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Maharaj Movie Review: ये बात फिर से समझाने का शुक्रिया, जुनैद!, कि वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीड़ पराई जाणे रे

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महाराज रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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Movie Review
महाराज
कलाकार
जुनैद खान , जयदीप अहलावत , शालिनी पांडे , शरवरी वाघ , जय उपाध्याय , स्नेहा देसाई , विराफ पटेल , धर्मेंद्र गोहिल , संजय गोराडिया और माहेर विज
लेखक
विपुल मेहता और स्नेहा देसाई (सौरभ शाह की पुस्तक ‘महाराज’ पर आधारित)
निर्देशक
सिद्धार्थ पी मल्होत्रा
निर्माता
आदित्य चोपड़ा
ओटीटी
नेटफ्लिक्स
रिलीज
21 जून 2024
रेटिंग
4/5

जनाब जुनैद खान साहिब,

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अस्सलाम अलैकुम! बाद सलाम के मालूम हो कि यहां सब खैरियत से है और आपकी खैरियत खुदा बंद करीम से नेक चाहते हैं। दीगर अहवाल ये है कि ये जो पहली लाइन अभी इस रिव्यू में मैंने आपके लिए लिखी, ये मैंने अपने पड़ोसियों के खत लिखते समय कक्षा सात में तब सीखी थी जब हमारी पढ़ाई हसरत मोहानी के जिले उन्नाव के कस्बे फतेहपुर चौरासी में हो रही थी। गंगा जमनी तहजीब के उसी उन्नाव के पड़ोसी जिले हरदोई के आपके बाबाजान है, और जिनकी बेगम जीनत यानी आपकी दादी की 90वीं सालगिरह पर फिल्म ‘महाराज’ देखने के तुरंत बाद पहली बार हम आपने सामने मिले और एक दूसरे का हाथ देर तक थामे रहे। माशाअल्लाह, क्या जवान हुए हैं आप! उस दिन के जश्न में खलल यूं पड़ा कि अगले दिन रिलीज होने वाली फिल्म अब जाकर रिलीज हो पाई है। खैर, देर आयद दुरुस्त आयद..!

महाराज रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
जुनैद, आपने अपनी पहली ही फिल्म में अदाकारी की नई मिसालें बना दी हैं। एक पत्रकार का किरदार करना, वह भी ईमानदार पत्रकार का किरदार करना आसान नहीं है। जब बेवकूफी को देशभक्ति मान लिया जाए, वैसे दौर में बुद्धिमान होना खतरे से खाली नहीं होता। लेकिन, आपने जिस बहादुरी से फिल्मी परदे पर पहली बार उतरने के लिए ये किरदार स्वीकार किया, उसके लिए दाद देने का मन बार बार करता है। जाहिर है कि इस फैसले में आपके वालिद आमिर खान की भी रजामंदी जरूर ही रही होगी। और, उनको इस बात पर भी काफी फख्र रहा होगा कि उनका बेटा अपनी पहली ही फिल्म में गुजरात की धरती से निकले एक ऐसे समाजसुधारक का किरदार करने जा रहा है, जिसने खुद से पहले परिवार, परिवार से पहले समाज और समाज से पहले अपने वतन की हिफाजत करने को ही अपना धर्म माना। ऐसा ही वहां से निकले तकरीबन सारे समाज सुधारक अब तक करते रहे हैं।
 

महाराज रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
जैसा कि ये फिल्म ‘महाराज’ बताती भी है, ये असल घटना गुजरात के एक और लाल यानी साबरमती के संत मोहनदास करमचंद गांधी के जन्म के सात साल पहले की है। तब तो शायद कोई गाता भी नहीं रहा होगा साबरमती के आसपास कि ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीड़ पराई जाणी रे...!’ लेकिन, अब के वैष्णव तो सारे इस भजन का मर्म जानते हैं। साल 1862 में  नागपुर से लेकर कच्छ की खाड़ी तक सब एक ही धरती थी। ये तो बाद में मराठी और गुजराती के चक्कर में महाराष्ट्र और गुजरात बने। तभी तो बंबई में सुप्रीम कोर्ट हुआ करता रहा होगा, जिसमें आपके किरदार करसनदास मुलजी पर मानहानि का मुकदमा चला। बिरला ही रहा ये केस कि जिसने केस किया वह हार गया और जिस पर केस हुआ, उसे अदालत ने न सिर्फ बाइज्जत बरी किया बल्कि मुकदमा लड़ने में खर्च हुए पैसे भी दिलाए!

महाराज रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
‘महाराज’ जैसे बाबाओं के भक्तों को शायद यही बात नागवार गुजरी होगी। बिटिया ने हमारी कानून की पढ़ाई की है और कानून पढ़ने वालों को पढ़ाया भी है। बिटिया अभी विदेश में हैं लेकिन उसके साथ के पढ़ने वाले बताते हैं कि कानून की क्लासों में ‘महाराज लिबेल केस’ भी कभी पढ़ाया जाता था। अभी ताजा केस में भी कहा गया कि मामला धर्म से जुड़ा है, इसलिए संवेदनशील है। हालांकि होना इसका उल्टा चाहिए था कि ऐसे संवेदनशील मामलों को धर्म की चर्चाओं के बीच बार बार हर बच्चे को सुनाया जाना चाहिए ताकि वे बड़े होकर जब भक्त बनने लायक उम्र के हों तो उन मठाधीशों से दूर रहें जो धर्म की अपने मंतव्य के अनुसार व्याख्या करने लग जाते हैं। भला हो जेम्स बॉन्ड बने डेनियल क्रेग का, जिन्होंने आज के बच्चों को अपनी फिल्म में बता दिया, ‘हिस्ट्री इजन्ट काइंड टू मेन हू प्ले गॉड!’ और, यही फिल्म में जयदीप अहलावत के किरदार ‘महाराज’ के साथ होता भी है।
 

महाराज रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
जयदीप अहलावत ने हिंदी सिनेमा में इरफान खान की जगह ले ली है, मैंने फिल्म ‘थ्री ऑफ अस’ के रिव्यू में ऐसा लिखा था। लेकिन, ‘महाराज’ में वह इससे आगे निकले हैं। शालिनी पांडे और शरवरी वाघ जैसी दो दमदार अदाकाराएं भी हैं फिल्म में, लेकिन ये बात जयदीप अहलावत का किरदार समझने का समय ही नहीं देता। हाथ में आए हर मौके पर अपनी मर्दानगी दिखाने को बेकररार ये बाबा अपनी स्त्रैण्य लीलाओं से बेटियों को लाडली बनाता है। भगवान कृष्ण की धरती पर उनकी जैसी ही छवि अपनाने की नकल करता एक बाबा ऐसा करता रहा होगा, सुनकर लगता है कि इसके पहले किसी ने कानों में पिघला सीसा क्यों नहीं उड़ेल दिया। लेकिन, क्या ही करते हैं यहां के भक्त? ‘महाराज लिबेल केस’ से कुछ सीखा होता तो जोधपुर के पी सी सोलंकी को क्या ही जरूरत पड़ती यहीं के एक और बाबा आसाराम के खिलाफ ऐसा ही एक और केस लड़ने की।
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महाराज रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

जुनैद मियां, इस देश में जब तक आसाराम और महाराज जैसे बाबाओं को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाने वाले पी सी सोलंकी और करसनदास मुलजी जैसे ईमानदार समाजसेवी मौजूद हैं, ये देश ईद और दिवाली साथ मिलकर मनाता रहेगा। सोलंकी ने भी अपने केस में देश के दिग्गज से दिग्गज वकीलों को धरती चुमा दी पर आसाराम को राम का नाम और बदनाम नहीं करने दिया। मसला कितना भी कठिन क्यों न हो, समाज को राह दिखाने के लिए ‘सिर्फ एक ही बंदा काफी है!’ और, ऐसा एक बंदा हर दौर में होता रहे बस इतनी शक्ति ही दाता हम सबको बार बार देता रहे। यशराज फिल्म्स ऐसी ही फिल्में आगे भी बनाता रहे। आमिर खान जैसे पिता अपने बेटों को अपने करियर से ज्यादा अपनी रूह की बात सुनने की छूट देते रहें। खैर, अपना ख्याल रखना जुनैद मियां, क्योंकि आप बेटे आमिर खान के हैं..!! खुदा हाफिज..!

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