फिल्म रहस्य को लेकर कहा जा रहा है कि यह कहानी काल्पनिक पात्रों पर आधारित है। इसके बावजूद अगर 'रहस्य' आपको 2008 में नोएडा में हुए आरुषि हत्याकांड की याद दिलाए तो आश्चर्य मत कीजिएगा।
कोई रचना कितनी भी हवा-हवाई हो लेकिन उसके बीज को भी जमीन की जरूरत पड़ती ही है, रहस्य भी अपवाद नहीं है। फिल्म मुंबई के एक फ्लैट में युवती आयशा महाजन की लाश मिलने के साथ शुरू होती है। हत्या के वक्त घर में सिर्फ उसका पिता था। सर्वेंट क्वार्टर में युवती को बचपन से पालने वाली आया-कम-नर्स और एक नौकर अपने-अपने कमरों में सो रहे थे। फिल्म में यहीं से शुरू होता है विवादों का साथ
सीबीआई अफसर की एंट्री के बाद फिल्म हो जाती है रोचक
फिल्म रहस्य में सीबीआई अफसर बने केके मेनन की एंट्री के बाद फिल्म और रोचक हो जाती है। आयशा डॉक्टर दंपती की बेटी है और उसकी हत्या के वक्त उसकी मां घर में नहीं थी। वह ऑर्थोपेडिक है एक सर्जरी के सिलसिले में पूना गई थी। पुलिस जब फ्लैट में पहुंची तो डॉक्टर पिता के शरीर पर बेटी के नाखूनों से बनी खरोंचों के निशान थे, बेटी के शरीर पर पिता के नाखूनों की खरोंच थीं। बेटी के हाथों में पुलिस को पिता के सिर के कुछ बाल भी मिलते हैं।
इस बीच नौकर गायब है और पिता का बार-बार कहना है कि पुलिस उसे ढूंढे क्योंकि वही यह काम करके फरार हुआ है। मगर सारे सुबूत पिता के खिलाफ हैं और अदालत उसे न्यायिक हिरासत में भेज देती है। यहां से कहानी में होती है एक सीबीआई अफसर की एंट्री, जिसे मामले की तह तक पहुंचने कि जिम्मेदारी दी गई है।
हत्याओं से कहानी में आता है ट्विस्ट
फिल्म शुरुआत में पुलिस जांच-पड़ताल की बारीकियों के बीच कुछ धीमी मालूम पड़ती है लेकिन जैसे ही अफसर के रूप में केके मेनन की आते हैं, कहानी रफ्तार पकड़ लेती है। यह जासूसनुमा अफसर दिमाग को तेज बनाने के लिए लगातार अखरोट खाता रहता है!
मामले की परतें एक के बाद एक खुलती हैं और कई मौकों पर आप चौंकते भी हैं क्योंकि थोड़े समय बाद पिता अकेला संदिग्ध नहीं रह जाता। आयशा की आया, नौकर, उसका बिगड़ैल बॉयफ्रेंड, डॉक्टर दंपति का एक मित्र परिवार क्रमशः संदेह के दायरे में आते जाते हैं। कहानी में ट्विस्ट तब आते हैं जब एक के बाद एक तीन हत्याएं और होती हैं!
कसी हुई फिल्म दर्शकों को बांधे रखती है
रहस्य अपनी कुछ तथ्यात्मक खामियों के बावजूद रोचक फिल्म है। हालांकि इस फिल्म का क्लाइमेक्स भावनाओं और जिज्ञासाओं को बहुत ऊंचाई पर नहीं ले जाता और सपाट मालूम पड़ता है। फिल्म के रोमांच से गुजरते हुए आप अचानक पाते हैं कि अंत में सारे संदिग्ध एक कमरे में बैठ गए हैं और हत्याओं के रहस्य से अचानक पर्दा उठ जाता है।
कहानी के तमाम सिरों को लेखक-निर्देशक मनीष गुप्ता ने सावधानी से बांधा है। केके मेनन का परफॉरमेंस शानदार है। आशीष विद्यार्थी और टिस्का चोपड़ा भी अपने रोल में जमे हैं। फिल्म कहीं ढीली नहीं पड़ती। इस साल ही यह पहली फिल्म है जो दर्शकों की रुचि शुरू से अंत तक बनाए रखती है।