मनोज बाजपेयी, दिव्या दत्ता और बोमन ईरानी की 'लास्ट मैन इन टावर' आज यानी 11 सितंबर को थिएटर्स में रिलीज हो गई है। फिल्म का निर्देशन बेन रेखी ने किया है। अगर आप इसे देखने का मन बना रहे हैं, तो पहले जान लीजिए कि ये फिल्म कैसी है।
लास्ट मैन इन टावर
- फोटो : इंस्टाग्राम @thespiritmedia
कहानी
ये फिल्म अरविंद अडिगा की किताब पर आधारित है, जिसका नाम भी 'लास्ट मैन इन टावर' है। कहानी रिटायर्ड टीचर योगेश मिश्रा उर्फ मास्टरजी (मनोज बाजपेयी) की है, जो मुंबई की पुरानी विश्राम को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी में रहता है।
एक रोज बिल्डर धर्मेन शाह (बोमन ईरानी) इस पुरानी सोसायटी को गिराकर उसकी जगह आलीशान टावर 'द शंघाई' बनाने का ऑफर सोसाइटी वालों के सामने रखता है। इसके बदले में वो सोसाइटी वालों को मोटी रकम और बेहतर लाइफस्टाइल देने का वादा करता है। जहां शुरुआत में कुछ लोग इस ऑफर के लिए राजी हो जाते हैं, वहीं कुछ लोग मास्टरजी के साथ इसके विरोध में खड़े रहते हैं, क्योंकि इस घर से उनकी यादें, भावनाएं और अपनापन जुड़ा हुआ है।
लेकिन आखिर तक इस ऑफर के विरोध में रहने वाले मास्टरजी अकेले बच जाते हैं। फिर क्या मास्टरजी अपने सिद्धांतों और अपनी यादों को बचा पाते हैं या इस लड़ाई में उनकी हार हो जाती है? ये तो आपको फिल्म देखकर ही पता चलेगा।
लास्ट मैन इन टावर
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एक्टिंग
मनोज बाजपेयी: फिल्म को मनोज बाजपेयी पूरी तरह लीड करते हैं। पूरी फिल्म इन्हीं के कंधों पर टिकी हुई है। हमेशा की तरह वो इस बार भी आपको निराश नहीं करेंगे। एक मायूस पिता और मिडल क्लास आदमी के इस किरदार को मनोज ने बखूबी निभाया है। न्याय की इस लड़ाई में जहां पूरा खेल इमोशन्स का था, उन इमोशन्स की कमी मनोज ने कहीं भी नहीं खलने दी।
दिव्या दत्ता: दिव्या दत्ता, मास्टरजी की पड़ोसी का किरदार निभाती हैं, जो अपने बेहतर कल के लिए लड़ती नजर आती हैं। उनका किरदार पूरी तरह भावनाओं से घिरा हुआ है। पूरी फिल्म में आपको दिव्या के कई वेरिएशन दिखाई देंगे, जो कहीं ना कहीं आपको भी ये सोचने पर मजबूर करेंगे कि क्या ये सही कर रही है या गलत। एक्टिंग के मामले में दिव्या ने अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी है। वो अपने किरदार के साथ पूरा जस्टिस करती हैं।
बोमन ईरानी, सुकांत गोयल और बाकी स्टारकास्ट: बोमन ईरानी कहानी में बिल्डर के रोल में हैं, जो इस सोसाइटी की जगह एक आलीशान टावर बनाना चाहता है। वहीं सुकांत गोयल फिल्म में मास्टरजी के बेटे के किरदार में हैं। सोसाइटी होने के चलते फिल्म में और भी किरदार हैं, जो इसे पूरा करते हैं। बोमन ईरानी और सुकांत गोयल की बात करें, तो ये ज्यादा समय के लिए स्क्रीन पर दिखते नहीं है, लेकिन जितनी देर भी दिखते हैं, अपने रोल को बढ़िया ढंग से निभाते हैं।
लास्ट मैन इन टावर
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डायरेक्शन
चूंकि फिल्म एक किताब पर आधारित है और इसमें एक मिडल क्लास आदमी का संघर्ष और ड्रामा है, तो फिल्म कोई एक्शन या धमाकेदार सीन्स का वादा नहीं करती है। बेन रेखी ने बेहद सादगी और इमोशन्स के साथ फिल्म को बनाया है, जो दर्शकों तक पहुंचते हैं और कहानी उन्हें छू कर निकलती है।
फिल्म में कोई जादूई एंट्री या हीरो नहीं है। जैसा एक मिडल क्लास आदमी के साथ ऐसी परिस्थितयों में हो सकता है, ठीक उसी तरह फिल्म को दर्शाया गया है। सीधी भाषा में कहें, तो इसमें कोई सजावट करने की कोशिश नहीं की गई है, जो फिल्म की असल ताकत है। इसी वजह से फिल्म की कहानी दर्शकों के साथ जुड़ पाती है।
लास्ट मैन इन टावर
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क्या अच्छा?
- फिल्म में एक बार फिर मनोज बाजपेयी की बेहतरीन एक्टिंग दिखती है, जो पूरी फिल्म को अकेले चलाते हैं।
- वहीं दिव्या के बदलते रंग आपको भी चौंका देंगे।
- सिंपल स्टोरी के साथ ये फिल्म एक बहुत बड़ा संदेश लेकर आती है, जो आखिर में आपको भी झकझोर देगी।
- नैतिकता और मूल्यों की इस लड़ाई में आप भी सोचने को मजबूर हो जाएंगे कि फिल्म कहीं ना कहीं सच्चाई दर्शा रही है।
- परिवार, समाज और बाहरी दुनिया...कितनी बाहरी है? ये आपको इस फिल्म को देखने पर पता चलेगा।
क्या बुरा?
- चूंकि फिल्म एक ड्रामा पर आधारित है और इसमें कोई एक्स्ट्रा सजावट नहीं है, तो ये धीमी रफ्तार पर चलती है।
- कहीं-कहीं पर फिल्म काफी स्लो लगती है और बोरियत पैदा कर सकती है।
लास्ट मैन इन टावर
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देखें या नहीं?
अगर आप एक एक्शन पैक फिल्म के फैन हैं, तो ये आपके लिए नहीं है। फिल्म पूरी तरह से फ्लैट पिच पर चलती है। इसमें कोई उत्साह या जोश भरने वाले तत्व नहीं है, जो आपको रोमांच करे। लेकिन अगर आप मनोज बाजपेयी की एक्टिंग के फैन हैं, तो ये फिल्म आपको देखनी चाहिए।
वहीं आप एक ऐसा ड्रामा देखना चाह रहे हैं, जो समाज से जुड़ा हो और जिसमें कोई संदेश छिपा है, तो भी ये आपको निराश नहीं करेगी। बस आपको सब्र बनाए रखना होगा।
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