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फिल्म समीक्षा 'मसान': जीवन और सिनेमा के बीच का सब कुछ

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निर्माताः दृश्यम फिल्म्स
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निर्देशकः नीरज घेवन
सितारेः विकी कौशल, रिचा चड्ढा, श्वेता त्रिपाठी, संजय मिश्रा
रेटिंग **1/2

जीवन एक सिनेमा है। सिनेमा एक जीवन है। जीवन और सिनेमा के बीच जो कुछ हो सकता है निर्देशक नीरज घेवन ने अपनी पहली फिल्म मसान (अ सेलिब्रेशन ऑफ लाइफ, डेथ एंड एवरीथिंग इन बिटवीन) में वह दिखाने की कोशिश की है।

फिल्म में जीवन की कहानी पर उसका दर्शन हावी है। जीवन दर्शन की रेल पर्दे पर धड़धड़ाती गुजरती है और कहानी पुल की तरह थरथराती रह जाती है। अतः अगर आप सिनेमा में मुकम्मल कहानी देखने के आदी हैं तो मसान का अनुभव आपको रास नहीं आएगा।
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फिल्म काशी में एक साथ दो नावों की सवारी करती है। एक कहानी देवी (रिचा चड्ढा) की है, जिसका एक पुरुष मित्र के साथ एमएमएस बन गया है। अब पुलिसवाला देवी और उसके पिता (संजय मिश्रा) को ब्लैकमेल कर रहा है। तीन लाख रुपये नहीं दिए तो वीडियो यू-ट्यूब पर अपलोड कर देगा!

निर्देशक गंभीर विषयों को छूते हुए निकलते हैं

दूसरी कहानी डोम जाति के दीपक (विकी कौशल) की है, जिसे ऊंची जाति की शालू (श्वेता त्रिपाठी) से प्यार हो गया है। स्थिति तब त्रासद हो जाती है जब शालू इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे दीपक की सच्चाई जानकर भी उसका प्यार स्वीकार कर लेती है और तभी एक बस दुर्घटना में परिवार समेत मारी जाती है।

दीपक उसकी चिता को अग्नि देता है। ज्ञानियों ने सदा कहा है कि जीवन एक दुख है। नीरज इसे सवाल के रूप में दोनों कहानियों के बीच धागे की तरह इस्तेमाल करते हैः ‘अबे दुख साला कभी खत्म क्यों नहीं होता?’

उन्होंने जिस धागे से इन कहानियों के सूत्र बांधे हैं वह कच्चा है। तर्क करते ही टूट जाता है। नीरज गंभीर विषयों को छूते हुए निकल भर जाते हैं। कोई विमर्श नहीं दिखता। उनकी कहानियां बहस की मुख्यधारा में शामिल होने या प्रतिरोध उपस्थित करने के बजाय कच्ची गलियों के रास्ते निकल जाती है।
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रिचा चड्ढा करिअर के सबसे बेहतर परफॉरमेंस में

फिल्मकार पलायन को अपनी राह बनाता है। मसान मुख्य रूप से कलाकारों के बेहतरीन अभिनय के लिए याद रहती है। रिचा चड्ढा करिअर के सबसे बेहतर परफॉरमेंस में हैं। कॉमेडी के लिए पहचाने जाने वाले संजय मिश्रा बिल्कुल जुदा संजीदा भूमिका में हैं। विकी कौशल और श्वेता त्रिपाठी असर छोड़ते हैं।

फिल्म के कुछ दृश्य बहुत खूबसूरत हैं। नीरज में संभावनाएं हैं मगर उन्हें मौलिकता की तलाश में थोड़ा और गहरे उतरना होगा। दार्शनिक पलायन के बजाय हकीकत से मुठभेड़ करनी होगी।

मसान देख कर लगता है कि सिनेमा एक दुख है। जबकि सिनेमा ऐसा जादू है जिसमें दुख को भी सुख में बदल देने की ताकत है।
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