निर्माताः सोनी पिक्चर्स/एकता कपूर
निर्देशकः एंथनी डिसूजा
सितारेः इमरान हाशमी, प्राची देसाई, नरगिस फाखरी, लारा दत्ता, कुणाल रॉय कपूर
रेटिंग**
अजहर के अंतिम दृश्य को देखते हुए एक कहावत याद आती हैः चित भी मेरा पट भी मेरा और अंटा मेरे बाप का। हारने के लिए बुकी से पैसे लेने के बाद हीरो अजहर (इमरान हाशमी) मैदान में तड़ातड़ चौके-छक्के मारते हुए मैच जीत जाता है! इसके बाद वह फोन पर बुकी से कहता है कि हां मैंने पैसे लिए थे। इसलिए लिए थे कि तू टीम के किसी दूसरे खिलाड़ी के पास इन्हें भेजकर उसे भ्रष्ट न कर दे। मैच खत्म, मैंने पैसे वापस भिजवा दिए।
इसके बाद हीरो की आवाज दर्शकों से मुखातिब होती है, ‘यही थी मेरी कहानी, अगर आप इसे सच मानना चाहें तो आपकी मर्जी और न मानना चाहें तो आपकी मर्जी।’ देश के लिए खेलने और खाने का यह कमाल का अंदाज है।
भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन की जिंदगी की घटनाओं पर आधारित यह फिल्म कुल मिला कर उनकी कमीज चमकाने का प्रयास है। फिल्म से पहले दर्शक से कहा जाता है कि अजहर के अलावा यहां सब काल्पनिक है। अन्य खिलाड़ी, कोरबारी घराने, खेल संस्था। किसी को कलंकित करने का उद्देश्य नहीं है। आप अपनी समझ जेब में रखिए।
मैच फिक्सिंग में फंसे अजहर की कहानी मोहम्मद अजहरुद्दीन की जिंदगी के सार्वजनिक तथ्यों पर आधारित है। इसमें विवाहेतर संबंध और बॉलीवुड का तड़का भी है। एक हीरोइन (नरगिस फाखरी) अजहर के दिल में उतरती है, मगर साफ कहती है कि वह शादीशुदा मर्द से दूर रहेगी। तब भी अजहर का दिल है कि मानता नहीं! उधर सुंदर-सुशील पत्नी (नौरीन) घर-परिवार-बच्चों में इतनी उलझी है कि पति को वक्त नहीं दे पा रही।