रीच और फॉलोअर्स में अटकी दुनिया की कहानी
सोशल मीडिया से पैसे कमाना अब एक नया करियर बन चुका है। रंग लगे न फिटकरी रंग भी आवे चोखा, जैसी कहावतें सच हो रही हैं। एक मोबाइल, घर में वीडियो एडिट का एक छोटा सा सिस्टम और बन गए आप सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर। अपनी रीच और अपने फॉलोअर्स बढ़ाने के लिए कोई पैंट उतारकर नाच रहा है तो कोई दूसरों की पोस्ट पर फेक अकाउंट के जरिये कमेंट्स करके अपने दिल की भड़ास निकाल रहा है। नैतिकता और अनैतिकता को भूल चुकी एक पूरी आबादी की फिल्म है ‘लॉगआउट’। बस दिक्कत इस फिल्म के साथ ये है कि इसमें जिस आबादी पर मोबाइल फोन के असर की बात की जा रही है, वही फिल्म में नहीं है।
नेपो किड होकर भी बाहरी दिखने का दबाव
फिल्म ‘लॉगआउट’ जिस एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की कहानी है, उसका किरदार शुरू में ही साम, दाम, दंड, भेद से अपनी इमेज बनाने वाली की बताई जाती है। जिस उत्पाद का उसे होर्डिंग्स पर प्रचार करते दिखाया जाता है, अपने निजी जीवन में वह उसका ठीक उलट करता भी दिखता है। यानी कि उसका नैतिक चरित्र शून्य है। उसूलों पर जब आंच आए तो टकराना जरूरी है, तो अब वसीम बरेलवी से शाहरुख खान ने भी सीख लिया है। यहां मामला बाबिल खान का है। वह किसी तरह अपने ‘बाबा’ इरफान के आभामंडल से बाहर आने की कोशिश कर रहे हैं और यहां फिर एक बार इसमें सफल होते भी दिख रहे हैं। बाबिल पर बहुत दबाव है इरफान की विरासत को संभालने का भी और उनकी तरह न दिखने का भी, बहुत संकट वाली स्थिति है ये।
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धीरज का इम्तिहान लेता बिस्वपति का लेखन
खैर, फिल्म ‘लॉगआउट’ देखते समय धीरज का पहली जरूरत है। इसकी पटकथा ठीक ऊंट की पीठ जैसी हैं। घुटनों पर आते इसे ज्यादा समय तो नहीं लगता लेकिन बैठेगी ये किस करवट, ये इसे लिखने वाले बिस्वपति सरकार भी आखिर तक सोचते ही रहते हैं। बिस्वपति सरकार उस गैंग के लीडर हैं, जिसने टीवीएफ छोड़कर पोशमपा पिक्चर्स नामक कंपनी बनाई है। इस फिल्म को बनाया है जियो का हिस्सा बन चुके वायकॉम18 स्टूडियोज ने। उनका अपना जियो हॉटस्टार एप है। लेकिन, रिलीज ये हो रही है जी5 पर। न्यूटन के पास भी शायद ही इस रचनात्मक गति का कोई नियम रहा हो। लेकिन, क्रिया के बदले प्रतिक्रिया का न्यूटन का सिद्धांत फिल्म में बिस्वपति सरकार ने खूब संभाला है। कहानी में कुछ खास सरप्राइजिंग एलीमेंट तो नहीं है, पर हां, रोचकता इसमें बनी रहती है कि अल्ला जाने क्या होगा आगे.., टाइप्स।
कहानी वही जो ओटीटी को भाए
तो हमारे हीरो का फोन खो जाता है। जिस टैक्सी में उसका फोन खोया है, उसका पता लगाने या उसके ड्राइवर तकनीकी रूप से समृद्ध हो रही पुलिस के सीसीटीवी जाल से तलाश निकालने जैसी कोई कोशिश वह नहीं करता है। ध्यान ये रखना है कि ये नई पीढ़ी का हीरो है। फॉलोअर्स उसके बस एक करोड़ के करीब हुआ ही चाहते हैं और कहानी वहीं से शुरू हो ती है जहां ये अपनी प्रतिद्वंदी से पहले एक करोड़ का आंकड़ा छूना चाहता है। फिर कहानी में एंट्री होती है शाहरुख खान की फिल्म ‘फैन’ जैसे एक फैन की जिसका मकसद भी कुछ कुछ वैसा ही है। हीरो का फोन अब उसके हाथ में है। कहानी ऊपर नीचे हिचकोले खाते हुए वहां तक पहुंचती है, जहां भक्तजन घंटा और घड़ियाल बजाकर बोल सकते हैं, बोलिए, सत्यनारायण भगवान की जै।
बाबिल खान की एक्टिंग के लिए देखिए
जिस एक वजह से ये फिल्म आप शुरू से आखिर तक देख सकते हैं, वह है इसमें बाबिल खान की एक्टिंग। उनका अभिनय इस फिल्म का प्लस प्वाइंट है। पूरी फिल्म में अधिकतर चूंकि वह ही परदे पर दिखते हैं, लिहाजा चुनौती उनके सामने ये है कि वह नाट्यशास्त्र के नौ के नौ रस निभाकर दर्शकों को सिर्फ अपनी मौजूदगी से बांधे रखें। 90 मिनट के करीब की ये फिल्म है। और, सस्पेंस थ्रिलर के चोले में ठीक ठाक फिट बैठती है। निर्माता जोड़ी सौरभ खन्ना और समीर सक्सेना का मामला ‘मामला लीगल है’ से जम चुका है। यशराज फिल्म्स के साथ उनकी ‘डील’ हो चुकी है और ‘लॉगआउट’ जैसी फिल्म बनाकर वह ओटीटी पर रिलीज कर चुके हैं, ये ही इस पूरी कथा का सबसे सही उपसंहार है। फिल्म में पूजा गुप्ते की सिनेमैटोग्राफी नोटिस करने लायक है। हारून गेविन ने फिल्म का टैम्पो बनाए रखने के लिए म्यूजिक ठीक ठाक रचा है, वहां प्रयोग की हालांकि गुंजाइश रही। अमित गोलानी से ‘काला पानी’ के बाद ऐसा ही कुछ रचने की उम्मीद की भी जा रही थी। लेकिन, पोशम पा पिक्चर्स के लिए ये मामला कुछ ज्यादा ही डार्क होता जा रहा है, इसमें बहुत आगे तक की रोशनी दिख नहीं रही, फिलहाल।