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Kesari Veer Review: सूरज पंचोली की कमबैक फिल्म पर ‘छावा’ का साया, पढ़िए क्यों नहीं पनप पाई गाथा ‘केसरी वीर’ की

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'केसरी वीर' मूवी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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Movie Review
केसरी वीर
कलाकार
सूरज पंचोली , आकांक्षा शर्मा , सुनील शेट्टी , अरुणा ईरानी और विवेक ओबेरॉय आदि।
लेखक
क्षितिज श्रीवास्तव और कानू चौहान
निर्देशक
प्रिंस धीमान
निर्माता
कानू चौहान
रिलीज:
23 मई 2025
रेटिंग
1.5/5

कभी आपने सोचा है उस स्थिति के बारे में जब आपको रिलीज से पहले फिल्म देखने बुलाया जाए और फिल्म खत्म होने के तुरंत बाद वहीं एग्जिट गेट पर फिल्म से जुड़ा कोई शख्स आपका रिव्यू वसूलने के लिए तैनात मिले! फिल्म अच्छी हो तो फिर तो खैर कोई बात ही नहीं, असल मुसीबत तब आती है जब फिल्म ‘केसरी वीर’ जैसी हो। गनीमत यही रही कि मैं फिल्म के प्रीमियर पर किन्हीं कारणवश जा नहीं पाया और सामान्य दर्शकों के साथ देखने का आनंद यही रहता है कि सब बिना किसी की परवाह किए फिल्म के बारे में सारी बात सच्ची सच्ची वहीं इंटरवल में हल्के होते हुए हल्की कर देते हैं। फिल्म ‘केसरी वीर’ अति उत्साह की मारी हुई फिल्म है। कानू चौहान ने अपनी ही लिखी कहानी पर अपना ढेर सारा पैसा लगाकर ये फिल्म बनाई है। पैसा खूब लगा है, ये फिल्म देखते हुए दिखता भी है, लेकिन कैसे लगा है, इसका सर्टिफिकेट भी ये फिल्म खुद ही है।

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'केसरी वीर' मूवी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
किस्सा सौराष्ट्र के सपूत का
राजस्थान और गुजरात की धरती वीरता और त्याग की कहानियों से सजी हुई है। इन कहानियों को जब बड़े पर्दे पर लाया जाता है, तो दर्शकों को उम्मीद होती है कि उन्हें न सिर्फ इतिहास की झलक मिलेगी, बल्कि भावनाओं, रोमांच और प्रेरणा से भरपूर एक यादगार अनुभव भी मिलेगा। लेकिन कभी दर्शकों को मिलते हैं यशराज फिल्म्स के ‘सम्राट पृथ्वीराज’ तो अब मिले हैं चौहान स्टूडियो के ‘केसरी वीर’। सौराष्ट्र के लोगों ने अपने प्राणों की आहुति देकर सोमनाथ मंदिर को जफर ख़ान जैसे क्रूर आक्रमणकारी से बचाने की जो कोशिश की, उसकी ये कहानी है। लेकिन, कहानी को कन्विंसिंग बनाने के लिए जिस मेहनत की यहां जरूरत थी, वह दिखती नहीं है। न तकनीशियनों में और न ही कलाकारों में।

'केसरी वीर' मूवी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
केसरिया विचार की कमजोर कहानी
केसरिया रंग शुरू से वीरता का प्रतीक रहा है। सनातन में धर्म ध्वजा भी इसी रंग की होती रही है और इसीलिए इस रंग का अपमान परदे पर शाहरुख खान की फिल्म में भी लोग बर्दाश्त नहीं कर पाए थे। बाद में अयान मुकर्जी ने ‘केसरिया तेरा इश्क है पिया’ भी बजाया और अक्षय कुमार की फिल्म ‘शंकरा’ की जब हाइप बनती नहीं दिखी तो उन्होंने भी अपनी एक पुरानी फिल्म ‘केसरी’ के डीएनए से जोड़कर इसका नाम कर दिया ‘केसरी 2’। ‘केसरी वीर’ और ‘केसरी 2’ की रिलीज में ज्यादा दूरी भी नहीं रखी गई और अधिकतर दर्शक तो इसी बात से कन्फ्यूज हैं कि दोनों फिल्मों में आखिर रिश्ता क्या है? जाहिर है कि रिश्ता कुछ नहीं है। ‘केसरी वीर’ उस हमीरजी गोहिल की कहानी है जिसने जफर खान को सोमनाथ तक पहुंचने से पहले ललकारा। ‘केसरी 2’ जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद की काल्पनिक कहानी है। 

'केसरी वीर' मूवी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
प्रिंस धीमन ने फैला दिया रायता
फिल्म ‘केसरी वीर’ की कहानी का विचार अद्भुत है। यह देश के लिए, धर्म के लिए और अपनी आन के लिए न्यौछावर हो जाने की कहानी है। फिल्म के निर्माता कानू चौहान ने खुद ये कहानी लिखी और उस कहानी पर पटकथा लिखने का मौका मिला क्षितिज श्रीवास्तव को। लेकिन, पटकथा ने ही इस फिल्म में दिमाग का दही किया है और इस दही का रायता पूरी फिल्म में फैलाते रहे हैं फिल्म के निर्देशक प्रिंस धीमान। प्रिंस का निर्देशन उनके टेलीविजन सीरियलों जैसा ही है। उन्हें टीवी और फिल्म की फ्रेमिंग का मूल अंतर नहीं पता है। वह सब कुछ कैमरे के पास होते हुए दिखाना चाहते हैं। लॉन्ग शॉट्स में उनका कथा संतुलन दृश्य संतुलन से मैच नहीं कर पाता है। फिल्म की दूसरी कमजोर कड़ी फिल्म की पटकथा के बाद फिल्म का निर्देशन ही है। 

'केसरी वीर' मूवी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अति नाटकीयता के शिकार हुए कलाकार
इसके बाद आती है बात भगवान सोमनाथ के मंदिर की। देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल इस मंदिर तक खूब भक्त आते हैं। आजादी के बाद उस समय के गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इसका खूब श्रृंगार कराया। अब भी मुगलों की बात चलती है तो सोमनाथ को 17 बार लूटे जाने का जिक्र आ ही जाता है। यहां भी फिल्म का असल मुद्दा यही है। लेकिन जफर खान की हम्मीर गोहिल से लड़ाई दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ नहीं पाती। आम दर्शकों ने दोनों का नाम ही नही सुना इससे पहले। बीच में कहानी हम्मीर और राजल के प्रेम की भी आती है। इतनी गंभीर बात के बीच प्रेम के सुर बजते ही फिल्म बहक लेती है। उसे फिर से पटरी पर लाने के लिए भीलों के सरदार बने सुनील शेट्टी भी हैं लेकिन उनका आभा मंडल अब किसी फिल्म को समेट कर रख पाने जितना बचा नहीं है सिनेमा में। यही हाल अभिनेता विवेक ओबेरॉय का है, वह एक बार फिर अति नाटकीयता का शिकार हो गए हैं।
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'केसरी वीर' मूवी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सूरज पंचोली की मेहनत काबिले तारीफ
तमाम लोग ये फिल्म सूरज पंचोली के लिए देख रहे हैं। उनकी निजी जिंदगी में छाए रहे काले बादलों के बाद अब उनका रूप कैसा चमका है, ये सब देखना चाहते हैं। जिस मानसिक हालात से उबर कर सूरज ने ये फिल्म की है, वैसे में उनकी वापसी की तारीफ की जानी चाहिए। इस युवक ने जिंदगी से दो दो हाथ किए हैं। लेकिन, कमबैक के लिए उन्हें जिस तरह की फिल्म चुननी चाहिए थी, वैसी फिल्म ये नहीं है। कथा, पटकथा, निर्देशन के अलावा फिल्म अपने संगीत में भी खास कमाल दिखाने से चूक गई है। हालांकि इसके लिए मोंटी शर्मा जैसे दिग्गज का नाम यहां शामिल है। फिल्म की एक और बड़ी कमजोर कड़ी है इसके विजुअल इफेक्ट्स। कंप्यूटर ग्राफिक्स बहुत ही बिगिनर लेवल के लगते हैं और इनका संपादन भी चुस्त नहीं है। एक महागाथा बन सकने लायक विचार को दोयम दर्जे की राइटिंग और बहुत ही पठार निर्देशन ने फिल्म ‘केसरी वीर’ में मार दिया है।

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