकी है...? चेहरे की या आवाज की? क्या वे अलग-अलग सफलता के मालिक हैं या फिर अब एक शख्सीयत बन चुके हैं? मुश्किल यह है कि अमिताभ को दुनिया से छुपा कर रखा गया है।
फिल्म में बाल्कि ने व्यक्ति के सपनों और संघर्षों के साथ सिनेमा की दुनिया से भी रू-ब-रू कराया है। स्ट्रगल कर रहे दानिश का छुप कर वैनिटी वैन में कई दिनों तक रहना, कामयाबी के साथ रातोंरात बदल जाती उसकी दुनिया और कलाकारों का अहंकार तथा सनक। 157 मिनटों तक आप खोए रहते हैं। खास तौर पर तब जब अमिताभ सामने होते हैं और उनके मुंह से धाराप्रवाह संवाद निकलते हैं।
'शमिताभ' में अमिताभ का एक नया रूप
फिल्म में एकाएक आप पाते हैं कि ‘जहांपनाह’ अभिनय का विश्वविद्यालय हो चुके हैं। फिल्म में कहीं-कहीं असली अमिताभ के विचारों की छटा भी दिखाई देती है।
जैसे वह पेड़ के तने (वुड) से बात करते हैं और इस बात की हंसी उड़ाते हैं कि यह कैसी इंडस्ट्री है जो अपने लिए मौलिक नाम तक नहीं खोज सकी, ऐसे में वह मौलिक कहानी/स्क्रिप्ट कहां से लाएगी। इसका नाम बॉलीवुड तो हॉलीवुड से ‘प्रेरित’ है।
फिल्म के एक दृश्य में रेखा हैं, जो धनुष से कहती हैं ‘इस आवाज का खयाल रखना।’ इस कहानी में कामयाब होने वाला सितारा ‘शमिताभ’ है। जो दानिश के ‘श’ और अमिताभ के ‘मिताभ’ से मिल कर बना है। यह ऐसी फिल्म नहीं है कि जिसके बारे में आप किसी से कहें, जरूर देंखें। इसके बारे में कहना होगा कि इसे ना छोड़ें।