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Kathal Review: राधिका से गिरा नेटफ्लिक्स अब सान्या में अटका, एकता के चक्कर में रुचिका कपूर की बोहनी खराब

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कटहल रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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Movie Review
कटहल
कलाकार
सान्या मल्होत्रा , अनंत वी जोशी , गुरपाल सिंह , विजय राज , राजपाल यादव , ब्रजेंद्र काला और नेहा सराफ
लेखक
यशोवर्धन मिश्रा और अशोक मिश्रा
निर्देशक
यशोवर्धन मिश्रा
निर्माता
एकता कपूर , गुनीत मोंगा और अचिन जैन
रिलीज
18 मई 2023
रेटिंग
1/5

नेटफ्लिक्स की क्रिएटिव टीम का हिंदुस्तान से कनेक्शन अब तक बन नहीं पा रहा है। हो सकता है एकता कपूर की शागिर्द रहीं रुचिका कपूर शेख के आने से हालात कुछ बदलें लेकिन 31 साल की एक लड़की को पुलिस इंस्पेक्टर के रोल में दिखाने की हिम्मत भी कमाल से कम नहीं है। और, वह खुद बता रही है कि वह यूपी पुलिस में कांस्टेबल की तरह भर्ती हुई थी। ‘आउट ऑफ टर्न’ प्रमोशन जैसा काम करने की उसकी पृष्ठभूमि बताई नहीं गई है फिल्म में। और, एक कांस्टेबल को इंस्पेक्टर तक साधारण प्रमोशन के जरिये पहुंचना द्रोणागिरी पर्वत पर संजीवनी बूटी तलाश लेने से कम नहीं है। साधारण दशा में एक कांस्टेबल को हेड कांस्टेबल बनने में ही 20 साल लग जाते हैं। फिर 8-10 साल दारोगा बनने में और उसके बाद रिटायरमेंट तक भी उसके इंस्पेक्टर बनने के आसार वैसे ही हैं जैसे पीछे वाले वाक्य का मुहावरा कहता बताता है।

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कटहल रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिर जाति का चक्कर और गायब लड़कियां
प्राइम वीडियो की हालिया रिलीज सुपर स्लो सीरीज ‘दहाड़’ की तरह यहां भी पुलिसवाली निचली जाति की है। विधायक की कालीन पर जूते पहनकर खड़े हो पाने तक की उसकी शख्सियत नहीं बन पाई है। लड़कियां यहां भी थोक के भाव में खो रही हैं। लेकिन कहानी के इस असल मुद्दे पर आने से पहले आजम खां की भैंस चोरी का प्रकरण, यहां कटहल चोरी बनकर प्रकट होता है। अपने जाति नाम से अपने ही सीनियर द्वारा पुकारी जाने वाली ये इंस्पेक्टर अपने मातहत एक ऊंची जाति के हवलदार के प्रेम में तब से है जब दोनों मुरादाबाद पुलिस ट्रेनिंग स्कूल से बाहर निकले थे। तब वह भी हवलदार ही थी। चोरी गए दो खास नस्ल के कटहल तलाशने के बीच दोनों की प्रेम कहानी भी चलती रहती है।

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'कटहल' फिल्म की प्रेस कॉन्फ्रेंस - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
महंगा सब्सक्रिप्शन, सस्ती फिल्म 
इस बात में कोई शक नहीं कि फिल्म ‘कटहल’ जैसी फिल्म बनाने के लिए भी मजबूत गुर्दा चाहिए होता है और चाहिए होता है एक ऐसा प्रोड्यूसर जो सामाजिक व्यंग्य के नाम पर ऐसी किसी फिल्म को ओटीटी में बैठे अपने किसी ‘परिचित’ से हरी झंडी दिला सके। इसके बाद बाकी सब अपने आप हो जाता है। नेटफ्लिक्स ने बीते साल अपनी भारतीय स्लेट घोषित करने के दौरान इस फिल्म का भी खूब हल्ला मचाया था। उस ऐलानिया दिन की बाकी सारी फिल्में व सीरीज तो तकरीबन तकरीबन सब रिलीज हो चुकी हैं, बस ये ‘कटहल’ ही कहीं अटका हुआ था। इस तरह की फिल्म बिना सब्सक्रिप्शन मुफ्त में माल दिखाने वाले ओटीटी के लिए तो ठीक है लेकिन हर महीने साढ़े छह सौ रुपये वसूलने वाले नेटफ्लिक्स जैसे ओटीटी के नाम पर ये धब्बा है।

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कटहल रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
ओटीटी की नई राधिका आप्टे
राधिका आप्टे से गिरे सान्या मल्होत्रा में अटके नेटफ्लिक्स के लिए भी ये सोचने समझने का समय है। एकता कपूर और गुनीत मोंगा इसी चेहरे के नाम पर उनको अब तक दो फिल्में चिपका चुकी हैं। भागते भूत की लंगोटी लपकने को बीच में करण जौहर भी ‘मीनाक्षी सुंदरेश्वर’ में सान्या मल्होत्रा नाम का क्रेडिट कार्ड भुना चुके हैं। सान्या मल्होत्रा को इन ओटीटी फिल्मों से पैसे भी खूब मिल रहे होंगे लेकिन उनके प्रशंसकों को उनके अभिनय में ताजगी के नाम पर कुछ नहीं मिल रहा। वह अब भी वहीं अटकी हैं जहां अनुराग बसु ने उन्हें ‘लूडो’ में छोड़ा था। बतौर कलाकार उनके भीतर शुरू शुरू में तो काफी ऊर्जा भी दिखी लेकिन अब सान्या मल्होत्रा किरदार में कम और किरदार में सान्या मल्होत्रा ज्यादा नजर आती है। संभलने का वक्त है, सान्या! थियेटर से गिरने वालों को तो ओटीटी में ठौर है लेकिन ओटीटी से खिसके तो कहां जाएंगे?

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कटहल रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
विजय राज और गुरपाल ने किया निराश
वैसे ओटीटी नाम की इस संजीवनी का जितना फायदा मनोज बाजपेयी और पंकज त्रिपाठी जैसे कलाकारों को हुआ है, उतना फायदा हाशिये पर पहुंची महिला कलाकारों में कम का ही हुआ है। एक शेफाली छाया को छोड़ दें तो अपनी अदाकारी का असली दम दिखाने को इस माध्यम का उपयोग किसी दूसरी महिला अदाकारा ने किया नहीं। विद्या बालन ओटीटी पर आईं जब उनकी फिल्में थियेटर में बिकनी बंद हो गईं। तापसी पन्नू का भी यही हाल है और ये कतार बस यही नहीं रुकती। फिल्म ‘कटहल’ में इस मौके का फायदा राजपाल यादव ने उठाया है। बेहूदे से गेटअप में पत्रकार वह अच्छे बने हैं। ओवरएक्टिंग से भी उन्होंने खुद को बचाया है। हां, विजय राज का किरदार बहुत चुभता है। ‘छुपा रुस्तम’ वाले गुरपाल सिंह भी 56 इंची तोंद के साथ पुलिस अधीक्षक के पद पर अटके हुए हैं। फोरेंसिक एक्सपर्ट के किरदार में ब्रजेंद्र काला और हवलदार बनीं नेहा सराफ ने भी निर्देशक का कहा पूरा कर दिया है।
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कटहल रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सामाजिक व्यंग्य के नाम पर प्रहसन का प्रदर्शन
सामाजिक व्यंग्य पर सिनेमा बनाना सबसे मुश्किल काम है। ऋषिकेश मुखर्जी की लीक पकड़े पकड़े अक्सर कब निर्देशक डेविड धवन हो जाता है, खुद उसे पता नहीं चलता। यही हादसा फिल्म ‘कटहल’ में यशोवर्धन मिश्रा के साथ हो गया। कहानी उन्होंने खुद ही अपने पाटीदार अशोक मिश्रा के साथ मिलकर लिखी है लिहाजा बच निकलने का कोई रास्ता भी नहीं है उनके पास। कांस्टेबल मिश्रा को ‘चिकन’ के लिए लगातार परेशान दिखाना और फिर एक ब्राह्मण को चिकन खाते दिखाने के पीछे उनका जो भी उद्देश्य रहा हो, लेकिन इसका असर वैसा ही है जैसे माथे पर भस्म लगाए ‘भोला’ का चिकन पर टूट पड़ना। फिल्म में संगीत राम संपत का है लेकिन एक भी गाना उनकी नाम की महिमा के मुताबिक नहीं है और फिल्म में जिनका नाम महिमा है, उनकी राम कथा तो लिखी ही जा चुकी है ऊपर।



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