जंग की नहीं जवानी की कहानी
मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की ये कहानी उन लम्हों के आधार पर बुनी गई है जो अदिवि ने संदीप के माता पिता के साथ गुजारे। अदिवि बताते हैं कि उनकी इस कहानी में संदीप के जीवन के उन पहलुओं को शामिल करने की कोशिश उनकी रही जिन्होंने उन्हें एक जांबाज और देश प्रेमी फौजी अफसर के रूप में तैयार किया। कहानी खुद अदिवि ने बरसों की मेहनत के बाद तैयार की है। निर्देशक शशि किरण टिक्का इससे बाद में जुड़े और दोनों ने मिलकर फिल्म को इस मुकाम तक पहुंचाया जहां इसे देखने की उत्सुकता भले हर फिल्म दर्शक में न हो लेकिन फिल्म के बारे में जिसने भी पढ़ा या सुना, उसे अदिवि का ये प्रयास सराहनीय लगा। फिल्म ‘मेजर’ एक वॉर फिल्म नहीं है, ये एक भावनात्मक कहानी है, उस इंसान की जिसने देश के लिए अपना तन न्यौछावर कर दिया हालांकि मन उसका अंतिम पलों तक भावुक रहा। कहानी बताती है कि ऊपर से सख्त नजर आने वाले फौजी अफसर भी नाजुक पलों में फैसले दिमाग से नहीं दिल से ही करते हैं।
पटकथा में परफेक्ट नहीं
फिल्म ‘मेजर’ की खूबियां ही इसके कथन की अड़चनें भी हैं। अदिवि और शशि एक शहीद की कहानी दिखना चाहते हैं लेकिन वह ये भी चाहते हैं कि ये शहादत की कहानी सी न लगे। ये मतिभ्रम सरीखा जतन फिल्म को इंटरवल के पहले एक तयशुदा दिशा में आगे नहीं बढने देता है। फिल्म टुकड़ों टुकड़ों में आगे बढ़ती है। फौजी एक्शन भी दिखता है। घर भी लौटती है कहानी। फिर उसकी प्रेमिका को भी साथ लेती है। दर्शक को भी शुरू से पता नहीं है कि फिल्म ‘मेजर’ के नाम पर खरीदी टिकट पर वह क्या देखने वाला है? तो पूरी फिल्म एक ऐसा अनुभव बनती जाती है जिसमें सब कुछ है तो देखा सुना सा लेकिन इसे कहने के तरीके में दर्शक भी डूबता उतराता रहता है।
हौसले और हिम्मत के बीच के जज्बात
लेकिन, फिल्म ‘मेजर’ की कहानी, इसकी पटकथा और इसका निर्देशन असली रंगत में आते हैं इंटरवल के बाद। और, फिल्म का असली तनाव या कहें कि असली कथन भी यहीं समझ में आता है। और, ऐसा इसलिए क्योंकि तब दर्शक अपने जाने पहचाने इलाके में होता है। मुंबई पर आतंकियों का हमला हो चुका है। किसी को कुछ नहीं पता कि होटल के अंदर कहां कितने लोग फंसे हैं, कितने आतंकियों के कब्जे में हैं और आतंकी भी आखिर हैं कहां कहां और कितने? अदिवि शेष का इस फिल्म के लिए व्यक्तिगत समर्पण यहीं दिखता है। उनके चेहरे के भाव वास्तविक दिखने लगते हैं और जब एक्शन की बारी आती है तो वह दर्शकों को अपने साथ साथ होटल के भीतर लिए जाते हैं। फिल्म अदिवि शेष का वन मैन शो कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
सई और शोभिता कमजोर कड़ियां
अदिवि शेष के अलावा फिल्म ‘मेजर’ के बाकी कलाकारों में प्रकाश राज और रेवती ने कमाल का अभिनय किया है। मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के माता पिता के साथ अदिवि शेष ने बहुत समय बिताया है और इन दोनों चरित्रों की बारीकियों में ये मेहनत काम भी आई है। प्रकाश राज खुद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के पिता से परिचित रहे हैं तो ये तथ्य भी उनके अभिनय को वास्तविकता के और करीब लाने में मदद करता है। सई मांजरेकर फिर एक बार गलत किरदार में हैं। हालांकि अदिवि ने हैदराबाद में हुई मुलाकात में बताया था कि उन्होंने कभी संदीप की मित्र से मिलने की कोशिश नहीं की, लेकिन फिर भी उनकी रिसर्च के हिसाब से इस किरदार में दम दिखता है। सई मांजरेकर ऐसे किरदारों के लिए अभी परिपक्व नहीं हैं। सई ने एक सलीके से लिखे किरदार में अच्छा कुछ कर दिखाने का मौका खोया तो शोभिता धूलिपाला का किरदार ढंग से विकसित ही नहीं हुआ है। उनके हिस्से फिल्म में कुछ भी नहीं आया।
तकनीकी रूप से समृद्ध फिल्म
फिल्म ‘मेजर’ के निर्देशन में तमाम खामियां भी हैं। शशि किरण टिक्का पूरी तरह से फिल्म में अदिवि शेष को चमकाने में लगे दिखते हैं। ट्रेनिंग हो या पसीना बहाने की बारी हो, अदिवि शेष को परदे पर खूबसूरत दिखाने का उनका मकसद कई बार अखरता है। हालांकि बाकी किरदारों को भी फोकस में रखने की कोशिश उनकी पूरी है लेकिन उनके हाथ फिल्म की पटकथा से बंधे दिखते हैं। तकनीकी टीम में पी वामसी का सिनेमैटोग्राफी फिल्म के विषय के साथ न्याय करती है। विनय कुमार और के पवन कल्याण का संपादन चुस्त है। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक बहुत शोर नहीं करता है और यही इसकी उपलब्धि है।
देखें कि न देखें
हिंदी भाषी दर्शकों के लिए फिल्म ‘मेजर’ मुंबई आतंकी हमले की एक ऐसी कहानी को देखने का नया नजरिया देती है जिसके बारे में उन्हें ज्यादा पता नहीं है। फिल्म बनी अच्छी है, इसे देखना शुरू करेंगे तो ये अच्छी लगने भी लगती है, बस तय ये करना है कि फिल्म देखने का आपका मकसद क्या है, मनोरंजन या एक अनसुनी कहानी? सिनेमा के पैमाने पर फिल्म पास है, मनोरंजन के पैमाने पर? शायद नहीं।