तेलुगु सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नागेंद्र बाबू के बेटे और चिरंजीवी व पवन कल्याण के भतीजे वरुण तेज का मामला बड़े परदे पर सेट नहीं हो पा रहा है। ‘गांडीवधारी अर्जुन’ के बाद से उनका जो निशाना भटका है तो इस साल पहले फिल्म ‘ऑपरेशन वैलेंटाइन’ में उनकी उड़ान हिचकाले खाती रही और अब फिल्म ‘मटका’ में भी उनका मामला अटका अटका नजर आ रहा है। वरुण तेज पूरी कोशिश लगा रहे हैं कि किसी तरह वह भी नई पीढ़ी के सितारों यानी प्रभास और अल्लू अर्जुन की तरह पैन इंडिया स्टार बन जाएं लेकिन इसके लिए न तो वह कहानी सही तलाश रहे हैं और न ही सही सेटअप। नोरा फतेही को लेकर कोई फिल्म हिंदी में हिट हो जाएगी, ये सोच ही गड़बड़ है।
फिल्म की कहानी का विस्तार काफी है। मुंबई में रतनलाल खत्री ने जो धंधा कोई पचास साल पहले जमाकर खूब पैसा कमाया, वैसा ही कुछ वासु साउथ में करने निकलता है। इस धंधे तक आने से पहले वासु की कहानी में तमाम ट्विस्ट हैं। मां के साथ वह काम की तलाश में निकलता है। मंजिल उसकी जेल बनती है। वहां से निकलने के बाद वह फिर से काम धंधे की तलाश करता है लेकिन एक दिन एक लोकल नेता से हुई दोस्ती उसकी जिंदगी में तूफान ले आती है। एक तरह दोस्ती है और दूसरी तरफ डॉन से दुश्मनी। वासु पैसा खूब कमाता है। मटका भी चलाता है। पत्नी ये सब छोड़ने को भी कहती है, पर जिसकी जेब में पैसा हो, वो कहां किसी की सुनता है। ऐसा ही कुछ यहां भी है। फिर पुलिस है। अफसर हैं। मारामारी है। और, वही सब कुछ है तो आमतौर पर ऐसी मसाला फिल्मों में होता है।