फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Kooki Movie Review: हिंदी सिनेमा को मिली कम उम्र की बेहतरीन अदाकारा, रितिशा का अभिनय ‘कूकी’ का असली करिश्मा

विज्ञापन
कूकी - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
Movie Review
कूकी
कलाकार
रितिशा खाउंद , बोधिसत्व शर्मा , राजेश तैलंग , नैन्सी सिंह , दीपानिता शर्मा , देवलीना भट्टाचार्जी और रितु शिवपुरी आदि
लेखक
जुन्मोनी देवी खाउंद और प्रणव देका
निर्देशक
प्रणव देका
निर्माता
जुन्मोनी देवी खाउंद
रिलीज:
27 जून 2024
रेटिंग
3/5

क्षेत्रीय सिनेमा को यदि संबंधित क्षेत्र की नैसर्गिक सुंदरता के साथ परदे पर उतारा जाए तो उसका रिश्ता दर्शकों से सीधे जुड़ता है। वातावरण को सिनेमा का हिस्सा बनाना बहुत जरूरी शुरू से रहा है। चार्ली चैपलिन की फिल्में इसीलिए लोग बहुत पसंद करते थे। डिज्नी की एनीमेशन फिल्मों में भी इस पर बहुत ध्यान दिया जाता है। भारतीय सिनेमा में वातावरण को कहानी की आत्मा बना देने का काम कमर्शियल सिनेमा में भी खूब हुआ और कलात्मक सिनेमा में भी। रमेश सिप्पी की ‘शोले’ का रामगढ़ हो या फिर मणिरत्नम की ‘रावण’ का दंडकारण्य, वातावरम ने कहानियों को करिश्माई बनाने की पूरी कोशिश की। असम में बनी हिंदी फिल्म ‘कूकी’ भले अपने नाम के चलते उत्तर पूर्व की एक समस्या की तरफ ही ध्यान ले जाती हो लेकिन यहां कूकी एक बच्ची का नाम है। वातावरण को कहानी का हिस्सा बना देने का काम यहां फिल्म के निर्देशक और तकनीकी टीम ने बहुत अच्छे से किया है।

विज्ञापन

कूकी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘कूकी’ उन सारी किशोरियों व युवतियों को देखनी चाहिए जो अभिनय में अपना करियर बनाना चाहती हैं। हाल के बरसों में फिल्मी परिवारों से आई अभिनेत्रियों में आलिया भट्ट को छोड़ दें तो अनन्या पांडे से लेकर सारा अली खान तक का अभिनय अधिकतर फिल्मों में बहुत दयनीय रहा है। लेकिन, फिल्म ‘कूकी’ में शीर्षक रोल निभाने वाली किशोरी रितिशा ने अपनी पहली ही फिल्म में अभिनय की एक लंबी लकीर खींची है। सिर्फ इस एक अभिनेत्री की वजह से ये पूरी फिल्म अपना असर दर्शकों पर छोड़ने मे कामयाब रहती है। फिल्म में कलाकार और भी प्रभाव छोड़ने में सफल रहे हैं लेकिन फिल्म का नाम ही चूंकि इस कहानी के मुख्य किरदार पर है तो पहले उसी की बात।

कूकी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कूकी एक किशोरी है। पिता वकील हैं। माता भी खुले विचारों की है। दोनों ने प्रेम विवाह किया है। दोनों पहली बार जब अपनी बच्ची को एक किशोरवय लड़के के साथ देखते हैं तो थोड़ा असहज तो दिखते हैं लेकिन बेटी के साथ बातें करके उसके मन की बात जानने की कोशिश भरसक करते हैं। बेटी भी ज्यादा कुछ छुपाती नहीं है क्योंकि उसे खुद भी नहीं पता कि उसका ‘क्रश’ अब प्यार में बदल चुका है और प्यार से मिलने की बेचैनी में ही उसका जीवन हमेशा के लिए बदल जाता है। कूकी के साथ बीच रास्ते हादसा होता है और रास्ते के पास ही उसके साथ होती है हैवानगी। पुलिस सक्रियता दिखाती है। अपराधी पकड़े जाते हैं। कानून भी सक्रियता दिखाता है और तीन महीने के भीतर ही सबको सजा भी हो जाती है। लेकिन, फिर...? क्या बलात्कार के किसी मामले की इतिश्री बस यहीं हो जाती है?

कूकी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘कूकी’ सजा मिलने के बाद के समय पर ज्यादा फोकस रखती है। फिल्म का लेखन इसी क्रम से किया गया है कि इसका क्लाइमेक्स अदालती फैसले पर आकर ही न रुक जाए। बच्ची को दुकानों पर अब भी घूरते लोगों और इन घूरते लोगों की निगाहों से बेचैन होती किशोरी। जिस बारिश में वह अपना पहला चुंबन करने की ख्वाहिश रखती थी, वही बारिश अब उसे तेजाब लगती है। जिसका हाथ भर थामने से उसे सुकून मिलता था, उसी दोस्त का औचक स्पर्श भी उसमें घिनाने जैसी भावनाएं ले आता है। बेटी कहती भी है कि ये जो उसके साथ रोज रोज होता है, वह क्या किसी बलात्कार से कम है। उसका जीवन को देखने का नजरिया बदल चुका है। प्रेम में उसका विश्वास नहीं रहा। सहानुभूति से उसे डर लगता है और स्पर्श तो यूं लगता है कि जैसे फिर कोई बलात्कार की कोशिश कर रहा है।

कूकी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
प्रणव जे डेका निर्देशक फिल्म ‘कूकी’ खत्म होने के बाद अपना इरादा भी स्पष्ट करती है। फिल्म जिस सामाजिक संदेश के प्रचार प्रसार के लिए बनी है, उसमें मुख्यधारा की किसी अभिनेत्री को ला पाना नाकों चने चबाने जैसा ही होता। शायद इसीलिए फिल्म की निर्माता जून्मोनी ने अपनी बेटी को इस फिल्म की हीरोइन बनाया है और रितिशा ने वाकई फिल्म में बहुत ही दमदार तरीके से काम किया है। जुन्मोनी बताती हैं कि फिल्म जब शुरू हुई तब वाकई रितिशा 16 साल की ही थीं और अब जाकर वह 18 की हो पाई हैं। रितिशा ने प्रेम के पहले प्रकटन से लेकर बलात्कार के बाद लोगों की निगाहों से ही बेचैन हो जाने वाली किशोरी तक का किरदार बहुत ही शानदार तरीके से निभाया है। आलिया भट्ट के बाद हिंदी सिनेमा को मिली वह दूसरी किशोरवय अदाकारा हैं।
विज्ञापन

कूकी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
असम में बनी और असम के ही रंग में रंगी हिंदी फिल्म ‘कूकी’ में बोधिसत्व ने सप्तऋषि के किरदार में अपना चिर परिचित सहज अभिनय दोहराया है। बिना किसी दोष के जब जमाना उसे गुनहगार की तरह घूरता है तब उसका असहज होना काफी मार्मिक बन पड़ा है। राजेश तैलंग दमदार कलाकार हैं। बलात्कार की शिकार एक बेटी के वकील पिता के किरदार में उनके हक में तमाम तालियां आती हैं। दीपानिता और रितु शिवपुरी को अरसे बाद पड़े परदे पर देखना सुखद रहा। फिल्म का संगीत भी प्रभावशाली है। कहानी के धरातल के अनुसार ही इसके गाने और इसका पार्श्वसंगीत रचने से फिल्म का प्रभाव कई गुणा बढ़ गया है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी शानदार है और संपादन काफी चुस्त। फिल्म का जो विषय है, उसके हिसाब से इसे न सिर्फ पूरे देश में टैक्सफ्री किया जाना चाहिए बल्कि किशोरवय बच्चों के समूहों को ये फिल्म दिखाने की व्यवस्था स्कूलों को भी करनी चाहिए।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें